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शनिवार, 18 अप्रैल 2009

संपर्क दिसम्बर २००८: तब क्या होगा


(यह लेख २६ नवंबर २००८ को मुम्बई में हुए आतंकी हमले के बाद लिखा गया है)

यह लेख मैं उस समय लिख रहा हूँ जब सारा संसार सोच रहा है ‘अब क्या होगा?’ आतंकवाद ने हमें हिला कर रख दिया है। परमेश्वर के वचन की भविश्यद्वाणी कहती है, “आने वाली घटनाओं को देखते देखते लोगों के जी में जी न रहेगा” (लूका २१:२६)। मैं देख रहा था कि लोग मौत से बचने के लिये भाग रहे थे। पर अब वह दिन भी आने वाले हैं जब वे “मरने की लालसा करेंगे और मौत उनसे भागेगी” (प्रकाशितवाक्य ९:६)। उग्रवाद का कारण, बदला लेने की भावना तथा जलन और द्वेश रखना ही है। बदले की इस भावना ने इन्सान के भीतर इन्सानियत को ही खत्म कर डाला है। ज़िंदा जिस्म में एक मुर्दा लाश जी रही है। आदमी के अन्दर एक शमशानी सन्नाटा और दहशत बसती जा रही है और यह उग्रवाद हमारे समाज पर सबसे शर्मनाक कलंक है।


काफी दिन हुए मैंने किसी पत्रिका में एक घटना के बारे में पढ़ा था। लोगों के नाम आदि मुझे याद नहीं रहे, लेकिन जो भी याद है वही आज आपके साथ अपने शब्दों के सहारे बाँट रहा हूँ। मध्य एशिया में किसी पर्यटक स्थल पर एक पति, पत्नि और उनके तीन बच्चे किसी होटल में ठहरे हुए थे। उनका बड़ा बेटा लगभग ७ वर्ष, छोटी बेटी ६ वर्ष और सबसे छोटा बेटा एक वर्ष के लगभग था।

अचानक एक गोली चलने की आवाज़ ने ६ साल की बच्ची को चौंका दिया। उसने दौड़ कर कमरे की खिड़की से झांका तो क्या देखा कि पास बहती हुई नदी के किनारे उसके पापा खून से लथपथ ज़मीन पर पड़े हुए हैं। तीन-चार आदमी बन्दूक लिए खड़े हुए हैं जिनमें से एक उसके भाई को पैरों से पकड़ कर पत्थर पर पटक पटक कर मार रहा था। इतने में उसकी माँ ने उसके पीछे से आकर देखा तो उसे यह समझने में देर नहीं लगी कि उग्रवादियों ने उन्हें घेर लिया है और वे उनके कॉटेज की तरफ आ रहे हैं। माँ ने तेज़ी से अपने सबसे छोटे बेटे को गोद में उठाया और बेटी का हाथ पकड़ कर छिपने के लिए एक छोटे गोदाम की तरफ भागी। लड़की को उसने वहाँ रखी अनाज की बोरियों के पीछे छिपा दिया और खुद कुछ दूरी पर बेटे के साथ छिप गई। तभी उग्रवादी भी वहाँ आ पहुँचे। वे सामान इधर उधर फेंकते हुए उन्हे ढूंढने लगे। तभी माँ की गोद में बैठा बेटा डर से रोने को हुआ तो माँ ने उसका मुँह अपने हाथ से दबा लिया। जब उग्रवादी काफी ढूंढने के बाद लौटने लगे तब माँ ने अपना हाथ बेटे के मुँह से हटाया तो देखा कि बेटे की गर्दन लटकी हुई है। माँ ने डर और घबराहट में उसके मुँह के साथ उसकी नाक भी दबा दी थी और बेटा साँस रुकने के कारण मर चुका था। वह माँ यह देख अपने को रोक न सकी और उसकी चीख़ निकल पड़ी। उसकी चीख़ जाते हुए उग्रवादीओं को फिर लौटा लाई और उन्होंने माँ को भी गोलियों से भून दिया।

