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रविवार, 24 मई 2009

सम्पर्क अप्रैल २००३: संपादकीय

प्रभु यीशु की बड़ी दया से एक बार फिर सम्पर्क आपके सम्मुख आ पाया है। यह प्रभु के पवित्र पात्रों की प्रार्थनाओं का उत्तर है। सम्पर्क का सम्पादकीय तो केवल चौंकन्ना करने के लिए एक चौकीदार की चेतावनी मात्र ही है।
सोच
वास्तव में वचन तब ही काम करता है जब वह हमारे जीवन में उतर जाए। वरना तो वचन बाईबल के काग़ज़ी पन्नों पर ही रह जाता है। जैसे ही यह जीवित वचन हमारे जीवन में उतरने लगता है, हमारा जीवन उभरने लगता है।
एक कहानी है: एक गैस के गुब्बारे बेचने वाला अक्सर जब बच्चों से घिरा होता तब एक गैस भरा गुब्बारा हवा में छोड़ देता। गुब्बारे को हवा में लहराता हुआ ऊपर को उठता देख, बच्चे बड़े आतुर होकर उससे गुब्बारे खरीदते और उसकी आमदनी बढ़ जाती। एक दिन जब उसने ऐसा ही किया तो एक छोटे बच्चे ने पीछे से उसकी कमीज़ खींची, गुब्बारे वाले का ध्यान अपनी ओर करके उसके गुब्बारों की ओर इशारा किया और बड़ी मासूमियत से पूछा, “भईया क्या ये काला गुब्बारा भी ऐसे ही ऊपर उड़ सकता है?” गुब्बारे वाले ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, गुब्बारा अपने रंग से नहीं, पर जो उसके अन्दर भरा है, उससे ऊपर ऊड़ता है।” यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है, जो अन्दर भरा है, वो ही हमें दिशा प्रदान करता है- संसार हमें नीचे अपनी ओर खींचता है और परमेश्वर का वचन हमें जीवन की ऊंचाईयों की ओर अग्रसर करता है।


ज़्यादतर विश्वासी एक ऐसा परमेश्वर चाहते हैं जो उनके मन के अनुसार उनकी इच्छाएं पूरी कर सके। जो इच्छाएं उनके अन्दर होती हैं, वही उनकी प्रार्थनों में भी बाहर आती हैं। पर परमेश्वर ऐसे लोगों को खोजता है जो उसके मन के अनुसार हों और जो उसकी इच्छा पूरी करना चाहते हों। हमारे प्रभु ने स्वयं के लिए प्रार्थना की-“हे पिता मेरी नहीं पर तेरी इच्छा पूरी हो।” चेलों को भी जो प्रार्थना उसने सिखाई, उसमें कहा, “जैसे तेरी इच्छा स्वर्ग में पूरी होती है, पृथ्वी पर भी हो।”

दाऊद परमेश्वर के मन के अनुसार व्यक्ति था। अपने लड़कपन से ही उसका विश्वास अपने परमेश्वर पर दृढ़ था। जब इस्राइलियों का सामना फिलिस्तियों की सेना से हुआ, तो ४० दिन तक एक गजराज सा विशाल फिलस्ती जिसका नाम गोलियत था, उन्हें ललकारता रहा और उन्का मज़ाक उड़ाता रहा। पर किसी इस्राइली में उसका सामना करने की हिम्मत नहीं थी। वे तो बस गोलियत को देखकर डरते और काँपते ही रहे, क्योंकि पूरी इस्राइली कौम की सोच में शक था, किसी को भी अपने परमेश्वर पर और उसकी सामर्थ पर विश्वास नहीं था। क्योंकि उनकी सोच सही नहीं थी, इस लिए कुछ करने की शक्ती भी उन्में नहीं थी। परन्तु परमेश्वर के प्रति सही सोच रखने वाले दाऊद ने, गोलियत की तुलना में कद और उम्र में बहुत छोटे होने और युद्ध विद्या में निपुण न होने के बावजूद भी, केवल परमेश्वर पर अपने विश्वास की सामर्थ से गोलियत को परास्त किया और इस्राइलियों को एक बड़ी विजय दिलवाई। परमेश्वर का वचन कहता है, “दुष्ट अपने...सोच विचार छोड़कर यहोवा की ओर फिरे...(यशायाह ५५:७)।” जो उसके वचन के अनुसार सोचते हैं, वो उससे सामर्थ भी पाते हैं। जो अपनी सोच में ही हार देखने लगते हैं, वे पहले से ही मान लेते हैं कि वे हार चुके हैं, और यह हार का डर उन्हें कुछ करने नहीं देता। कुछ लोगों ने सोच लिया है कि अब प्रार्थना से कुछ होने वाला नहीं है, इस अविश्वास के कारण उनके लिए कुछ होने वाला भी नहीं है। पर जो प्रभु आपके अन्दर है वह हारा हुआ नहीं है कि कुछ कर न सके। उसमें पूरी सामर्थ है कि वो आपकी हार को जीत में बदल दे, विश्वास से उसकी ओर हाथ तो बढ़ाइये। अपनी नहीं, उसकी सामर्थ और क्षमता पर भरोसा कीजिए।

