मसीही विश्वास तथा बाइबल से संबंधित प्रश्न-उत्तर पूछने और जानने के लिए यहाँ भी देखिये:

GotQuestions?org

रविवार, 4 सितंबर 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 10: आराधना में अवरोध - परमेश्वर को ना जानना (i)

आराधना में अवरोध - परमेश्वर को ना जानना (i):

हम देख चुकें हैं कि परमेश्वर की आराधना का तात्पर्य है परमेश्वर को वह महिमा, आदर, श्रद्धा, समर्पण, बड़ाई, स्तुति, धन्यवाद आदि देना जिसके वह सर्वथा योग्य है (भजन 96:8), और जो उसका हक है। जैसे कि यदि किसी व्यक्ति के बारे में हमारी जानकारी ना हो तो हम उसके गुणों के बारे में ना तो बता सकते हैं, और ना ही औरों के सामने उसकी महिमा या बड़ाई कर सकते हैं; वैसे ही यदि हमें परमेश्वर के गुणों, विशेषताओं, कार्यों, योग्यताओं, हैसियत, सामर्थ, बुद्धिमता आदि के बारे जानकारी ना हो तो हम उसकी महिमा तथा आराधना नहीं कर सकते हैं। जैसे जितना हम किसी व्यक्ति को नज़दीकी से और व्यक्तिगत रीति से जानते हैं, उतना ही बेहतर हम उसका वर्णन करने पाते हैं, वैसे ही जितना नज़दीकी से और व्यक्तिगत रीति से हम परमेश्वर को अनुभव द्वारा जानने पाते हैं, उतना ही बेहतर हम उसकी महिमा और आराधना करने पाते हैं। किसी के बारे में जानना और वास्तव में उसे जानना भिन्न हैं, यद्यपि दोनों ही स्थितियों में हम उसके बारे में कुछ सीमा तक तो बोल और बता सकते हैं। लेकिन सच्चाई से परमेश्वर की आराधना कर पाना तब ही संभव है जब हम उसे वास्तव में व्यक्तिगत रीति से जानने लगें।

बहुत समय पहले मेरे साथ हुई एक घटना मुझे स्मरण आ रही है: मैं अपने एक निकट मित्र के साथ कुछ वार्तालाप कर रहा था, और उस वार्तालाप में उस समय के एक बहुत जाने-माने उच्च-श्रेणी के राष्ट्रीय नेता का ज़िक्र आया। वार्तालाप के प्रवाह को बिना बदले या बाधित किए, बड़ी ही हल्की रीति से उस नेता का नाम लेते हुए मेरा मित्र बोला, "अरे वो! उसे तो मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ"; फिर, उसी साँस में, आंखों में एक नटखट चमक तथा चेहरे पर एक मज़ाकिया मुस्कान लाकर मेरा मित्र आगे बोला, "लेकिन वो मुझे कितना जानता है, यह एक बिलकुल अलग बात है!"

बात की सच्चाई यह है कि मेरा वह मित्र उस नेता के बारे में तो जानता था, लेकिन उस नेता को नज़दीकी तथा व्यक्तिगत रीति से कदापि नहीं जानता था। यद्यपि वह उस नेता के बारे में बहुत कुछ बता सकता था, उसके बारे में वार्तालाप कर सकता था, लेकिन यह इस बात का प्रमाण नहीं था कि मेरा वह मित्र उस नेता को व्यक्तिगत रीति से भली भांति जानता है, उसके साथ निकट संबंध रखता है। ऐसी ही स्थिति हम में से अनेकों के साथ परमेश्वर के साथ हमारे संबंध को लेकर भी है। हम परमेश्वर के बारे में जानते हैं, अपने ज्ञान तथा सामान्य जानकारी के आधार पर हम उसके बारे में बहुत कुछ बता भी सकते हैं, परन्तु केवल एक ही बात है जो महत्वपूर्ण है, वह है कि क्या परमेश्वर के साथ हमारा एक निकट और व्यक्तिगत संबंध है; क्या हमने स्वयं निजी तौर पर उसे अनुभव कर के जाना है? क्या यह सच नहीं है कि सामान्यतः हम केवल उसके बारे में ही जानते हैं, परन्तु अपने निजी अनुभव तथा निकट एवं व्यक्तिगत संबंध द्वारा नहीं? क्या यह सच नहीं है कि सामन्यतः लोगों के लिए परमेश्वर के साथ संबंध रखना एक उत्साह-विहीन रस्म, यन्त्रवत कार्य, बेपरवाही का और ऊपरी, बाहरी दिखावे के लिए पूरी करी जाने वाली ज़िम्मेदारी है जिस के द्वारा कुछ धार्मिक अनुष्ठानों, रीति-रिवाज़ों और प्रथाओं का पालन हो सके?