बोरियों में छिपी बैठी सहमी सी उस बच्ची ने यह सब देखा था। अगले लगभग ६ साल तक वह सदमे के कारण बोल न सकी। १२ साल की यह लड़की १८ साल तक बदले की भावना से भरी यही सोचती थी कि मैं उन लोगों से बदला कैसे लूँ? अब केवल यही उसके जीने का उद्देश्य बचा था। वह हँसना भूल चुकी थी। तभी उसकी मुलाकात प्रभु यीशु के एक दास से हुई जिससे उसने पापों की क्षमा, शान्ति, चैन और छुटकारे के बारे में सुना। जब इस अशान्त लड़की ने शान्ति के परमेश्वर से प्रार्थना कर दया की भीख माँगी, तब वह उस बदले के भाव से बाहर निकल पाई। तब उसने प्रभु से पूछा, “प्रभु अब आप बताईए, मैं क्या करूँ?” प्रभु ने उसको अपने वचन के द्वारा बताया, “अगर बुराई को जीतना है तो भलाई से जीतो।” आज यही लड़की उन्हीं उग्रवादियों के अनाथ और बेसहारा बच्चों की सेवा में लगी है।

उस उग्रवादी घटना ने तो इस लड़की को उग्रवादी बना ही दिया था, पर प्यारे प्रभु ने उसे क्या से क्या बना दिया। आज वह अपना बाकी जीवन द्वेश से नहीं पर प्यार से, बुराई से नहीं पर भलाई से बिता रही है। “बुराई से न हारो, परन्तु बुराई को भलाई से जीत लो” (रोमियों १२:२१)।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

संपर्क दिसम्बर २००८: एहमियत का एहसास


(यह लेख, आई० आई० टी० - रूड़की के स्नातक श्री शशि शेखर की गवाही, अर्थात उनके व्यक्तिगत अनुभव की अभिव्यक्ति, है।)

मेरा नाम शशि शेखर है। मेरा जन्म पटना बिहार में हुआ। मैं बच्पन से ही अपने सब भाई-बहिनों में सबसे अधिक धार्मिक था और कभी त्यौहार के मौके पर उपवास भी रख लिया करता था। मैं ही अकेला था जो धार्मिक था। मैंने कभी भी अपने परिवार और अपने माता-पिता से ज़्यादा किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचा।

जब मैं दो-तीन साल का था तो उस समय मैं एक बड़ी ही विकट स्थिती से गुज़रा और मरते-मरते बचा। उस समय ऐसा हुआ कि मैं एक टूटी हुई चूड़ी को अपने मूँह से तोड़ने की कोशिश कर रहा था जबकि मेरे मुँह में दाँत नहीं थे। लेकिन मैंने उसको अपने मुँह से तोड़ने की पूरी कोशिश की। परिणामस्वरूप मेरा गला कट गया और बहुत ख़ून बहने लगा। तुरंत मेरे माता-पिता मुझे पटना लेकर भागे। उन दिनों गंगा नदी में बहुत बाढ़ आई हुई थी और स्टीमर बोट (स्वचालित नाव) को छोड़ और कोई आने-जाने का साधन नहीं था। ऐसे में कोई भी बोट मालिक स्टीमर से नदी पार करने के लिए तैयार नहीं था और मेरे माता-पिता ने मेरे जीवन कि बची संभावना की सारी आशा भी छोड़ दी थी। उसी समय बहुत कोशिश करने के बाद परमेश्वर के अनुग्रह से बाढ़ से भरी नदी को पार करने के लिए एक आदमी तैयार हुआ और बहुत ही कठिनाई से नदी को पार किया।

वह समय मेरे माता-पिता के लिए बहुत ही दुख़दायी था। मेरे इलाज में बहुत बड़ी रकम खर्च हुई, जिसके चलते मुझे बचाने के लिए मेरे माता-पिता ने बहुत ही दुख़ उठाया। इलाज के बाद धीरे-धीरे मैं ठीक होने लगा।