बहुत बार अच्छे लोगों के साथ भी बुरी घटनाएं घट जाती हैं। १९१४ में थॉमस एडिसन नामक ६७ साल के वृद्ध वैज्ञानिक की करोड़ों की फैक्ट्री में आग लग गयी। उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसने अपनी सारी उम्र की मेहनत की कमाई को जलता हुआ देखा, और बोला-“जो भी होता है, अच्छे के लिए ही होता है (रोमियों ८:२८)। इस आग में हमारी कमजोरियां और कमियां भी जलकर राख हो गयीं हैं। परमेश्वर की दया से अब हम नये सिरे से शुरू करंगे।” सिर्फ तीन हफते बाद ही उसने फोनोग्राफ की खोज कर डाली।

प्रभु आपको हारे हुए जीवन जीने के लिए विश्वास में नहीं लाया, बल्कि आपकी सोच ने आपको हार और निराशा में ला खड़ा किया है। निराश व्यक्ति अपनी साधारण सोच को भी खो देता है। ऐसा हारा हुआ जीवन, मौत से ज़्यादा, जीने से डरने लगता है। आप अपने विचारों को सुन सकते हैं। आप क्या सोचते हैं; कैसे सोचते हैं; क्या हमेशा उल्टी, गन्दी और विरोध की बातें ही सोचते हैं? बाईबल बताती है के मन में ग़लत सोचने भर से ही पाप हो जाता है (मत्ती ५:२८)। प्रार्थना करें कि प्रभु आपकी ऐसी “सोच” ही बदल डाले।

संगति
सुअरों के बाड़े में गन्दगी के सिवाय क्या मिलेगा? पवित्र लोगों की संगति में रहने से हमारी सोच भी पवित्र होने लगती है। हम कोई क्यों न हों, अकेले हों या दुकेले, मर्द हों या औरत, जवान हों या बूढ़े, रो़ज़गार वाले हों या बेरोज़गार, लेकिन प्रत्येक विश्वासी के लिए सही संगति सब से ज़रूरी है।
संगति या मण्डली अपने सबसे बुरे दिनों में से निकल रही है। शैतान का पूरा प्रयास है कि मण्डली की सामर्थ समाप्त हो जाए, मण्डली चाहे बची रहे। अर्थात केवल ‘नामधारी’ मण्डलियां रहें, जहाँ प्रार्थना-आराधना तो हो पर उनमें सामर्थ न हो। प्रभु ने तो विजयी मण्डली बनाई और उसे ऐसी सामर्थ दी कि उस पर अधोलोक के फाटक भी विजयी नहीं हो सकते (मत्ती १६:१८) और जिसकी पहचान उसके सदस्यों के आपसी प्रेम से होती है (यूहन्ना१३:३५)। यही प्रेम और एक मनता मण्डली की सामर्थ है, और इस एक मनता से जो चाहो वह करवा लो।

अगर विश्वासी के जीवन में परमेश्वर की उपस्थिति नहीं है तो वह आम आदमी की तरह है। यदि प्रभु की मण्डली में परमेश्वर की उपस्थिति नहीं है तो वह मण्डली, कमरे में एकत्रित कुछ लोगों की भीड़ मात्र है, प्रभु की मण्डली नहीं। मण्डली में जब आपस में प्रेम और एक मनता नहीं रहती तब उसकी सामर्थ समाप्त हो जाती है। कितने तो प्रभु के घर में सालों से रहते हैं पर फिर भी मन में बैर और विरोध से भरे रहते हैं; स्वर्ग जाने का दावा करते हैं पर मन में नरक पालते हैं। एक वास्तविक विश्वासी को अपने शत्रुओं से भी प्रेम रखना है (मत्ती ५:४४), फिर मण्डली के अपने भाई-बहिनों से विरोध रखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। मैं मण्डली के सदस्यों और सेवकों को समझाना चाहता हूँ कि परमेश्वर अपना न्याय अपने घर से ही शुरू करेगा (१ पतरस ४:१७)। क्या आपको मालूम है कि अपने घर में वो न्याय कहाँ से शुरू करेगा? सेवकों से और अपने पवित्र स्थान ही से आरंभ करेगा, “उन्होंने पुरनियों से आरंभ किया जो भवन के सामने थे (यहेजकेल ९:६)”।

जब हम दूसरों को क्षमा नहीं करते तो हम परमेश्वर की क्षमा करने वाली आत्मा का अपमान करते हैं। न्याय के दिन कुछ गाएंगे और कुछ रोएंगे चिल्लाएंगे। आप किनके साथ होंगे?