नया जन्म पाने से परमेश्वर की सन्तान बन जाने वाले लोगों के बारे में भी यदि देखें तो - वे अपने स्वर्गीय परमेश्वर पिता को व्यक्तिगत अनुभव द्वारा और वस्तविकता में कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं? उनके लिए उसकी योजनाओं और उन उम्मीदों को जो परमेश्वर उन से रखता है वे कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं? उनके लिए परमेश्वर की इच्छाएं को तथा जो कार्य वह चाहता है कि उसके बच्चे करें उन कार्यों को वे कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं? उसके वचन को जिसे उसने हमें दिया है कि वह हमारा मार्गदर्शक बने और परमेश्वर पिता के बारे में हमें सिखाए उस वचन को वे कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं?


तो फिर इसमें कौन सी असमंजस की बात है कि नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी भी सार्वजनिक तौर पर अपना मुंह खोलकर परमेश्वर की आराधना के लिए कुछ शब्द बोलने में इतना अधिक हिचकिचाते हैं, अपने आप को असमर्थ पाते हैं
(...क्रमश:)

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 9 – आराधना द्वारा विजय


आराधना द्वारा विजय


हमने परमेश्वर की आराधना और महिमा विषय से आरंभ किया था, और यह देखा कि प्रार्थना परमेश्वर से पाने से संबंधित है जब कि आराधना परमेश्वर को देने से। परमेश्वर की आराधना तथा उसे देने की आशीष को सीखने तथा समझने के लिए हमने परमेश्वर के वचन में से परमेश्वर को देने और परमेश्वर से पाने से संबंधित कुछ उदाहरणों को देखा; ये उदाहरण मुख्यतः पार्थिव और भौतिक वस्तुओं से संबंधित हैं, परन्तु इनमें एक आत्मिक पक्ष भी विद्यमान है।

हम उदाहरणों की इस श्रंखला का अन्त एक ऐसे उदाहरण से करेंगे जो दिखाता है कि कैसे आराधना के द्वारा विजय और बहुतायत की आशीषें प्राप्त हुईं। कृपया 2 इतिहास 20 को पढ़ें; स्थान के अभाव के कारण इस अध्याय पर पूरी व्याख्या करना यहाँ संभव नहीं होगा। बहुत संक्षिप्त में, परमेश्वर के भय में चलने वाले राजा यहोशापात को पता चलता है कि उस पर तीन जातियाँ, अम्मोनी, मोआबी और एदोमी, मिलकर आक्रमण करने वाली हैं। अपनी इस विकट परिस्थिति का एहसास होने पर, वह सारी परिस्थिती परमेश्वर के हाथों में समर्पित कर देता है, और अपनी सारी प्रजा के साथ परमेश्वर द्वारा छुटकारा पाने के लिए उससे प्रार्थना में लग जाता है। परमेश्वर उसे आश्वासन देता है कि परमेश्वर यहोशापात के लिए लड़ेगा और यहोशापात को कोई हानि उठानी नहीं पड़ेगी; उसे केवल अपनी सेना को तैयार करके युद्ध भूमि पर ले जाना होगा, युद्ध की सी पांति बान्ध कर उन्हें खड़ा करना होगा और फिर शान्त होकर खड़े रहें और परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले कार्य को देखें (2 इतिहास 20:14-17)। यहोशापात और उसकी प्रजा ने परमेश्वर के इस सन्देश पर विश्वास किया, उसको स्वीकार किया और इसके लिए परमेश्वर की आराधना करी (पद 18-19)। अगले दिन राजा यहोशापात अपने सेना को लेकर युद्ध भूमि पर गया, और उसने सेना के आगे परमेश्वर की आराधना और स्तुति करते हुए चलने वाले लोगों को रखा (पद 21); फिर, "जिस समय वे गाकर स्तुति करने लगे, उसी समय यहोवा ने अम्मोनियों, मोआबियों और सेईर के पहाड़ी देश के लोगों पर जो यहूदा के विरुद्ध आ रहे थे, घातकों को बैठा दिया और वे मारे गए" (2 इतिहास 20:22)। उन आक्रमणकारियों का अन्त हो जाने के पश्चात, यहोशापात और उसके लोगों को मृत आक्रमणकारियों पर से लूट का माल एकत्रित करने के लिए तीन दिन का समय लग गया (पद 24-25); जिसके पश्चात वे सब लोग बराका नाम तराई में परमेश्वर की आराधना के लिए एकत्रित हुए (पद 26-27)

