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शनिवार, 25 अप्रैल 2009

सम्पर्क दिसंबर २००६: सम्पादकीय



सम्पर्क के माध्यम से आपसे सम्पर्क हो पाना सालों से संभव नहीं हो पा रहा था। पर संतों की प्रार्थनाओं के उत्तर में आज फिर आपसे यह सम्पर्क संभव हो पाया है। प्रभु की दया से सम्पर्क तो प्रभु की सेवा में समर्पित है, पर आप इसे अपनी प्रार्थनों से विस्तार दे सकते हैं।

“... हम अपने वर्ष शब्दों की नाई बिताते हैं।” (भजन ९०:९) साल शब्दों की तरह मूँह से निकले और चले गये। यह साल, लगभग १२ महीने पहिले, नया साल था; बाकी बचे और कुछ दिनों के बाद यह साल फिर पुराना हो जाएगा। फिर इस पुराने साल को भी हम हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन कर देंगे। क्योंकि लिखा है कि “... जो वस्तु पुरानी और जीर्ण हो जाती है उसका मिट जाना अनिवार्य है” (इब्रानियों ८:१३)। बाईबल कहती है कि नये का पुराने से क्या मेल। संसार भी अब पुराना हो गया है, इसका मिटना अनिवार्य है। पर “... प्रभु के वर्षों का कोई अन्त नहीं” (भजन १०२:२७ )। जिनमें नया जीवन, अर्थात प्रभु का जीवन है, उनके जीवन का भी कोई अन्त नहीं।

यदि हमारे जीवन के उद्देश्य नहीं बदले तो वास्तव में हम में पूरी तरह बदलाव नहीं आया। बहुत सारे विश्वासी, मसीह के लिए शहीद होकर मरना तो चाहते हैं, पर मसीह के लिए जीना उनको कहीं मुश्किल लगता है। सन्तों को दो श्रेणी में रखा जा सकता है - सांसारिक स्वभाव के सन्त और स्वर्गिय स्वभाव के सन्त। स्वर्गिय स्वभाव के सन्तों में यह इच्छा रहती है कि वे अपने परमेश्वर की इच्छा को कैसे पूरा करें। सांसारिक स्वभाव के सन्त इस प्रयास में रहते हैं कि कैसे परमेश्वर उनकी इच्छा पूरी करे! वे परमेश्वर से चाहते हैं, परमेश्वर को नहीं। कितनों ने मसीह को अपने मन में एक ऐसे देवता के रूप में ढाल लिया है जो उनकी स्वाथर्मय और शारिरिक अभिलाशाओं को पूरा करता रहे।

ज़बान से कहीं ज़्यादा जीवन बोलता है। उद्धाहरण्स्वरूप - मेरे सिर का अस्सी प्रतिशत भूभाग बंजर है और बीस प्रतिशत बाल ही सिर की सीमाओं पर बचे हैं। अगर मैं बहुत से ऊँचे वैज्ञानिक तर्कों और प्रभावशाली शब्दों के साथ आपको एक तेल बेचने का प्रयास करूँ और कहूँ कि मात्र पैंतालिस दिनों में यह तेल किसी भी टकले के सिर पर बालों की बहार लौटा सकता है, तो आप मुझे बताईये, कितने ऐसे लोग होंगे जो मुझसे यह तेल ख़रीदने को तैयार होंगे? क्या यह सच नहीं कि ज़ुबान से ज़्यादा जीवन प्रभाव डालता है।  