परिश्रम
उद्धार तो सहज है, एक सच्ची क्षमा याचना की प्रार्थना से प्राप्त हो जाता है। पर आत्मिक सफलता और आशीश, मेहनत और ईमान्दारी पर निर्भर करती है। पौलुस को, आत्मिक रूप से, इतनी बड़ी सफलता कैसे मिली? पौलुस कहता है कि “मैंने सबसे बढ़कर परिश्रम किया, तुम्हें वैसा परिश्रम करना है जैसे तुमने मुझे करते देखा है और अब भी सुनते हो कि मैं वैसे ही करता हूँ (फिल्लिप्यों १:३०)”। सफलता कभी तुक्के से हाथ नहीं लगती, संकरे मार्ग में सख़्त मेहनत की ज़रूरत होती है। ज़्यादतर विश्वासी आराम के दायरे में जीना चाहते हैं। आप जानते हैं फिर भी वैसे जीते नहीं। आत्मिक अनुशासन मसीही जीवन में अनिवार्य है, इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है। कभी बाईबल पढ़ना छूट गया तो कभी संगती गोल कर गये। पारिवारिक प्रार्थनाओं का भी कुछ ऐसा ही हॉल है। उपवास से डर लगता है। बस उतना परिश्रम करते हैं जिससे काम चल जाए और जान छूट जाए “हे निक्कमे और आलसी दास तू जानता था (मत्ती २५:२६)”। जीवन में जीतने की इच्छा तो सभी रखते हैं, पर मात्र इच्छा रखने से तो जीत नहीं मिलती, उस जीत के अनुरूप परिश्रम भी तो करना पड़ता है। काम तो काम करने से ही होता है।

समस्याऐं
हमारा प्रभु बहुत परिश्रम करके जीया, लेकिन हमारे बीच आज तमाश्बीन विश्वासियों की कमी नहीं है। मण्डलीयाँ ऐसों से भरी पड़ीं हैं जो दूसरों की नाप-तौल करते रहते हैं, पर खुद कुछ नहीं करते। जो घोड़ा बोझ ढोता है वह कभी दुलत्ती नहीं मारता; दुलत्ती वही चलाता है जो कुछ बोझ नहीं ढो रहा होता।

आपका ऊंचा उठना शुरू हुआ नहीं कि टाँग खींचने वालों की भीड़ इकट्ठी होनी शुरू हो जाती है। ऐसे घटिया किस्म के लोग हमेशा मेहनत करने वालों से इर्ष्या करते हैं। मण्डली में ईमानदार और मेहनती विश्वासी अलग नज़र आते हैं। ये लोग ज़िद्दी नहीं होते, न बहाने गढ़ते हैं; वरन विनम्र, तहज़ीबदार और कुर्बानियाँ करने वाले होते हैं, अपनी गलती मान लेते हैं, दिखावे नहीं करते। ध्यान रहे, जितनी सफलता मिलेगी उतने आलोचक और रुकावट डालने वाले खड़े होते रहेंगे। पौलुस कहता है, “विरोधी बहुत हैं (१ कुरिन्थियों १६:९)”। शैतान ने इन लोगों पर प्रभु का काम बिगाड़ने का दायित्व सौंपा है। इनका आत्मिक अंधापन हमेशा दूसरों के दोष देखता है। इनके अंदर एक हिंसक, बदला लेने वाला स्वभाव रहता है। ये खुद कभी नहीं सीखते पर दूसरों को सिखाने का मन बनाए रखते हैं। इन लोगों के सहारे शैतान हमारी हिम्मत तोड़ना चाहता है जिससे या तो हम शैतान के शिकार हो जाएं या उसके साथ समझौता कर लें, और प्रभु का काम अवरुद्ध हो जाए।

कितने लोग जो इस पत्रिका को पढ़ रहे हैं वह अपनी हालत जान गये होंगे, पर अपने पाप को नहीं मानेंगे। अपने विश्वासी साथियों के पास जाकर, मण्डली के साथ अपने संबन्धों को ठीक-ठाक करने की कोशिश भी नहीं करेंगे। पवित्रआत्मा चेताता है कि उनकी यह ढिटाई उन्हें बहुत महंगी पड़ेगी। कितनों को सच्चाई स्वीकारने में शर्म आती है। मक्कारी की मार ने उनकी गवाही को ही मार डाला है। पहले जो परिश्रम किया उसे खुद ही रौंद डाला है।

किसी ने व्यंग्य किया कि हमारे राजनेताओं से ज़यादा ईमानदार तो वेष्याएं होती हैं। ऐसे गिरे नेता भी, मौका पड़ने पर आपस में बात कर, गिले-शिक्वे पीछे छोड़ कर, एक साथ हो लेते हैं। पर कितने ऐसे विश्वासी हैं जो आपस में बात तक करने को भी राज़ी नहीं होते। उनका अहंकार उन्हें माफी मांगने और माफी देने से रोकता है। आपसे ज़्यादा प्रभु आपको जानता है। अपने को उससे छुपना मात्र बेवकूफी है। क्या अपने एहसास किया कि जब आप इस पत्रिका को पढ़ रहे हैं तो प्रभु आप से बात कर रहा है? अगर आप उसकी आवाज़ सुन रहे हैं तो दिल सख़्त न करें। अब फैसले के पल आ पहुँचे हैं।

इतनी सीधी और सरल सच्चाई है कि कम से कम समझ वाला भी समझ सकता है। मौके हमेशा आपका इंतिज़ार करते नहीं रहेंगे। शैतान चाहता है कि आप उस वक़्त तक इन्तज़ार करते रहें जब कोई कुछ नहीं कर पाएगा। अगर कोई पाप आपके सीने में खटक रहा है तो अहंकार छोड़ उठिए और अपने प्रभु और उसके लोगों के साथ अपने संबन्ध ठीक-ठाक कर लीजिए। प्रभु आपकी हार को भी जीत में बदलने की सामर्थ रखता है।