ध्यान कीजिए, इस पूरी घटना में यहोशापात और उसके लोगों द्वारा प्रार्थना करने का उल्लेख एक बार हुआ है, परन्तु आराधना करने का उल्लेख तीन बार हुआ है; और इन तीन में से पहले दो अवसर ऐसे थे जिनमें परिस्थितियाँ बड़ी विकट और भयावह थीं, विनाश और मृत्यु उनके सामने मूँह बाए खड़े थे। साथ ही अब एक बार और यहजीएल में होकर उन लोगों को पहुँचाए गए परमेश्वर के सन्देश को ध्यान से पढ़ें (2 इतिहास 20:14-17); आप कहीं नहीं पाएंगे कि परमेश्वर ने उन लोगों को आराधना करने का कोई आदेश दिया - परमेश्वर ने केवल यह कहा कि वे युद्ध-भूमि पर जाएं, अपने आप को वहाँ खड़ा करें, और शान्त होकर उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य को देखें। किंतु परमेश्वर में तथा उसके द्वारा उन्हें जिस परिणाम का वायदा मिला था, उसमें उन लोगों के विश्वास ने उन्हें परमेश्वर के द्वारा कुछ भी किए जाने से पहले ही उस कार्य के लिए परमेश्वर की आराधना करने को प्रेरित किया; और युद्ध के बाद मिली विजय के लिए आराधना करी गई तो समझ में आती है। युद्ध भूमि यह उनकी आराधना ही थी जिसके आरंभ होने के साथ ही परमेश्वर का कार्य भी आरंभ हो गया (पद 22) और शत्रु का नाश हो गया। उन लोगों द्वारा परमेश्वर को आराधना के दिए जाने के कारण ना केवल उन्हें एक अप्रत्याशित विजय मिली, परन्तु साथ ही ईनाम के रूप में बहुतायत से संपदा भी मिल गई।

अपने जीवन में कठिन तथा समझ से बाहर परिस्थितियों में भी चिंता, शिकायत, कुड़कुड़ाने, निराश होने और ऐसी परिस्थितियों से निकलने के लिए संसार और उसके लोगों का सहारा लेने की बजाए, उन परिस्थितियों में तथा उन परिस्थितियों के लिए परमेश्वर की आराधना करना सीखें; परिणाम आपकी कलपना से भी बढ़कर आशचर्यजनक और लाभप्रद होंगे।


अब आगे हम उन बाधाओं को देखना आरंभ करेंगे जो हमारी आराधना में आड़े आती हैं, उन बातों को जिनके कारण हम परमेश्वर की आराधना करने नहीं पाते हैं।

बुधवार, 31 अगस्त 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 8: स्वर्ग से गारंटीशुदा


स्वर्ग से गारंटीशुदा

यह आत्मिक सिद्धांत कि परमेश्वर की इच्छा में होकर उसके तथा उसके कार्य के लिए जो भी हम निवेष करेंगे वह हमें उसका कई गुणा लौटा कर दे देगा कोई मनगढ़ंत बात नहीं है, वरन यह वह निश्चित बात है जिसे स्वयं प्रभु यीशु ने कहा है, जिसके साथ उसने यह भी कहा है कि परमेश्वर के लिए किए गए निवेष का प्रतिफल सौ गुणा होगा।

पतरस द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में "यीशु ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिये घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या लड़के-बालों या खेतों को छोड़ दिया हो। और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और लड़के-बालों और खेतों को पर उपद्रव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन" (मरकुस 10:29-30)। प्रभु यीशु द्वारा अपने अटल शब्दों में दिए गए आश्वासन पर ध्यान कीजिए - जो भी प्रभु और उसके सुसमाचार के लिए हम निवेष करते हैं स्वर्ग से उसका सौ गुणा की प्रतिफल निश्चित है।