जब प्रभु यीशु मसीह इस पृथ्वी पर आया तो उसने दावा किया कि वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र है। इस दावे को साबित करने के लिए क्या प्रभु यीशु के पास परमेश्वर का दिया हुआ कोई प्रमाण्पत्र था, जिसे देखकर लोग विश्वास करते? उसके पास ऐसा कोई प्रमाण्पत्र तो नहीं था परन्तु उसका प्रेम, दया, क्षमा और उसकी जीवन शैली ही उसके प्रमाण्पत्र थे (यूहन्ना ५:३६)। जब रोमी गवर्नर पिलातुस ने यीशु और बरअब्बा को आमने सामने खड़ा किया और लोगों से पूछा, “तुम किसे चाहते हो?” तो उस समय प्रभु यीशु को एक भी वोट नहीं मिला। पर आज एक अरब से ज़्यादा लोग (भले ही कैसे क्यों न हों) उसके अनुयायी हैं। उसका जीवन ही लोगों में परिवर्तन लाता है। बहुत से लोग धर्मों से उकता गये हैं। अब वे किसी नये परमेश्वर की खोज में लगे हैं। इसीलिए नये नये संप्रदाय और नये नये गुरू जन्म ले रहे हैं। पर सच्चा गुरू अपनी सेवा नहीं करवाता, दूसरों की सेवा करता है (मरकुस १०:४५)। सच्चा गुरू अपने शिष्यों से पैर नहीं धुलवाता, बल्कि उनके पैर धो देता है (यूहन्ना १३:५)। इसीलिए आज के अधिकांश आधुनिक गुरूओं में से गुरू कम और गुरूघंटाल ज़्यादा हैं।

मेरा और आपका प्रचार लोगों को प्रभावित कर सकता है, परिवर्तित नहीं। लोगों का जीवन तभी परिवर्तित होगा, जब मेरे और आपके पास एक बदला हुआ जीवन होगा। श्ब्दों से कहीं ज़्यादा एक इमान्दार जीवन प्रभाव डालता है। एक सुसमाचार सभा में प्रभु यीशु को ग्रहण करने के बाद एक व्यक्ति अपने पड़ोसी के पास पहुँचा। जेब से एक घड़ी निकाल कर अपने पड़ोसी से पूछा, “क्या इस घड़ी को पहिचानते हो?” पड़ोसी बोला, “अरे यार ये तो मेरी वही घड़ी है जो तीन साल पहिले कहीं खो गयी थी।” व्यक्ति ने जवाब दिया, “मियां यह घड़ी खोयी-वोयी नहीं थी; यह घड़ी चोरी की गयी थी। तुम्हें मालुम है वह चोर कौन था?” वह चोर मैं था।” शब्दों से बढ़कर बदला हुआ जीवन बोलता है। यही प्रमाण्पत्र है मेरे और आपके बदले हुए जीवन का।

कहाँ गिरा, कैसे गिरा

वह आदमी जैसे तैसे अपने दुश्मन के हाथ से तो बच निकला, लेकिन तब तक अंधेरा काफी गहरा चुका था। सर्द हवाओं ने सर्दी को सहने के बाहर कर दिया था। वह आदमी सोच रहा था - बस, अब और आगे चल नहीं पाऊँगा; यदि यहीं ठहर गया तो जीवित नहीं बच पाऊँगा! गहराए हुए अंधेरे में एक बार फिर आखिरी उम्मीद से चारों तरफ देखा... अचानक दूर एक छोटे से दिये की रौशनी दिखाई दी, और उसकी उम्मीद फिर जाग उठी। उसने फिर हिम्मत बांधी और थके हुए पैरों के साथ उस ओर चल पड़ा। वहाँ तक पहुँचते पहुँचते वह इतना थक चुका था कि अब उसमें खड़े रहने की भी ताकत नहीं रह गयी थी। दीये की धीमी रौशनी झोंपड़ी की टूटी दीवार की दरार से बाहर आ रही थी। दीवार का सहारा लेकर उसने उसी दरार से अंदर झांका तो देखा कि एक व्यक्ति पुरानी सी रज़ाई में लिपटा बेसुध सा सो रहा था। उसने काफी आवाज़ दी, चिल्लाया उस व्यक्ति को उठाने के लिए, लेकिन वह नहीं जागा। मरता क्या न करता, वह झोंपड़ी में घुस गया। वहां एक ही चारपाई थी और एक ही रज़ाई; और यह व्यक्ति भी उस बेसुध सो रहे व्यक्ति के साथ उसी रज़ाई में घुस कर सो गया। सुबह जब उसकी आँख खुली और उसने उसकी ओर देखा जिसके साथ वह रात भर सोया था, तो उसकी आँख खुली कि खुली रह गयी; काटो तो खून नहीं... ओ हो, ये क्या हो गया! जिसके साथ वह सारी रात सोया रहा, वह चेचक के दानों से भरी एक लाश थी। वह आदमी शत्रु के हाथ से तो बच निकला पर अन्तत: खुद ही कहाँ जा गिरा! कितने ही ऐसे हैं जो शत्रु-शैतान के हाथ से तो बच निकले, पर अब इस अन्त समय में कहाँ आ गिरे हैं। “इस कारण वह कहता है, हे सोने वाले जाग और मुर्दों में से जी उठ तो मसीह की ज्योति तुझ पर चमकेगी (इफिसियों ५:१४)।”