सम्पर्क का सम्पादक आपसे निवेदन करता है कि आप उसे भी अपनी प्रार्थना में सम्भाले रखें।

- सम्पर्क परिवार

गुरुवार, 21 मई 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००३: मैंने प्रभु यीशु को कैसे जाना

मेरा नाम अनुरोध सक्सैना है। मेरा जन्म लखनऊ में और पालन पोषण उत्तर प्रदेश के कानपुर ज़िले में हुआ। परिवार में किये जाने वाले सभी रीति-रिवाज़ों को देखकर मैंने भी उन्हें अपनाया। नौवीं कक्षा से मैंने घर के पास स्थित एक प्रसिद्ध मन्दिर में अपने एक अच्छे मित्र के साथ, जो उस मन्दिर में जाता था, जाना शुरू किया और लगातार तीन साल तक जाता रहा। मन्दिर जाने का उद्देश्य अच्छे अंक प्राप्त करना और विवेक शुद्ध रखना था। अपनी पढ़ाई की मेज़ पर भी मैं ईश्वर की मूर्ति के सामने धूप जलाता था। लेकिन यह सब करने के बाद भी मुझ में इन सब बातों के लिए न तो कभी कोई लगन हुई और न ही कोई परिवर्तन आया।

अपनी बारहवीं कक्षा पास करने के बाद मैंने रूड़की विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पास की, जिसके द्वारा मुझे रूड़की विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया और मैं अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने रूड़की आ गया। बहुत शीघ्र ही मैं हास्टल की ज़िन्दगी और वहाँ की स्वतंत्रता का मज़ा लेने लगा। साथ ही मैंने एक मन्दिर भी ढूँढ लिया और मैं अक्सर वहाँ जाने लगा।

एक दिन एक व्यक्ति ने मुझे विश्वविद्यालय में होने वाली एक प्रार्थना सभा में, जिसमें वहीं के कुछ छात्र आते थे, आमंत्रित किया। वहाँ पारमेश्वर के वचन का अद्धयन भी होता था। सभा के बाद एक भाई ने मुझे नए नियम की एक प्रति दी और फिर से अगली सभा में आने के लिए भी आमंत्रित किया। इस तरह मैं बार-बार वहाँ जाने लगा। कुछ ही समय के छोटे से अन्तराल में मुझे यह एहसास हो गया कि परमेश्वर और उसका वचन बहुत पवित्र हैं और उसकी दृष्टी में एक छोटा सा ग़लत विचार भी पाप के बराबर है।

अब मैं इससे पूरी तरह सहमत था कि केवल यही परमेश्वर ‘परमेश्वर’ कहलाने के योग्य है। इससे पहले मेरी धारणा यह थी कि प्रभु यीशु इसाई धर्म का ईश्वर है। लेकिन अब मुझे समझ में आया कि प्रभु यीशु की वास्तविक्ता क्या है और वह इस संसार में क्यों आए। मुझे यह निश्चय भी हो गया कि यह बात बिल्कुल सत्य है कि प्रभु यीशु ने क्रूस पर इस जगत के पापियों के लिए अपनी जान दी और वह मर कर फिर तीसरे दिन जी उठे। उन्होंने अपना बहुमूल्य लहू हमें शुद्ध करने के लिए बहाया। यदि हम उन्हें अपने हृदय में ग्रहण करते हैं तो हम पापों से क्षमा और अनन्त जीवन पाते हैं।

यह सुसमाचार सुनने के बाद मैंने कई बहानों में छिपना शुरू कर दिया जो मैं ईमान्दारी से आपके सामने प्रभु की महिमा के लिए रखना चाहता हूँ।

१. यदि मैंने प्रभु यीशु के पीछे चलने क निर्णय कर लिया तो मुझे बहुत उदास रहना पड़ेगा। मैं सोचता था कि यदि मैं विश्वासी बन गया तो मुझे लम्बा और दुखी चेहरा लेकर इस संसार में घूमना पड़ेगा। मुझे बस सीधे मूँह चलना पड़ेगा, न तो मैं दाएं देख सकूँगा और न बाएं। मेरे पास कोई खुशी नहीं होगी जब तक मैं दूसरे संसार में न पहुँच जाऊं। दूसरे शब्दों में यूँ कहिए कि मुझे दुखी, खिन्न और उदासी से भरा जीवन जीना पड़ेगा। न तो मैं सिनेमा देखने जा पाऊंगा और न ही कोई सांसारिक आनंद ले पाऊँगा।
लेकिन नहीं प्रिय पाठक मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि केवल प्रभु यीशु ही है जो हमारे जीवन में सच्ची खुशी, शान्ति और आनंद देता है। वह ‘शान्ति का राज्कुमार’ है (यशायह ९:६), परन्तु कठिन तो पापी का मार्ग होता है (नीतिवचन १३:१५)।

