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शुक्रवार, 5 जून 2009

सम्पर्क नवम्बर २००२: एक खोया सा जीवन जब फूट फूट कर रोया

मेरा नाम बी. सी. गोयल है। मेरा जन्म आगरा के एक व्यवसायिक हिन्दू परिवार में हुआ। आठवीं से दसवीं कक्षा तक मेरी पढ़ाई आगरा के बैपटिस्ट सकूल में हुई। मुझे वहां एक अच्छी बात यह लगी कि सकूल लगने से पहले, हैडमास्टार साहब बाईबल में से कुछ आयतें पढ़ते और प्रार्थना करते थे। मुझे यह सब कुछ समझ में तो नहीं आता था परन्तु सुनने में अच्छा लगता था। एक दिन हैडमास्टर साहब ने मत्ती ७:७ - ‘माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा’ पढ़ा; इस आयत से मुझे लगा कि मैं जो माँगूंगा मुझे अवश्य मिलेगा। अब यह आयत मेरे दिमाग़ में घूमने लगी। स्कूल के पश्चात मुझे कॉलिज में दाखिला मिल गया, लेकिन मैं बी०एस०सी० पास नहीं कर सका जब कि मेरे दोस्तों को इंजीनियरिंग में दाखिला मिल चुका था। अब मैं उदास रहने लगा। लेकिन कुछ समय बाद मेरे एक दोस्त ने मुझे जर्मनी पढने के लिए बुला लिया और मेरा वहाँ दाखिला हो गया। फैकट्री के पास ही मैंने एक कमरा किराए पर ले लिया। मेरे मकान मालिक ८० वर्ष के एक नामधारी इसाई दम्पति थे। एक दिन उनके यहाँ आयोजित एक संगति सभा में उन्होंने मुझे भी बुलाया। उस सभा में यद्यपि मुझे ज़्यादा कुछ समझ में तो नहीं आया पर अच्छा लगा। अब मेरा उनके साथ संगति में आना जाना शुरू हो गया। मेरी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद मुझे यह घर छोड़ना पढ़ा और मेरा संगति में जाना भी बंद हो गया। एक दिन मेरे एक दोस्त ने, जो लंदन में था, बताया कि वहाँ एक रबड़ इंजिनीयरिंग का कॉलेज है और उसमें दाखिले का तरीका बिल्कुल भारतीय पद्धति पर ही है। अतः मैंने लंदन जाकर कॉलेज के प्रिंसिपल से वहाँ दाखिले की बात की। उन्होंने बताया कि यदि मेरी अर्ज़ी भारतीय दूतावास के द्वारा भेजी जाए तभी उसपर विचार हो सकता है। जब इस प्रयोजन से मैं भारतीय दूतावास गया तो वहां इसके लिए मुझ से रिश्वत माँगी गयी, इसलिए मैं निराश होकर जर्मनी लौट आया। वहाँ पढने में मेरा मन नहीं लगता था, मैं लंदन के उस कॉलेज में जाना चाहता था।