किसने हमें रोक दिया, कौन सी ऐसी बात है जिसने हमारे बढ़ते और फलते जीवन को रोक दिया “तुम तो भली-भांति दौड़ रहे थे...” (गलतियों ५:७)। प्रकाशितवाक्य में पवित्रआत्मा अपने अंतिम सन्देश में उन विशवासियों से कहता है जो मन फिराने का सन्देश देते हैं कि अब तुम्हें पहले खुद मन फिराने की आवश्यकता है। 

कहीं ऐसा तो नहीं कि नया जीवन पाए लोग किसी पुराने पाप से बंधे खड़े हों? रोमन लोग बड़ी भयानक सज़ाओं का उपयोग करते थे। उनमें से एक सज़ा थी कि वह किसी ज़िन्दा अपराधी के साथ एक लाश ऐसे बांध देते थे कि उसके हाथ के साथ हाथ, पैर के साथ पैर, पेट के साथ पेट और गर्दन के साथ गर्दन। इस तरह लाश के साथ बंधी दशा में वह अपराधी छोड़ दिया जाता था। धीरे-धीरे जब लाश सड़ना शुरू होती थी तो वह ज़िंदा अपराधी भी उसके साथ सड़ना शुरू हो जाता था। यह एक दहशत्नाक और भयानक मौत होती थी। अगर किसी जीवित विश्वासी के साथ ऐसे मरे हुए काम बंधे हैं तो उसके जीवन की क्या दुर्दशा होगी? कुछ लोग ऐसे तो नहीं जिन्हें आप मन से माफ न कर पा रहे हों? जीवित जीवन के साथ कोई और छिपा हुआ पाप, व्यभिचार या कोई और मरा हुआ काम, बंधा तो नहीं है? सारी सृष्टि का सबसे बुरा वक्त चल रहा है। परन्तु परमेश्वर ने इस बुरे वक्त में मुझे और आप को सबसे अच्छा मौका दिया है कि हम ऐसे मरे हुए कामों से मन फिरा लें। “... हे मेरे लोगों उसमें से निकाल आओ कि तुम उसके पाप में भागी ना हो, और उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर ना आ पड़े” (प्रकाशितवाक्य १८:४)।