२. मैं सोचता था कि यदि मैंने यह निर्णय कर लिया तो मैं विश्वास में नहीं रह सकूँगा और निश्चय ही गिर जाऊंगा, क्योंकि मैं उस स्तर पर चल नहीं पाऊंगा।
लेकिन नहीं प्रिय पाठक, मैं आपको बताना चाहता हूँ यह सत्य नहीं है। जब्कि मैं अभी भी कमज़ोर हूँ और बहुत सी गलतियां कर जाता हूँ लेकिन प्रभु यीशु हमें कभी नहीं छोड़ता, कभी नहीं त्यागता। हम सब उसकी भेड़ें हैं और वह हमारा सच्चा चरवाहा है, जिसने हमारे लिए अपने प्राणों को दे दिया, वही हमारी रक्षा और अगुवाई करता है। वह हमारे लिए सदा जीवित है। हमारी निर्बलताओं और अज्ञानता में प्रभु यीशु ही हमारे प्रति सबसे अधिक धैर्य रख सकता है और रखता भी है; ताकि हमें अपने पाप के अंगीकार, उस पाप से पश्चाताप और उसकी क्षमा का अवसर सदैव उपलब्ध रहे। आप तभी खड़े रह पाएंगे जब परमेश्वर आपके साथ खड़ा होगा।

३. मैंने यह सोचा कि मैं इस निर्णय को कुछ समय के लिए टाल देता हूँ और इसके बारे में बाद में सोचूँगा, अभी तो मेरे पास बहुत पढ़ाई और काम है।
लेकिन नहीं प्रिय पाठक, प्रभु हमारे प्रति बहुत अनुग्रहकारी है लेकिन कोई यह नहीं जानता कि मृत्यु कब आकर इस अव्सर को छीन लेगी “मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है (इब्रानियों ९:२७)।” क्या आप उस आग की झील में अनन्त काल के लिए अपने जाने का ख़तरा मोल ले सकते हैं?

४. मैं यह सोचता था कि परमेश्वर की सेवा करना बहुत कठिन है।
लेकिन नहीं! यह मेरी ग़लतफहमी थी। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या परमेश्वर किसी का कर्ज़दार रह सकता है? क्या शैतान एक सरल स्वामी, और परमेश्वर एक कठिन स्वामी है? प्रभु इन विचारों को दूर रखे।

५. मैंने परमेश्वर के वचन को पढ़ने के लिए बहाना किया। मैंने सोचा कि यदि मैं एक ही बार में परमेश्वर के वचन को पढ़कर इसे समझ जाऊंगा तो ठीक है।
लेकिन नहीं! सूर्य के नीचे और पृथ्वी पर बाईबल के समान कोई भी पुस्तक नहीं है। प्रिय पाठक मैं आपको बताना चाहता हूँ कि कोई भी व्यक्ति जिसने परमेश्वर के वचन को शुरू से अन्त तक पढ़ा है, उसके बारे में ग़लत धारणा नहीं रख सकता। जब तक मैं स्वयं पूरी तरह ध्यान से पढ़ न लूँ, मैं कैसे अपनी राय उसके बारे में दूसरों पर प्रकट कर सकता हूँ? ऐसा करना तो झूठ बोलना होगा।

इन बहानों के साथ-साथ मेरे पाप भी बहुत थे और मुझे बहुत मुश्किल समय में से होकर गुज़रना पड़ा। फिर एक दिन, मैंने उपवास रखकर अपने पापों से पश्चाताप किया और प्रभु से प्रार्थना की कि मुझे अपने बहुमूल्य लहू से धो दे, और उसने मुझे निराश नहीं किया।

प्रिय पाठक, मैंने अपना हृदय खोलकर, अपने अन्दर के वो सब बहाने जो मुझे पश्चाताप करके प्रभु यीशु को अपना मुक्तिदाता ग्रहण करने से रोकते थे बता दिए हैं। इसलिए यदि आप में से कोई भी अपने आप को ऐसे ही किसी बहाने के पीछे छिपाए हुए है तो मेरा आप से बहुत विनम्र निवेदन है कि आप विलम्ब न करें। परमेश्वर का वचन कहता है-“देखो अभी वह उद्धार का दिन है (२ कुरिन्थियों ६:२)”। आप बहानों से छुटकारा नहीं पा सकते। जैसे मैंने इतना समय व्यर्थ बरबाद कर दिया, आप न करें।

मैं सुसमाचार के बारे में जनता था, जैसे आप में से बहुत सारे पाठक भी जानते होंगे; लेकिन सिर्फ जानना ही काफी नहीं है। परमेश्वर के वचन में लिखा है कि, “तुम सत्य को जानोगे और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा (यूहन्ना ८:३२)।” यह नहीं लिखा कि सत्य के बारे में जानोगे, परन्तु यह कि सत्य को जानोगे तब स्वतंत्रता मिलेगी। “परमेश्वर अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है (प्रेरितों के काम १७:३०)।” अपने दुष्ट कार्यों को त्याग कर उस क्रोध से भागो, ऐसा न हो कि तुम भी “बाहरी अन्धकार में डाले जाओ जहाँ रोना और दातों का पीसना होगा (मत्ती २५:३०)।”

प्रभु के अनुग्रह से मेरा विवाह एक विश्वासी लड़की से होने वाला है और मैं नौकरी भी कर रहा हूँ। मेरी प्रभु से यही प्रार्थना है कि जो भी इस गवाही को पढ़ते हैं, वो प्रभु यीशु को ग्रहण करने के लिए एक निर्णय भी ले सकें, जो पापियों का मित्र है। उसको ग्रहण करने में विलम्ब न करें।