साथ ही यहाँ प्रभु दोहरे प्रतिफल की भी बात कर रहा है - पृथ्वी पर सौ गुणा, और परलोक में अनन्त जीवन। यहाँ प्रयुक्त शब्द "उपद्रव" से घबराईएगा नहीं, हम संसार में जो कोई भी लौकिक कार्य करते हैं उन प्रत्येक के साथ परेशानियाँ भी जुड़ी होती ही हैं। हम में से कौन है जो यह कह सकता है कि उसके सांसारिक कार्य में कोई परेशानी या कठिनाई कभी नहीं रही है? हम सबके कार्यों में ये रहती हैं; हम सब अपने कार्यों में उनके साथ निभाते भी हैं और उनके होने के बावजूद भी अपने कार्य करते रहते हैं, यह जानते हुए कि हमारे कार्य में परेशानियाँ एवं कठिनाईयाँ हमारे साथ लगी ही रहेंगी। यदि हमें किसी सांसारिक कंपनी का प्रमुख कार्य-अधिकारी यह प्रस्ताव दे कि जो कुछ भी हम उसके प्रस्ताव के अन्तर्गत उसकी कंपनी में निवेष करेंगे, उसका सौ-गुणा प्रतिफल हमें हर कीमत पर, अवश्य ही मिलेगा, परन्तु साथ ही कुछ परेशानियों को भी हमें उठाना पड़ेगा, तो हम में से कितने हैं जो अपनी सांसारिक संपदा की सौ-गुणा बढ़ोतरी के इस अवसर को हाथों से जाने देंगे, वह भी केवल इसलिए क्योंकि कुछ परेशानियाँ साथ जुड़ी हुई हैं? यदि हम सांसारिक लोगों के आश्वासन पर, सांसारिक संपदा के लिए यह जोखिम उठाने को तैयार हैं, तो प्रभु के कहने के निश्चय पर इस लोक में सौ-गुणा एवं परलोक में अनन्तकाल के प्रतिफल के लिए क्यों नहीं?

इस असमंजस का उत्तर उस घटना में छुपा है जो पतरस द्वारा पूछे गए इस प्रश्न से ठीक पहिले घटित हुई - पूरा परिपेक्ष समझने के लिए मरकुस 10:17-18 को पढ़िए। जिस जवान का यहाँ ज़िक्र है, वह अनन्त जीवन चाहता था, वह प्रभु यीशु के प्रति श्रद्धा भी रखता था और उसे यह भी विश्वास था कि प्रभु यीशु ही उसकी परेशानी का हल दे सकते हैं; लेकिन जो उसके पास नहीं था वह था प्रभु यीशु द्वारा दिए गए समाधान पर विश्वास करना और उसे अपने जीवन में कार्यान्वित करना। प्रभु ने उसके प्रश्न का उसे समाधान उपलब्ध करवाया (मरकुस 10:21-22), परन्तु उस जवान के लिए वह समाधान बहुत उग्र तथा अनेपक्षित था, चुकाने के लिए वह एक बहुत बड़ी कीमत थी; और वह जैसा आया था वैसा ही निराश वापस लौट गया। प्रभु यीशु ने जो उस जवान से करने के लिए कहा, वह उस बात से भिन्न नहीं था जो उसने अपने चेलों को सिखाई थी - पाना चाहते हो तो देना सीखो: "दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा: लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा" (लूका 6:38)

यही वह स्थान है जहाँ हम में से बहुतेरे आकर ठोकर खाते हैं, हानि उठाते हैं - प्रभु के प्रति हमारे विश्वास, हमारी श्रद्धा के बावजूद; अनन्त जीवन की बातों के लिए हमारी इच्छा के बावजूद, हम प्रभु के वचनों को स्वीकार करके अपने जीवन में कार्यकारी करना नहीं चाहते हैं; उन्हें सुनना तो चाहते हैं किंतु मानने की हिम्मत नहीं रखते। हम प्रभु की कही बात पर विश्वास करने से घबराते हैं, जो प्रभु ने हमारे हाथों में दिया है, परन्तु अब उसे छोड़ देने के लिए कह रहा है, उसे हम प्रभु के कहने पर छोड़ देना नहीं चाहते। परमेश्वर चाहता है कि हम उस पर विश्वास रखें, उसके कहने पर स्वेच्छा से अपने आप को खाली कर देने की हिम्मत रखें, ताकि वह और अधिक तथा और बेहतर से हमें भर सके। केवल जब हम दे देते हैं, अपने आप को खाली कर देते हैं, तब ही हम परमेश्वर के लिए वह रिक्त स्थान उपलब्ध करवा पाते हैं जिसे वह नई और बेहतर आशीषों की भरपूरी से भरना चाहता है।

कहावत है कि बेहतर ही अकसर सर्वोत्तम का दुश्मन होता है; जो बेहतर आज आपके पास है, उसके कारण उस सर्वोत्तम से जो परमेश्वर आपको देना चाहता है अपने आप को वंचित ना रखें। जो आपके पास है, उसे परमेश्वर के राज्य में निवेष करें, उसकी खेती में की खेती बो दें और भरपूरी की फसल पाने के लिए तैयार रहें।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 7: पाने के लिए देना