रोमी गवर्नर पीलतुस ने पूरी कोशिश की, कि प्रभु यीशु मसीह को छोड़ दिया जाए, क्योंकि वह उसको छोड़ देना चाहता था। उसने उसको छुड़ाने की एक युक्ति की। पर महयाजकों ने प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए लोगों को उकसाया। उन्हें मालूम था कि गवर्नर पीलतुस भीड़ का दबाव नहीं झेल पाएगा। पीलतुस जानता था कि प्रभु यीशु को इन धर्म्गुरूओं ने जलन और बदला लेने के भाव से पकड़वाया है (मर्कुस १५:१०)। इस समय पीलतुस ने बड़ी समझदारी से इस समस्या का समाधान खोजा। यह उसके राजनैतिक अनुभव और तेज़ बुद्धी का कौशल था। उसने इस मौके पर यीशु मसीह और एक हत्यारे - बरअब्बा, दोनों को लोगों के सामने खड़ा किया और इस्रालियों से कहा कि इन में से एक को चुन लो। वह जानता था कि बरअब्बा जैसे अपराधी को इस्राएल में फिर से खुला छोड़ देना, न केवल इस्राएलियों के लिये खतरनाक था, बल्कि उनके लिए शर्मनाक बात थी। उसने उन से कहा, तुम्हारे इस राष्ट्रीय पर्व पर तुम्हारी प्रथा है कि किसी एक अपराधी को जिसे तुम चाहते हो, छोड़ दिया जाए। तो अब इन दोनो में से एक को चुन लो। पर वहाँ एक भी इस्राएली में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे उन धर्मगुरूओं की इच्छा के विरुद्ध प्रभु यीशु के पक्ष में बोलते। लोगों ने बरअब्बा को ही चुना (आदमी की अचूक से अचूक योजनाएं भी परमेश्वर की योजनाओं के सामने चूक जातीं हैं)। बरअब्बा का अर्थ है अपने बाप का बेटा ( बर=बेटा, अब्बा=पिता)। अजीब नाम है - अपने बाप का बेटा; हर कोई अपने बाप का बेट होता है! प्रभु यीशु ने यूहन्ना ८:४४ में कहा, “तुम अपने पिता शैतान से हो, तुम्हारा पिता शैतान है।” दूसरे अर्थों में, बरअब्बा का अर्थ हुआ शैतान का बेटा। एक तरफ परमेश्वर का बेटा था और दूसरी तरफ शैतान का, दोनों में से उन्हें एक को चुनना था, अन्ततः उन्होंने शैतान के बेटे को ही चुन लिया। आज भी हमारे सामने दोनों खड़े हो जाते हैं। परमेश्वर का पुत्र, परमेश्वर की इच्छा को लेकर खड़ा हो जाता है; शैतान का पुत्र, शैतान की इच्छा को लेकर खड़ा हो जाता है। अब फैसला हमारे हाथ है कि हम किसे चुनें और किसे ठुकराएं!

जो गया, सो गया; फिर न लौटा

यहूदा इस्किरोती ने सोचा, यह पैसा कमाने का मौका है। फरीसियों ने सोचा, यह बदला लेने का मौका है। चेलों ने सोचा, दांए-बांए बैठकर मन्त्री बनने का मौका है। एक डाकु ने सोचा, ये ही नरक से बच निकलने का मौका है। मौका हमेशा नहीं रहता, मौका हमेशा नहीं मिलता। मेरे और आपके लिए कुछ कर लेने का यही एक मौका है। हम अपनी लापरवाही से बहुत से मौके पहले गवाँ चुके हैं, कहीं यह हमारा आखिरी मौका न हो। कहीं यह साल भी हमारा आखिरी साल न हो।

शेष फिर

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

संपर्क दिसम्बर २००८: अजीब सी बात


आपको बड़ी अजीब सी बात बताता हूँ। एक बुढ़िया थी जो बचपन में ही मर गई। दिमाग़ इस बात को स्वीकारता नहीं। जी हाँ, बुढ़िया मरी हुई दशा में पैदा हुई, मरी हुई दशा में जीवन जीया और मरी हुई दशा में मरकर हमेशा की मौत में चली गयी। जो पाप की दशा में हैं वो मृत्यु की दशा में हैं। वे जीवित कहलाते तो हैं पर वास्तव में हैं मरे हुए। दाऊद कहता है, “मैंने पाप की दशा में स्वरूप धारण किया”(भजन ५१:५)। वास्तविक जीवन तो नये जीवन से ही शुरू होता है। जैसे ही पाप क्षमा होते हैं हम वास्तविक जीवन पाते हैं।