सम्पर्क अक्टूबर २००३: मुझे मिल गया मेरा छुड़ाने वाला

मेरा नाम दीपक मसीह है और मेरा जन्म १९६९ में एक इसाई परिवार में हुआ। हम छः भाई हैं। जब मैं चार साल का था तब मेरे पिताजी का देहांत हो गया था। परिवार बड़ा और ग़रीब होने के कारण सब भाई छोटा मोटा काम करने लगे। मेरी मां भी एक मिशन स्कूल में आया का काम करती थी, इसलिए मुझे भी उस स्कूल में दाखिला मिल गया। घर के सब सदस्य काम करते थे, और कोई मुझे पूछने वाला न होने के कारण मैं छोटी ही उम्र में बिगड़ गया। छोटी कक्षा से ही मैंने स्कूल से भागकर सिनेमा देखना सीख लिया। इसी दौरान सिनेमा के बाहर खाने-पीने की दुकान लगाने वाले से मेरी दोस्ती हो गई। वहीं से मुझे शराब-सिग्रेट पीना, ब्किट ब्लैक करना और अन्य कई बुरी लतें लग गईं। यहीं से मेरा बुरा जीवन शुरू हुआ और बुराई में धंसता ही चला गया।

इसी बीच मेरी मुलाकात एक और लड़के से हुई जो कि मेरी तरह ही था और देखते ही देखते हम दोनों में बहुत गहरी दोस्ती हो गई। हम दोनो साथ रहते और सिनेमा देखते। आए दिन कहीं न कहीं लड़ाई-झगड़ा करना और किसी न किसी के साथ मार-पीट करना, यही हमारी दिनचर्या थी। अब यहां तक होने लगा कि हमारी बदमाशी का फायदा उठाने के लिए लोग हमें अपने लिए इस्तेमाल करने लगे।

एक दिन मैं और मेरा दोस्त ऐसे ही ‘काम’ से अलग-अलग गए। लौटने पर मुझे पता चला कि मेरे दोस्त ने किसी को जान से मार दिया और वह भाग गया है। इसलिए मुझे उसके परिवार को भगाकर, खुद भी भागना पड़ा। इस तरह पुलिस केस बनते चले गए और घर पर पुलिस का आना-जाना शुरू हो गया। मेरा दोस्त पकड़ा गया और उसे जेल हो गई। कुछ समय बाद वह जेल से छूट गया। इसके बाद ऐसी कई और घटनाएं हुईं। उसका परिवार बुरी तरह बरबाद हो गया और उसके पिताजी की उसके दुशमनों ने हत्या कर दी।

अब मैं बहुत बेचैन रहने लगा। पुलिस मेरे पीछे थी और मैं उस से छिपकर जी रहा था। रात को अगर पुलिस की जीप की आवाज़ सुनाई देती तो मेरी आंख खुल जाती। इसलिए मैं अपने घर की छत पर सोता था ताकि भागने में आसानी रहे। कई बार सोचता था कि मैं मरने के बाद नरक में जाऊंगा क्योंकि मेरे काम बुरे हैं। यदि आज मैं इन्हें छोड़ भी दूँ तो भी मेरे पहले पाप मुझे नरक लेकर जाएंगे ही, यदि नहीं छोड़ता तो कभी न कभी मेरे दुशमन मुझे मार डालेंगे। इसी उधेड़-बुन में मैं काफी परेशान रहने लगा। अब मुझे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो मुझे इन सब परेशानियों से छुटकारा दे सके।