पाने के लिए देना

परमेश्वर की ओर से सदा ही यह स्थापित रहा है कि उसके निर्देषों के अनुसार किए गए किसी भी निवेष का प्रतिफल कलपना से कहीं बढ़कर होगा। जब परमेश्वर ने इस्त्राएलियों को अपनी व्यवस्था और नियम दिए, तो उनका महत्वपूर्ण भाग था दशमांश, भेंटें, संपदा एवं बढ़ोतरी के प्रथम-फल परमेश्वर के घर में लाना और गरीबों की सहायता करना। उसके इन निर्देषों के पालन का उद्देश्य था उसके आज्ञाकारी लोगों को आशीषित तथा फलवंत करना; इस संदर्भ में परमेश्वर ने कहा: "भला होता कि उनका मन सदैव ऐसा ही बना रहे, कि वे मेरा भय मानते हुए मेरी सब आज्ञाओं पर चलते रहें, जिस से उनकी और उनके वंश की सदैव भलाई होती रहे!" (व्यवस्थाविवरण 5:29)

समस्त युगों में इस्त्राएल का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर के लोगों ने जब भी परमेश्वर की आज्ञाकारिता में उसे तथा उसके कार्य के लिए अपनी संपदा में से दिया है तो प्रत्युत्तर में उन्होंने सदा बढ़ोतरी ही पाई है। परन्तु जब भी उन्होंने ऐसा नहीं किया है, तो सदा दुःख ही पाया है; और जो कुछ उन्होंने बचा कर रखना चाहा या सुरक्षित रखना चाहा वह भी उनके पास नहीं बचा।

हिज़किय्याह राजा के समय में एक बड़ा सुधार आया; परमेश्वर के लोगों ने अपने आप को परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता में समर्पित किया, अपने आप को सही किया, और वे फिर से अपने दशमांश और भेंट परमेश्वर के घर में लाने लग गए जिससे परमेश्वर के पुरोहितों और परमेश्वर के भवन की आवश्यकताएं पूरी हो सकें (2 इतिहास 31:1-11)। जब उन्होंने निष्ठापूर्वक अपने दशमांश और भेंटें लाना आरंभ कर दिया तब परमेश्वर ने भी उन्हें बहुतायत से आशीषित करना आरंभ कर दिया; जिससे अब अपनी बढ़ती में से परमेश्वर को देने के लिए उनके पास और भी अधिक हो गया, और वे इतना अधिक लाने लगे कि पुरोहितों तथा भवन की सारी आवश्यकताएं पूरी हो जाने के बाद भी बहुत बच गया, और उनके दिए हुए के परमेश्वर के भवन में ढेर लग गए क्योंकि उन्हें रखने के लिए भण्डार की कोठरियां शेष नहीं रह गईं थीं; राजा हिज़किय्याह को उन दशमांशों तथा भेटों को रखने के लिए नए कमरे बनवाने का आदेश देना पड़ा: "और अजर्याह महायाजक ने जो सादोक के घराने का था, उस से कहा, जब से लोग यहोवा के भवन में उठाई हुई भेंटें लाने लगे हैं, तब से हम लोग पेट भर खाने को पाते हैं, वरन बहुत बचा भी करता है; क्योंकि यहोवा ने अपनी प्रजा को आशीष दी है, और जो शेष रह गया है, उसी का यह बड़ा ढेर है। तब हिजकिय्याह ने यहोवा के भवन में कोठरियां तैयार करने की आज्ञा दी, और वे तैयार की गई" (2 इतिहास 31:10-11)

बाद में जब इस्त्राएल एक बार फिर परमेश्वर के पीछे चलने से भटक गया और परेशानियों में पड़ गया, तब परमेश्वर ने उन्हें फिर से स्मरण करवाया: "सारे दशमांश भण्डार में ले आओ कि मेरे भवन में भोजनवस्तु रहे; और सेनाओं का यहोवा यह कहता है, कि ऐसा कर के मुझे परखो कि मैं आकाश के झरोखे तुम्हारे लिये खोल कर तुम्हारे ऊपर अपरम्पार आशीष की वर्षा करता हूं कि नहीं" (मलाकी3:10)

बुद्धिमान राजा सुलेमान के द्वारा परमेश्वर के आत्मा ने लिखवा दिया कि: "अपनी संपत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की पहिली उपज दे देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना; इस प्रकार तेरे खत्ते भरे और पूरे रहेंगे, और तेरे रसकुण्डों से नया दाखमधु उमण्डता रहेगा" (नीतिवचन 3:9-10)