अजीब सी बात है, मुँह से पेट में डालते समय सोचते हैं - साफ है? सही है? कहीं सड़न तो नही? पर मन में गन्दे विचार, विरोध बिना सोचे समझे डालते रहते हैं जैसे कि मन नहीं कोई कचरे का डिब्बा हो! “सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर” (नीतिवचन ४:२३)।

अजीब सी बात है, सूप (छाज) और छलनी में अन्तर है। सूप व्यर्थ(थोथी) वस्तुओं को बाहर कर देता है और अच्छी वस्तुओं को रख लेता है। छलनी व्यर्थ वस्तुओं को अपने अन्दर रख लेती है और अच्छी वस्तुओं को बाहर कर देती है। मेरे पास छलनी जैसा मन है जो हर अच्छी वस्तु को बाहर निकाल देता है और बुराईयों को सालों तक अन्दर रखे रहता है; और प्रभु के हाथ में सूप है, “उसका सूप उसके हाथ में है” (मत्ती ३:१२)। जो प्रभु के सूप (संगति) में बने रहते हैं वे पल-पल पवित्र होते रहते है। संगति का एक नाम संजीवनी है जो हम में जीवन का संचार बनाए रखती है।

अजीब सी बात है, आदम और हव्वा को परमेश्वर ने सब कुछ दिया, बस एक लंगोट नहीं दिया! लंगोट की ज़रूरत तब होती है जब जीवन में खोट होता हैं। खोट होता है तब ही हम छिपते और छिपाते हैं। प्रभु न तो आपसे नोट मांगता है और न ही वोट। वह तो आपके मन का खोट मांगता है - “... भीतर वाली वस्तुओं को दान कर दो, तो देखो, सब कुछ तुम्हारे लिए शुद्ध हो जाएगा” (लूका ११:४१)।

अजीब सी बात है, पर बात सजीव है। प्रभु न तो स्वर्ग का लालच देता है न ही नर्क में डालने की धमकी। न ही वह किसी नए धर्म का बोझ आप पर लादना चाहता है। वह तो आपको पाप के बोझ से आज़ादी देना चाहता है। “हे बोझ से दबे लोगों मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा” (मत्ती ११:२८)।

अजीब सी बात है, एक बहुत धनवान व्यापारी ने सिर्फ एक मोती के लिए अपना सब कुछ बेच डाला। वही मोती उसका सारा धन हो गया। उस मोती के लिए सच मानो वह कंगाल हो गया। यही मोती उसके आज, कल और अनन्त्काल के आनंद का कारण है। जहाँ उसका धन है वहाँ उसका मन है (मत्ती ६:२१)। जी हाँ, ‘आप’ ही उसका धन हैं।

अजीब सी बात है मन मानता ही नहीं। हमेशा संसार की तरफ ही बहकता और बहता है, जैसे पानी जो हमेशा नीचे की तरफ ही बहता है। पानी को पात्र ही संभाल कर रख पाता है। मन को परमेश्वर के वचन का मनन ही संभाल कर रख पाता है। इसलिए वचन को मन में अधिकाई से बसने दो (कुलुस्सियों ३:१६)।

अजीब सी बात है, आपके पास एक आग है जो जीवन भर बहुतों को झुलसाती है। उसकी जलन बहुत से लोग जीवन भर सहते रहते हैं। जीभ छोटी है पर उसके थोड़े शब्द में बड़ी आग लगाने की सामर्थ है। ज़रा शब्द गड़बड़ाए नहीं कि घर में और मंडली में आग लग जाती है। छोटी सी आग भरे पूरे जंगल में आग लगा देती है (याकूब ३:१६)। कहते हैं वाणी, वीणा का काम करे तो भला है। लेकिन हमारी वाणी कई बार अग्निबाण का काम करती जाती है। इसलिए जो शब्द नुक्सान करें उनसे ज़रा चौकस रहिए।