इसी दौरान १९९२ में यू०पी० में नयी-नयी सत्ता में आयी भाजपा सरकार ने छोटे-बड़े सभी बदमाशों को पकड़कर मारना और जेल में डालना शुरू कर दिया। एक दिन किसी कारणवश हमारे यहाँ के एक लड़के को पुलिस ने पकड़ लिया और पूछ-ताछ के दौरान उसने हम सब के घर के पते बता दिये जिसके कारण हमारा एक साथी भी पकड़ा गया। हम फिर से अपनी जान बचा कर भागे। अब हम सब अलग-अलग थे। मैं सोचने लगा कि अब मैं क्या करूँ? मैंने निर्णय लिया कि मैं अपने जीवन को नये सिरे से शुरू करूंगा और मैं यह सब छोड़ दूँगा। लेकिन कुछ समय के बाद जब मैं घर वापस आया तो मेरे साथी भी वापस आ गये और फिर से वही दौर शुरू हो गया। एक दिन हम सब साथी एक व्यायामशाला इकट्ठे होकर में ताश खेल रहे थे, जोकि मेरे घर के करीब ही थी। लेकिन मेरा मन वहां नहीं लग रहा था और मैं कई बार वहां से गया। एक बार मैं दूसरे की छत से होकर अपने घर आया तो क्या देखता हूँ कि हमारे यहां कुछ लोग आये हुए हैं जो प्रभु यीशु के बारे में बता रहे थे। मैं उनको जानता था, उनमें से एक ने मुझसे बैठने के लिए कहा। मैंने कहा बस रहने दो मैं ऐसे ही ठीक हूँ, लेकिन मुझे ढोंगियों से नफरत है। उसने बुरा नहीं माना पर प्यार से कहा, “परखकर देखो परमेश्वर कैसा भला है (भजन संहिता ३४:८)।” जब तक परखकर नहीं देखोगे तो आप उसे जानोगे कैसे? मैंने वहां से जाने के लिए जैसे ही दरवाज़ा खोला तो एक अनजानी सी शक्ती ने मुझे रोक लिया। मैंने अपने मन में कहा कि सुनने में क्या बुराई है, कहीं यह चिपक थोड़ी ही जाएगी। मैं वहां रुक गया। वे क्या प्रचार कर रहे थे मुझे कुछ समझ में नहीं आया। उन्में से एक भाई नेत्रहीन था और वह अपने जीवन के बारे में गवाही देकर बता रहा था कि उसके जीवन को प्रभु यीशु ने कैसे बदल दिया। जब वह बताते हुए रो रहा था तो उसके साथ मैं भी रो रहा था। ऐसी खुशी मुझे इससे पहले कभी महसूस नहीं हुई थी। उस समय मैंने एक निर्णय लिया कि अब मैं इन लोगों के साथ रहूँगा, क्योंकि मैंने उनमें सच्चाई को देखा। उन्होंने मुझे बाईबल के नए नियम की एक प्रति देकर कहा कि इसे पढ़ना और प्रार्थना करके प्रभु को परखकर देखो। रात को सोने से पहले जब मैं उस नये नियम को पढ़ने बैठा तो बिजली चली गयी। मैंने प्रार्थना की तो बिजली आ गयी। यह मेरे लिए किसी आश्चर्यकर्म से कम नहीं था। मैंने प्रार्थना की कि प्रभु मुझे पाँच बजे उठा दीजिए और मैंने देखा कि मेरी आंख पाँच बजे से पहले ही खुल गयी। इससे मेरी खुशी बढ़ती चली गयी। इसके बाद मैंने संगति में जाना शुरू कर दिया और मेरे जीवन में धीरे-धीरे परिवर्तन आना शुरू हो गया।

रविवार की आराधना के दिन जब मैं प्रभु के लोगों की संगति में गया तो मेरा दिल खुशी से भरा था। वहाँ मैंने प्रभु-भोज में भी हिस्सा लिया, यह सोच कर कि मैं एक इसाई हूँ। अगले रविवार के दिन प्रभु-भोज के समय रोटी में हिस्सा लेने के बाद मैंने दाख़्ररस लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया ही था कि प्रभु-भोज दे रहे भाई ने कहा कि जो कोई व्यक्ति पाप में है और बीड़ी-सिग्रेट या और कोई नशा करता हो तो कृप्या इसमें भाग न ले। यह सुनकर मैंने अपना बढ़ाया हुआ हाथ तुरंत नीचे कर लिया। सभा के बाद एक भाई और उसकी माँ ने मुझसे पूछ लिया कि मैंने ऐसा क्यों किया? मैंने कहा क्योंकि मैं तम्बाकू खाता हूँ और उसके बगैर मैं रह नहीं सकता। उन्होंने तभी बाईबल में से एक पद मुझे दिखाया जिसमें लिखा था ककि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मंदिर है, जो इस मंदिर को नाश करेगा, परमेश्वर उसे नाश करेगा - १ कुरिन्थियों ३:१६, १७। उसके बाद मैंने प्रार्थना-उपवास करके प्रभु से मेरी इस कमज़ोरी से छुटकारे के लिए सहायता मांगी और प्रभु की दया से मुझे सब नशे से छुटकारा भी मिल गया।

लेकिन अब भी मुझ से कुछ न कुछ पाप होता ही था। मैं अब भी अपने पाप के स्वभाव से परेशान था। मुझे एक पद- १ युहन्ना १:७ बताया भी गया था, फिर भी मुझ से पाप हो ही जाता था। मैंने एक भाई से इस विषय में बात की। उसने मुझे समझाया और पूछा कि क्या कोई मनुष्य काम शुरू करके उसे अधूरा छोड़ता है? मैंने कहा कि नहीं। तब उसने कहा कि जो काम प्रभु ने तुम्हारे जीवन में शुरू किया है वह उसे पूरा किए बिना तुम्हें कैसे छोड़ सकता है? वह अन्त तक इस काम को तुम्हारे जीवन में पूरा करेगा। उसने मुझे बताया कि पापों की क्षमा के लिए मूँह से प्रभु यीशु का अंगीकार करना ज़रूरी है-रोमियों ९:९,१०। उसी रात को मैंने अपने सारे पापों के लिए प्रभु से क्षमा मांगी और प्रभु ने मुझे पापों की क्षमा का निश्चय भी दिया।

अब मेरे जीवन ने एक नया मोड़ ले लिया। मैं अब तक कोई काम धंधा नहीं करता था। इस विषय में एक भाई ने मुझे बताया कि प्रभु के वचन में लिखा है कि जो काम न करे वह खाने भी न पाए - २ थिस्सलुनीकियों ३:१०। अतः मैंने फैसला किया कि मैं काम करे बगैर नहीं खाऊंगा। लेकिन मुझे मेरे दुश्मनों का डर भी सताने लगा कि अगर बाहर निकलूँगा तो वे मेरे आड़े आएंगे। इसलिए मैंने बाज़ार से फल लाकर अपनी ही गली में बेचना शुरू कर दिया। इसके बाद मैंने सबज़ी बेचना शुरू कर दिया। जो भी मिलता उसे मैं अपनी गवाही भी देता। लोग आश्चर्य में थे कि इसे क्या हो गया? एक दिन मेरे कुछ दुश्मन मिले और प्रभु ने उनके सामने खड़े होकर मुझे उनसे माफी माँगने की हिम्मत भी दी। मैंने उनसे माफी माँगी तो हुआ यह कि वो हंसकर मुझे छोड़कर चलते बने।