मेरी प्राथमिक शिक्षा पहली से पाँच कक्षा तक एक हॉस्टल में हुई जहाँ मेरे अन्दर एक अलग तरह का व्यवाहर विकसित हुआ। मैं दूसरों को पसंद नहीं करता था और अपने हृदय में बुरा सोचता था और भला करने की सोचता भी नहीं था। इस तरह मैं पूरी तरह पाप में था।

मैंने कभी ऐसा पाप तो नहीं किया जो यदि मेरे माता-पिता, भाई-बहिन या किसी और को पता चलता तो वे मेरे बारे में बुरा सोचते। मैं हमेशा यही चाहता था कि लोग मेरे बारे में अच्छा सोचें। मैं चाहता था कि मैं कोई ऐसा बुरा काम ना करूँ जिसका किसी को पता चले तो मेरी एक आज्ञाकारी बालक की छवि धूमिल हो जाए। बचपन से ही मैं अपनी छवि के बारे में बड़ा ध्यान रखता था। इस तरह, अपनी सोच के अनुसार, मैं अपने माता-पिता और शिक्षकों की राय में एक ‘अच्छा लड़का’ था।

मैं अपने ही तरीके से पाप का मज़ा ले रहा था। मैं एक बहुत ही घमंडी, स्वार्थी और क्रूर लड़का था और अपने माँ-बाप के सामने हमेशा साफ-सुथरा दिखना चाहता था। अर्थात आप कह सकते हैं कि मैं केवल एक पाखंडी था। यह इस तरह से है जैसे ‘एक कब्र, जिसके अन्दर हड्डियाँ और मलिन्ता और सड़न है, परन्तु बाहर से देखने में साफ़ और संवरी हुई है।’ वैसे ही, मेरे हृदय के अन्दर तो बुरी सोच थी लेकिन मैं बाहर से एक आज्ञाकारी और सभ्य बालक के रूप में संवरना चाहता था।

बच्पन से ही विज्ञान में मेरी रुची नहीं थी। मैंने कभी पढ़ाई की एहमियत का एहसास नहीं किया। क्योंकि सब पढ़ते हैं इसलिए मुझे पढ़ना है और यह मुझे अच्छा लगता था। मुझमें एक देश्प्रेम की भावना थी सो मैं एक सेना का अधिकारी बन्कर देश की सेवा करना चाहता था। मुझे बच्पने से ही एक अच्छा दिमाग़ नहीं मिला, मैं केवल एक सामन्य बुद्धि का लड़का था। परन्तु फिर भी मैं बचपन से ही अपनी पढ़ाई में हमेशा अच्छा था। जिस स्कूल में मैं पढ़ा वहाँ हमें आम तौर से खाना खाने से पहले और सोने से पहले प्रार्थना कराई जाती थी।

जब मैं १२ साल का था तब मेरे जीवन में एक बुरा मोड़ आया। १९९४ में मुझे ‘एनसैफलाईटिस’ नामक बीमारी हो गयी - एक ऐसा बुखार जिसने रांची में रहने वाले बहुत से लोगों को मार दिया था। जब मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया तो मेरी माँ बहुत घबरा गयी थी और उसने मेरे जीवन की आशा छोड़ दी थी। क्येंकि लोग रोज़ सुबह भर्ती होते और दोपहर या शाम तक उन्हें मरा घोषित कर दिया जाता था। एक समय तो मुझे भी मरा घोषित कर दिया गया परन्तु आश्चर्यजनक रीती से जीवन मुझमें दोबारा आ गया। बहुत इलाज के बाद मैं कुछ हद तक ठीक हो गया। और एक महीने के बाद मेरे माता-पिता को डाक्टर ने सलाह दी कि ‘इसको घर ले जा कर सायकोथेरापी (मान्सिक चिकित्सा) के द्वारा इलाज करो’। इसके तीन साल के बाद मैं अपनी पढ़ाई दोबारा ज़ारी कर सका। बहुत मेहनत के बाद मैंने १९९९ में अपना इंटरमीडीयट सी०बी०एस०सी० बोर्ड से पूरा किया।