अजीब सी बात है नफरत का पाप ज़िन्दा पाप है जो ज़िन्दगी को मुर्दा बना डालता है। इसलिए दूसरों को माफ करके हम अपने ऊपर ही दया करते हैं। “बुराई को भलाई से जीत लो” (रोमियो १२:२१)। दुश्मनों को दोस्त बना लेना ही वास्तविक विजय है।

अजीब सी बात है कुछ कहते हैं कि तुमने धर्म की ग़ुलामी छोड़ दी पर अब इस किताब की ग़ुलामी करते हो। शायद उन्हें मालूम नहीं कि इस किताब ने ही उन पापों के ग़ुलामों को पाप से आज़ादी दी है।

अजीब सी बात है एक स्त्री ने प्रभु के पाँव पर ३०० दिनार का इत्र उन्डेल दिया। उसने ऐसा क्यों किया? उसके सामने प्रभु के लिए ३०० दिनार की कोई कीमत नहीं थी। पर यहूदा इस्किरोती के लिए ३० सिक्कों के सामने प्रभु की कोई कीमत नहीं थी; उसकी तो सोच थी - ऐसा हो या फिर वैसा हो, जैसा भी हो बस पैसा हो!

अजीब सी बात है यह बात आपके हाथ में नहीं है कि आप मौत को टाल सकें। पर आप मौत को सुधार सकते हैं। मौत के मातम को अनन्त आनंद में बदल सकते हैं, शोक को अनन्त शांति में बदल सकते हैं - यह आपके हाथ में है। बस आप अपना हाथ परमेश्वर की ओर फैलाएं और कहें, “हे यीशु, मुझ पर दया करें।”

रविवार, 19 अप्रैल 2009

संपर्क दिसम्बर २००८: ये दुआ, अब दवा बन जाए



बीरबल के अनुसार चौपाए जानवरों में बिल्ली को कभी सिखाया नहीं जा सकता। अकबर के कुशल साथियों ने कुछ महीनों में ही १० बिल्लियों को प्रशिक्षित कर डाला। अब अकबर ने बीरबल को एक शाम के खाने पर बुला कर दिखाया कि दसों बिल्लियाँ कैसे एक पंक्ति में खड़ी रहती हैं, उनके सिरों पर प्लेटों में मोमबत्ती जलाकर रख दी जाती है और राजा उन मोमबत्तीयों की रौशनी में शाम का खाना खाता है। बीरबल ने आश्चर्यचकित होकर राजा से पूछा, “महाराज, क्या ये रोज़ ऐसा ही करती हैं?” राजा ने कहा, “कल फिर आकर देख लेना।” अगले दिन बीरबल आया और राजा के साथ खाने पर बैठा। बिल्लियाँ बड़े अनुशासन से अपने सिरों पर प्लेटों में मोमबत्तियों को लिये खड़ी थीं। तभी बीरबल ने चुपके से अपनी शेरवानी में रुमाल में लिपटा हुआ एक छोटा चूहा नीचे गिरा दिया। चूहा गिरकर जैसे ही भागा, सारी बिल्लियों ने अपना अनुशासन एक तरफ रखा और उस चूहे के पीछे भागीं। बीरबल ने एक व्यंग भरी मुसकान से राजा की तरफ देखा; राजा का मुँह खुला का खुला रह गया, उसके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे।

इन्सान के पास भी एक ऐसा ही मन है जो सालों सीखता रहता है। परन्तु जैसे ही परिक्षा सामने आती है, सालों से सीखी सारी शिक्षा को एक तरफ रखकर वही कर डालता है जो नहीं करना चाहिए, और वही बोल जाता है जो नहीं बोलना चाहिए।