इसके बाद मुझे एक स्कूल में नौकरी भी मिल गयी, लेकिन १५ दिन बाद ही मुझे नौकरी से निकाल भी दिया गया। निकले जाने का कारण था कि मैंने स्कूल में परमेश्वर के वचन का प्रचार किया था। मैं बहुत रोया कि मेरी नौकरी प्रभु के प्रचार की वजह से गयी। एक भाई ने मुझे तसल्ली दी कि प्रभु के सेवकों ने तो अपनी जान तक दे दी, मुझे तो सिर्फ नौकरी ही छोड़नी पड़ी है, यह तो खुशी की बात है। फिर मुझे आई०टी०सी० सिग्रेट फैकट्री में नौकरी मिल गयी। इसी दौरान दिल्ली में पवित्र महासभा होने वाली थी। उस महासभा में नये लोगों के बपतिस्मों की तैयारी हो रही थी। मुझे भी बपतिस्मा लेने के बारे में बताया गया। मैंने कहा मुझे क्या ज़रूरत है क्योंकि मैं तो एक इसाई परिवार से हूँ, सो मैं नहीं लूँगा, मेरा बपतिस्मा तो बचपन में ही हो चुका है। फिर मुझे बताया गया कि यह प्रभु की आज्ञा है। एक रात को जब मैं प्रभु का वचन पढ़ रहा था तो यह पद मेरे सामने आया, “क्या कोई जल की रोक कर सकता है, कि ये बपतिस्मा न पाएं, जिन्होंने हमारी नाईं पवित्र आत्मा पाया है? (प्रेरितों के काम १०:४७)” इससे मैं आश्वस्त हो गया और मुझे यह समझ में आ गया कि यह प्रभु की आज्ञा है। अगले दिन बपतिस्में हुए और मैंने भी बपतिस्मा लिया। प्रभु की इस आज्ञा को पूरी करने के द्वारा जो खुशी मुझे उस समय मिली मैं उसे आज तक नहीं भूला। उसी समय मुझे बाईबल में से एक प्रतिज्ञा मिली - यशायाह ४८:६, जिसने मुझे मेरी सेवकाई बता दी, कि मुझे चुप नहीं बैठना है और मुझे प्रभु की सेवा करनी है।

एक दिन किसी भाई ने मुझ से पूछा कि “तुम क्या काम करते हो?” मैंने बताया कि मैं सिग्रेट फैक्ट्री में काम करता हूँ। उसने इस बात से खेद प्रकट किया और कहा कि यह ठीक नहीं है। वह मुझे समझाने लगा कि यदि कोई ताड़ के पेड़ के नीचे बैठकर दूध पीए तो क्या कोई उस पर विश्वास करेगा? बल्कि वह यही कहेगा कि ताड़ी पी रहा है। उसके बाद मैंने वह नौकरी छोड़ दी और घरों में रंग-रोगन करने का काम करने लगा, इसके बाद और भी कई कम बदले।

इसी दौरान मेरी शादी हो गयी और फिर प्रभु ने हमें आशीश के रूप में दो बच्चे-एक बेटी और एक बेटा भी दिए। मैं काफी समय तक पारिवारिक समस्याओं से होकर भी गुज़रा, जिसके कारण मेरे आत्मिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। कई बार पूरी तरह से प्रभु की सेवा करने की भी ठानी, लेकिन नहीं कर पाया। बस अपना काम भी करता रहा और प्रभु की सेवा भी करता रहा। ३१ दिसम्बर २००० की रात्री सभा में प्रभु ने मुझे अपने वचन से एक प्रतिज्ञा दी, “हे अति प्रीय पुरुष, मत डर, तुझे शांति मिले; तू दृढ़ हो और तेरा हियाव बन्धा रहे (दानियेल १०:१९)।” इसके बाद प्रभु ने मेरे परिवार में शान्ति दी और मैं पूरी तरह से प्रभु की सेवा में आने के लिए फिर से प्रार्थना करने लगा।

उन दिनों जिस कम्पनी में मैं काम कर रहा था, वह कम्पनी भारत छोड़ कर चीन चली गयी और ३१ जुलाई २००३ को मुझे उससे मुक्त होना पड़ा। क्योंकि प्रभु ने मुझे पूरी तरह उसकी सेवा करने के लिए बोझ दिया था, अब मैं प्रभु की दया से अपने आस-पास के इलाकों में प्रभु की सेवा कर रहा हूँ। मेरा आप से निवेदन है कि आप मेरे और मेरे परिवार के लिए प्रार्थना करें कि प्रभु मेरी सहायता करे और मैं उस सेवकाई को, जिसके लिए उसने मुझे बुलाया है, पूरा कर सकूँ।