उसके बाद परमेश्वर के अनुग्रह से मैंने प्रतियोगी इंजिनियरिंग की परीक्षाएं दीं और मुझे रूड़की आई०आई०टी० इंजिनियरिंग परीक्षा के लिये चुन लिया गया और मैं रूड़की आ गया। यहाँ आकर अपने साथ के पढ़ने वालों को देखकर बहुत उलझन में था कि उनके लिये गाली देना, गन्दे काम करना और सिगरेट और शराब पीना एक रिवाज़ है। मेरे सीनियर और मेरे मित्र मुझ से कहते कि एक इंजिनियर के लिये यह सब करना बहुत ज़रूरी होता है। क्योंकि मैं किसी को गाली नहीं देता था, अपशब्द भी नहीं बोलता था और मुझ में कोई बुरी आदत भी नहीं थी इसलिए मैं केवल अपने आप में संतुष्ट रहता था और मुझे अपने अंदर कोई बुराई नहीं दिखती थी। मैंने बहुत कोशिश की अपने आप को इन चीज़ों से दूर रखने और अपने आप में और अपने मित्रों की दृष्टि में ठीक दिखने की परन्तु मेरा मन उन दिनों बहुत ही भ्रष्ट हो गया था।

मैं अपने पहले साल के आखिरी सैमस्टर में एक धर्मी जन से मिला। वह मुझे प्रभु के पास लाया। पहले तो मैं उसकी कोई बात सुनने के लिये तैयार नहीं था। परन्तु धीरे-धीरे मैंने उसकी बात सुनना शुरु किया और उसके बारे में जाना। मैं प्रभु के लोगों की संगति में बना रहा और लम्बे समय बाद, यह जान्कर कि वह मुझ जैसे को भी, जो इतना बुरा है, ग्रहण कर सकता है, और केवल वही है जो मुझे मेरे पापों से क्षमा और मुझे एक नया मन दे सकता है, मैंने व्यक्तिगत रीति से, पश्चाताप के साथ, प्रभु यीशु को ग्रहण किया ।

पहले मैं उनके पीछे चलता था जो मुझे धर्म के पास ले जाता था लेकिन जिसके अंत मेम कुछ भी नहीं है। परन्तु जब मैंने प्रभु यीशु पर विश्वास किया तो जाना कि केवल वही पापों की क्षमा और उद्धार का मार्ग है जो कलवरी के क्रूस पर उसके बलिदान पर विश्वास के द्वारा मिलता है। अब मैं कह सकता हूँ कि जब मैं प्रभु को नहीं जनता था, तब भी प्रभु मुझे जानता था और जो भी मेरे जीवन में हुआ परिणामस्वरूप भला ही हुआ।

कुछ बातों को मैं आज सोचता हूँ। अगर मैं धर्मी था तो क्यों बुरी बातें और बुरे विचार मेरे मन में बने रहते थे? क्या वे मुझे अच्छा बना सकते थे? तब मैं एक व्यक्तिगत निर्णय पर आया कि मुझे अच्छे और बुरे के बीच एक फैसला करना है। प्रभु ने मुझे उत्तर दिया और मैं पूरी तरह इस बात से सहमत हो गया कि मैं यीशु पर पूरे हियाव के साथ भरोसा रख सकता हूँ और मेरा हृदय जिसकी खोज कर रहा था उसकी खोज अब पूरी हो गयी।

मेरे जीवन में प्रभु ने बहुत काम किये हैं। मैं प्रभु का बहुत आभारी हूँ और अब मैं चाहता हूँ कि वह मुझ जैसे कमज़ोर आदमी को अपने सेवक के रूप में चुन ले।

संपर्क दिसम्बर २००८: ज़रा सुन तो लो

मिलावट और बनावटीपन इस युग की सबसे ज़रूरी बात बन गई है। जल, वायु, भोजन सब मिलावटी है। जीवन रक्षक दवाईयों में भी मौत मिलकर बेची जाती है। अगर आप मरना चाहें तो असली ज़हर भी मिलना मुशकिल है। क्या आपने कभी सुना है कि कीड़े मारने वाली दवाई में भी कीड़े पड़ गए? इस बनावटी और मिलावटी युग में परमेश्वार के वच्न में भी मिलावट होने लगी है। बनावटी प्राचारकों की भी भरमार है। दानियेल भविष्यद्वक्ता की भविश्यवणी में अन्तिम युग लोहे और मिट्टी के मिलावटी पैरों पर खड़ा है (दानियेल २:३३,४१,४२)।