इन शब्दों पर ध्यान दीजिए - "अपनी संपत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की पहिली उपज दे देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना..."; परमेश्वर की सनतान होने के नाते हमें इसका अंगीकार करना और ध्यान रखना है कि हमारे पास जो कुछ भी है वह परमेश्वर के अनुग्रह से हमें दिया गया है (व्यवस्थाविवरण 8:18)। हमारे पास जो भी है, चाहे पार्थिव संपदा; या कोई कौशल, योग्यता, सामर्थ्य या बुद्धि-ज्ञान की प्रतिभा; या कोई आत्मिक वरदान - चाहे जो भी हो, वह सब कुछ परमेश्वर के अनुग्रह से हमें दिया गया है। ये सभी परमेश्वर द्वारा उसके खेत - अर्थात संसार के लोगों में बोने के लिए दिए गए बीज हैं। अब यह हमारे ऊपर है कि चाहे हम इस बीज को अपने लिए इस्तेमाल कर के समाप्त कर लें, या फिर उसे बोएं और बहुतायत की फसल जो हमें तथा दूसरों को आशीषित करे पाएं। जब तक हम परमेश्वर की खेती में जाना, अपने हाथों को खोल कर उसके दिए बीजों को उसके लिए बोना नहीं सीखेंगे, हम परमेश्वर की आशीषों की फसल की बहुतायत का अनुभव भी नहीं करने पाएंगे (नीत्वचन 10:22)

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 6: ’कारण तथा प्रभाव’ का संबंध:


कारण तथा प्रभावका संबंध

परमेश्वर की प्रत्येक सन्तान के जीवन में समान रूप से तथा लगातार लागू रहने वाले सिद्धांतों में से एक है: "धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा" (गलतियों 6:7); इसी सिद्धांत को कुछ भिन्न शब्दों में यूँ भी कहा गया है: "परन्तु बात तो यह है, कि जो थोड़ा बोता है वह थोड़ा काटेगा भी; और जो बहुत बोता है, वह बहुत काटेगा" (2 कुरिन्थियों 9:6)। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के लिए, मात्रा एवं गुणवत्ता में हमारे द्वारा किया गया निवेष ही यह निर्धारित करता है कि हम परमेश्वर से प्रत्युत्तर में क्या और कितना पाएंगे।

जब हम परमेश्वर से कुछ प्राप्त करते हैं, चाहे वह प्रार्थना के अथवा आराधना के प्रत्युत्तार में हो, तब यदि हम हमारे जीवन में किए गए उसके उपकार और कार्य का अंगीकार करने तथा खुलकर उसकी गवाही देने के लिए तैयार होते हैंअपने उजियाले को मनुष्यों के सामने चमकाने देते हैं (मत्ती 5:15-16), यदि हम सार्वजनिक रीति से, ईमानदारी से तथा आत्मा और सच्चाई से, उससे मिली आशीष के लिए उसे अपना धन्यवाद, आदर और आराधना अर्पित करते हैं, तो जो हम उसे देते हैं परमेश्वर कभी उसका कर्ज़दार नहीं बना रहता। जो हम आराधना में उसे देते हैं, उसके प्रत्युत्तर में वह और भी बढ़कर आशीषें हमें लौटा कर दे देता है। जैसे जैसे हमारी आराधना की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ती जाती है, प्रत्युत्तर में परमेश्वर से मिलने वाली आशीषें भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती हैं! कारण अर्थात पाना, उसके प्रभाव अर्थात प्रत्युत्तर का जनक हो जाता है, जो फिर से एक नए पाने और देने के सिलसिले का आरंभ बन जाता है, और यह सिलसिला बढ़ता रहता है - ऊँचाईयों को अग्रसर मार्ग, जिससे हम परमेश्वर द्वारा अधिकाधिक परिपूर्ण और आशीषित होते जाते हैं। कारण तथा प्रभाव के संबंध का यह सिद्धांत सभी विश्वासियों के लिए उपलब्ध और कार्यकारी है, परन्तु इसका सही उपयोग करना हमारे अपने हाथ में है।

मैं यह अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूँ - परमेश्वर को महिमा दें, वह लौटा कर आपको महिमा देगा; उसे आदर दें, उससे आदर पाएं; उसे श्रद्धा दें, उससे श्रद्धा पाएं; उसकी बड़ाई करें, उससे बड़ाई पाएं; अपने समय में से उसे दें, वह आपके जीवन में और समय भर देगा; अपने जीवन में उसे प्राथमिकता दें, वह आपको प्राथमिकता दिलवाएगा; उसके लिए कार्य करें, वह आपके लिए कार्य करेगा; पृथ्वी पर उसकी आवश्यकताओं को पूरा करें, वह आपकी आवश्यकताओं को पूरा करेगा केवल पृथ्वी पर ही नहीं वरन स्वर्ग में भी। यह सब कठिन और समझ के बाहर प्रतीत हो सकता है, परन्तु विश्वास के साथ कदम आगे बढ़ाएं, परमेश्वर आपको निराश कभी नहीं होने देगा।