प्रभु का वचन कहता है वे सीखते तो रहते हैं पर सच्चाई की पहिचान तक कभी नहीं पहुँचते (२ तिमुथियुस ३:७)। वे सीखकर बाहरी बदलाव तो ले आते हैं पर स्वभाव का बदलाव नहीं। ऐसे लोग धीरे धीरे परमेश्वर की बात सुनना बंद कर देते हैं और तब परमेश्वर भी उनसे बात करना बंद कर देता है। जो अपने पाप देखना बंद कर देता है, वह दूसरों के पाप देखना शुरू कर देता है।

फरीसी हमेशा इस सोच के सहारे जीते थे कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं। पर उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि प्रभु हमारे बारे में क्या सोचता है? वे हमेशा ही अपनी कमज़ोरियाँ छिपाते थे। उनका अहंकार उन्हें उनके पापों को मानने नहीं देता था।

ईसप की कहानीयों को, जिनमें आदमी के स्वभाव की सच्चाई छिपी है, आपने कितनी ही बार सुना होगा। लोमड़ी ने अँगूरों पर छलांग लगाई, लेकिन छ्लांग छोटी पड़ गई; गुच्छा कुछ ज़्यादा ही ऊंचा था। कई बार कोशिश करने ने पसीने पसीने कर डाला। आखिर उसने ध्यान से इधर-उधर देखा कि कहीं किसी ने देखा तो नहीं, फिर उसने अपने उपर की धूल झाड़ी और लंगड़ाती हुई जैसे ही आगे बढ़ी, झाड़ियों में छिपे खरगोश ने चुटकी ली, “चाची क्या हुआ?” लोमड़ी बोली, “मैं तो छलांग लगा लगाकर सिर्फ देख ही रही थी। अँगूर तो अभी कच्चे हैं, जब पक जाएंगे तोड़ने तो तब आउँगी।” आदमी का स्वभाव इस कहानी में दिखाई देता है - वह अपनी कमज़ोरी मानता नहीं वरन ढाँपता है। लोमड़ी आदमी के अन्दर की चालाकी और पाखंढ को दिखाती है, और खरगोश हमारे विवेक को जो बार बार हमारी कमज़ोरियों और मक्कारियों पर ऊंगली रखता है। अहंकार मरता नहीं है, सिर्फ छिप जाता है। हम उसे अपने शब्दों से छिपाए रखते हैं और यह दिखाते हैं कि हम में अहंकार नहीं है।

यहुदियों का मन्दिर पैसे के लिए, पैसे के द्वारा, पैसे के लालची लोगों के द्वारा चलाया जा रहा था। ऐसे मन्दिर को वे परमेश्वर का मन्दिर कहते थे। परन्तु जब प्रभु वहाँ गया तो उसने देख कि वहाँ परमेश्वर का मन्दिर नहीं, डाकुओं की खोह है। मनुष्य के देखने और परमेश्वर के देखने में कितना अन्तर है। आज जब परमेश्वर यानि परमेश्वर का वचन आपके मन में झाँकता है तो क्या पाता है? क्या आप भी वचन के प्रकाश में अपने मन में कुछ देख पा रहे हैं?

क्या आपने अपने बारे में कभी कुछ सोचा? या फिर आप सोचना ही नहीं चाहते? जो आदमी सोचने के दरवाज़े बन्द कर देता है वह वास्तव में बड़ी बेवकूफी करता है। पर हम आपको मजबूर कर रहे हैं कि आप अपने बारे में कुछ सोचें। क्योंकि हम अपनी पहिचान भूल चुके हैं, कि वास्तव में मैं क्या हूँ। जो सिर्फ दूसरों में दोष देखता है, वह अपने दोष कभी नहीं देख पाता।

काश! दाउद की दुआ आज मेरे और आपके दिल की दुआ बन जाए - ‘... देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर! (भजन १३९:२४)।