आज पाप सिर्फ कोई मजबूरी मात्र ही नहीं, पर पाप एक मनोरंजन का साधन भी बन गया है। किसी को बेवकूफ बनाकर और धोखा देकर बड़ा मज़ा आता है। हम अपनी पेहचान भूल गये हैं। वास्तव में हम क्या हैं? हम दूसरों को तो कहते हैं कि लोग बैर हैं, झूठ बोलते हैं, लालची हैं; पर मैं क्या हूँ? अगर कभी कोई कमी दिखती भी है तो हम उसे सही ठहराने की कोशिश करते हैं या फिर मजबूरी गिनाते हैं।

बीवी कह रही थी, “दुनिया में इमान्दारी नहीं बची। लोग धोखा दे रहे हैं और धोखा खा रहे हैं। बड़े से बड़ा आदमी क्या, छोटा भी दे रह है। बस संसार का अन्त आ गया है। देखो सुबह क्या हुआ, सबज़ीवाला मुझे एक खोटा सिक्का थमा गया; एक रुपये के लिये भी ईमान बेच दिया! वैसे तो खुदा खुदा कर रहा था।” पती बोला, “ज़रा वह खोटा सिक्का तो दिखाओ।” बीवी बोली, “वह तो मैंने दूधवाले को भेड़ दिया!” जब कोई हमें कुछ नोटों के बीच में एक फटा हुआ नोट चला देता है तो हमें उसके धोखे पर बहुत दुख, गुस्सा और झुँझलाहट आती है। पर अगर वही नोट हम उसी तरह से दूसरों को थमा देते हैं तो हमें बड़ी खुशी मिलती है और हम राहत महसूस करते हैं कि नोट चल गया।

शैतान एक ऐसा सेल्समैन है जो बड़े वायदे करता है और बड़े-बड़े लालच सामने रखता है; पर असल बात तो बाद में खुलती है और तब तक आदमी लुट चुका होता है। वह ऐसे आश्वासनों की भरमाई मन में भर देता है, जो कभी पूरे नहीं होते। शैतान, अपने झांसे में लाकर, हज़ारों सालों से, हव्वा से लेकर अब तक, न जाने कितनों को परमेश्वर के तुल्य हो जाने का ख़्वाब दिखाता रहा है। शैतान ने आदमी को अंश-अंश करके अपने स्वरूप में ढाल दिया है।

अगर झूठ सच सा न लगे तो झूठ कभी चल नहीं पायेगा। नकली नोट अगर असली सा ना दिखे तो चलेगा नहीं। काँटे पर आटा लगाया जाता है। काँटे पर यदि आटा न हो तो मछ्ली फंसेगी कैसे? काँटे को छिपाने के लिये आटा लगाना ही पड़ता है। लोभ के आटे की सच्चाई, बिना सटके, सहजता से समझ में नहीं आती। पर बाद में जब समझ में आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। हव्वा ने शैतान के एक ही झूठ को सच समझ कर उसका विश्वास किया था। एक बार आप फंस गये तो फिर बस छटपटाते रहेंगे।

लोग आश्चर्यकर्म देखना चाहते हैं, चँगाई देखना चाहते हैं। ज़्यादतर लोग परमेश्वर की खोज में नहीं. परन्तु वे किसी मदारी की खोज में हैं। अधिकतर तो अपने स्वार्थ की ही खोज में जुटे हैं। यह बात सच है कि प्रभु यीशु पाप से छुटकारा देने आया। पर ऐसे प्रचारकों की भर्मार है जो उछ्ल-कूद दिखाते हैं और बड़े-बड़े लालच देते हैं, और एक बड़ी भीड़ उनके पीछे है - “ ... और कितनों के विश्वास को उलट-पुलट कर देते हैं (२ तिमुथियस २:१८)।” “ ... हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ; तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी (इफ़सियों ५:१४)।”