प्रार्थना के द्वारा आप उतना ही पा सकते हैं जितनी आपकी सोच की सीमा और अपनी आवश्यकताओं के बारे में समझ है; परन्तु आराधना आपको आपकी कलपना से भी कहीं अधिक बढ़कर आशीषित और भरपूर कर सकती है (1 कुरिन्थियों 2:9)

आराधना के लिए उभारना परमेश्वर का तरीका है हमें उस बहुतायत के जीवन को उपलब्ध करवाने का जो परमेश्वर अपने लोगों को देना चाहता है: "... मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं" (यूहन्ना 10:10)। आराधना इसलिए नहीं है कि हम परमेश्वर की तूती उसके लिए बजाएं; वरन इसलिए है ताकि जो भी फसल हम उसके लिए बोएं बहुतायात से उसका प्रतिफल पाएं।
आगे हम इस कारण और प्रभाव के संबंध को समझने के लिए कुछ और उदाहरण देखेंगे।

सोमवार, 29 अगस्त 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 5: आराधना से आशीष


आराधना से आशीष

मैंने जैसे जैसे परमेश्वर और उसके वचन के बारे में सीखा तथा जाना, मुझे यह एहसास भी होता तथा बढ़ता गया है कि परमेश्वर का संपूर्ण वचन अद्भुत रीति और बहुत बारीकी से परस्पर जुड़ी हुई इकाई है, इस वचन का प्रत्येक भाग अन्य भागों से संबंधित उनका सहायक एवं पूरक है। हम जैसे जैसे परमेश्वर के वचन की गहराइयों में उतरते जाते हैं, अद्भुत बारीकी का यह परस्पर संबंध हमारे लिए इस बात को और भी सुदृढ़ करता जाता है कि वास्तव में यह परमेश्वर ही का वचन है, और इस एहसास से हमारे मन उसके प्रति और भी आराधना तथा आदर से भरते जाते हैं।

इससे पिछले खण्ड, "आराधना की अनिवार्यता" का अन्त इस पूर्वाभास के साथ हुआ था कि परमेश्वर आराधना क्यों चाहता है। कुछ यह मानते हैं कि परमेश्वर आत्माभिमानी है और चाहता है कि लोग उसकी तूती उसके लिए बजाते रहें; परन्तु ऐसा नहीं है। प्रत्येक नया जन्म पाए विश्वासी, अर्थात अपने पापों के पश्चाताप और प्रभु यीशु मसीह में लाए विश्वास के द्वारा परमेश्वर की सनतान (यूहन्ना 1:12-13) बनने वाले व्यक्ति के जीवन में एक कारण तथा प्रभावका संबंध बना रहता है; इसी कारण तथा प्रभावके संबंध के द्वारा परमेश्वर अपने आराधक को, जो आत्मा और सच्चाई में परमेश्वर की आराधना करता है, ऊँचाईयों पर लगातार चढ़ते चले जाने वाले ऐसे मार्ग पर अग्रसर करता रहता है, जिसकी आशीष ना केवल अनन्तकाल में वरन अभी वर्तमान में हमारे पृथ्वी के जीवन में भी मिलती रहती है।

इस पृथ्वी पर अपनी सेवकाई के समय में प्रभु यीशु ने कहा था: "आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी" (मत्ती 24:35); अर्थात प्रभु के वचन अचूक, अकाट्य, अटल और दृढ़ हैं; वे सदा सत्य होंगे, हर कीमत पर और चाहे जो हो जाए। इस बात को ध्यान में रखते हुए, प्रभु यीशु द्वारा कही गई एक और बात पर ध्यान कीजिए: "...प्रभु यीशु की बातें स्मरण रखना अवश्य है, कि उसने आप ही कहा है; कि लेने से देना धन्य है" (प्रेरितों 20:35)

स्वयं प्रभु यीशु के शब्दों में, लेने और देने दोनों में ही आशीष है; लेकिन प्रभु कहते हैं कि लेने की बजाए देने में आशीष अधिक है।

हम प्रार्थना परमेश्वर से लेने के लिए करते हैं; लेकिन आराधना द्वारा हम परमेश्वर को देते हैं - हम धन्यवाद देते हैं, महिमा देते हैं, भक्ति देते हैं, आदर देते हैं, श्रद्धा देते हैं, उसके वचन को आज्ञाकारिता तथा उद्यम देते हैं। प्रार्थना का सरोकार लेने ही से है और आराधना का सरोकार देने ही से है; इसलिए यद्यपि प्रार्थना और आराधना दोनों में आशीष है, लेकिन आराधना में प्रार्थना से अधिक आशीष है।


आगे, हम इस कारण तथा प्रभावके परस्पर संबंध और परमेश्वर को देने की आशीष की समझ तथा व्याख्या के लिए परमेश्वर के वचन से कुछ उदाहरणों को देखेंगे।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 4: आराधना की अनिवार्यता


आराधना की अनिवार्यता

सामरी स्त्री के साथ हुए अपने वार्तालाप में प्रभु यीशु ने एक अति-महत्वपूर्ण बात कही - बात जिसका अकसर हवाला दिया जाता है, उध्दरण किया जाता है, परन्तु जैसे उसे लिया जाना चाहिए और समझा जाना चाहिए वैसा अकसर किया नहीं जाता है। वह बात है: "परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन [आराधना] आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही भजन [आराधना] करने वालों को ढूंढ़ता है" (यूहन्ना 4:23)

यद्यपि अकसर इस पद के द्वारा यह दिखाने और सिखाने का प्रयास किया जाता है कि परमेश्वर प्रार्थना करने वालों का खोजी है, वास्तविकता ऐसी नहीं है; वास्तविकता में प्रभु यीशु ने जो कहा वह है कि परमेश्वर अपने आराधकों को ढूँढ़ता है, ना कि यह कि परमेश्वर प्रार्थना करने वालों को ढूँढ़ता है।

मूल युनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद भजन [आराधना] किया गया है वह है प्रोसकूनियो जिसका अर्थ होता है आदर देने के लिए मुँह के बल हो जाना या साष्टांग प्रणाम करना, नम्र होकर आराधना करना। इसी प्रकार जिस यूनानी शब्द का अनुवाद भजन [आराधना] करने वाला हुआ है वह है प्रोस्कुनीटीस अर्थात आराधना करने वाला। लेकिन जिस यूनानी शब्द का अनुवाद प्रार्थना, या प्रार्थना करना, या प्रार्थना करने वाला किया गया है वह है प्रोसिव्कुमाई जिसका अर्थ है परमेश्वर से प्रार्थना करना या गिड़गिड़ाना।

परमेश्वर से प्रार्थना करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है; गैर-मसीही और अविश्वासी या फिर वे लोग जो परमेश्वर से केवल कुछ पाना भर चाहते हैं या अपने आप को किसी विकट परिस्थिति से निकलवाना चाहते हैं, वे भी अपनी आवश्यकतानुसार परमेश्वर से प्रार्थना कर लेते हैं, और परमेश्वर सब की बात को सुनता है। लेकिन परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं खोज रहा है जो केवल प्रार्थना भर करते हैं, अर्थात उससे केवल माँगते ही रहते हैं; वह अराधकों को खोज रहा है; अर्थात उन्हें जो दीन और नम्र होकर अपने आप को उसे समर्पित कर दें, उसके प्रति आदर और आराधना का रवैया बनाए रखें तथा उसकी महिमा करें।

इस पद के द्वारा हम यह भी देखते हैं कि सच्ची आराधना "आत्मा और सच्चाई" से होती है, अर्थात वह ना तो ऊपरी या बाहरी होती है, ना ही बनावटी या दिखावे के लिए होती है, वरन सच्ची आराधना हृदय की गहराईयों से प्रवाहित तथा परमेश्वर पिता की ओर निर्देशित होती है - प्रभु यीशु द्वारा कही गई प्रथम और सबसे महान आज्ञा: "उसने उस से कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है" (मत्ती 22:37-38) के व्यावाहरिक प्रगटिकरण के रूप में।


हमारे प्रेमी और ध्यान रखने वाले परमेश्वर पिता के पास उससे प्रार्थना करने वाले, अपनी आवश्यकताओं को माँगने वाले तो बहुत हैं, लेकिन उसका हृदय अपने आराधकों तथा उनके द्वारा आत्मा और सच्चाई से करी गई उसकी आराधना के लिए लालायित रहता है - और इसका बहुत महत्वपुर्ण कारण भी है जिसे हम आगे देखेंगे। परमेश्वर की सन्तान होने के नाते हमारे लिए यह अनिवार्य है कि हमारे लिए हमारे स्वर्गीय पिता द्वारा रखी गई आशाओं के अनुरूप हम बढ़ें और उससे केवल प्रार्थना ही करते रहने वाले नहीं वरन उसकी आराधना करने वाले बनें।