एक शाम जब मैं बहुत उदास था, मैंने सोचा कि चलो प्रार्थना करके देखें। मैंने प्रार्थना करी और फिर लंदन कॉलेज फोन किया, तो प्रिंसिपल भारतीय दूतावास से अर्ज़ी की मंज़ूरी के बिना ही मुझे दाखिला देने को तैयार हो गया। इस बात से मेरे अन्दर एक छोटा सा विश्वास यीशु मसीह के प्रति जागा। मैं लंदन जाने की तैयारी करने लगा, मेरी मकान मालकिन ने मुझे लंदन स्थित विश्वासी परिवरों के दो-तीन पते दिये जिससे मैं वहाँ संगति कर सकूँ। लंदन आने पर मैं प्रभु यीशु की संगति में जाने लगा। अब मुझे पाप की सज़ा मृत्यु तथा पाप से पश्चाताप और क्षमा व अनन्त जीवन जो प्रभु यीशु के द्वारा मिलता है, के बारे में पता चला। तब मैंने अपने पापों से पश्चताप किया और मुझे अपने साथ प्रभु की उपस्थिति का एहसास होने लगा। इस तरह मुझ में परिवर्तन आने लगा। प्रभु की दया से मैं पढ़ने में बहुत अच्छा हो गया था। अच्छे नंबरों से पास होता देख प्रोफैसर मेरी पीठ थपथपाते थे। ऐसा होते देख मेरा विश्वास प्रभु में और भी बढ़ गया। अब मुझे संगति में और भी आनंद आने लगा। सन १९९६ में मुझे डॉ० बिली ग्राहम की सभा में जाने का अवसर मिला। उनके द्वारा दिए गए एक प्रवचन और वहाँ गाए गए भजन “यीशु कैसा मित्र प्यारा” ने मुझे बिलकुल बदल दिया। मैं फूट फूट कर रोने लगा तथा पापों की माफी मांगी और तब मुझे नए जीवन का अनुभव हुआ। मुझे लगा कि एक बहुत बड़ा बोझ मेरे सिर पर से हट गया। अब कॉलेज के बाद मेरा ज़्यादा समय प्रार्थना व संगति में बीतने लगा। प्रभु की दया से मुझे रबड़ इंजीनियरिंग की डिग्री मिल गयी और मेरे जीवन में प्रभु का वचन “माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा” पूरा हुआ। सन १९६७ में अपनी पढ़ाई पूरी करके मैं भारत वापस अपने शहर आगरा आ गया। यहाँ मेरी मुलाकात प्रभु के एक सेवक, भाई रामेश्वर लाल, से हुई। वे मेरे घर संगति के लिए भी आने लगे, लेकिन प्रभु की दया से मेरे घर वालों ने कभी उनका विरोध नहीं किया। इसके बाद मेरा विवाह भी हो गया। मैं अपनी पत्नी को भी संगति में ले जाता था। धीरे धीरे मेरी पत्नी भी प्रभु में आ गयी। मुझे कई जगह विदेशों में भी नौकरी करने का मौका मिला। मेरा बपतिस्मा इथोपिया के एडिसबाबा शहर में हुआ। यहाँ भी प्रभु की दया से मुझे अच्छी संगति मिली।

सन १९८५ में मैं फिर से वापस भारत आ गया क्योंकि मुझे हरिद्वार में फक्ट्री डालने का अवसर मिला। यहाँ मेरा एक दोस्त, जिसे मैं बहुत मानता था, अपनी फैक्ट्री चल रहा था, उसी ने मुझे बुलाया। अब मुसीबतों का दौर शुरू हो गया और मेरे दोस्त ने भी मुझे धोखा दे दिया जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। मेरी फैक्ट्री भी बन्द हो गयी। मुझे बड़ा झटका लगा और मैं सड़क पर आ गया। बच्चे की फीस जमा करने के लिए भी नहीं होती थी। यह दोस्त चाहता था कि हम उसके आगे हाथ फैलाएं, लेकिन प्रभु जो कभी नहीं छोड़ता, उसने मेरी पत्नी को देहरादून में नौकरी दिलवाकर इस तथा अन्य समस्याओं को हल कर दिया। सन १९८० में प्रभु ने ही हमारे एक अन्य रिशतेदार को हमारी मदद के लिए भेजा। फिर प्रभु ने मेरे सोचने समझने से बढ़कर मुझे लौटा दिया। लेकिन मुझे प्रभु में जितना बढ़ जाना चाहिए था, नहीं बढ़ सका। हालांकि प्रभु के दासों का आना जाना व संगति करना लगा ही रहता था। सन १९९० में मैं बिमार पड़ा और मेरी हालत बहुत गंभीर हो गयी। मैं प्रभु से अपनी चँगाई की प्रार्थना करने लगा और प्रभु ने मुझे चँगा कर दिया। जून १९९८ में मेरी हालत ऐसे ही कभी ठीक कभी ख़राब चलती रही। लेकिन प्रभु के लोगों की संगति व प्रार्थना से मुझे बहुत हियाव मिलता था, जिसके कारण मैं आज भी प्रभु में बना हूँ। जुलाई १९९८ में मुझे ब्रेन ट्यूमर, यानि दिमाग़ की रसौली हो गयी। मुझे इलाज के लिए दिल्ली के एक अस्पताल में दाखिल किया गया। मेरे अपने रिशतेदार मुझे देखने नहीं आए. लेकिन प्रभु के दासों से मेरा कमरा भरा रहता था। प्रभु ने फिर एक और आश्चर्यकर्म किया, अपने दासों की प्रार्थनओं के उत्तर में मुझे पूरी चँगाई दी तथा निर्गमन ३४:१० मेरे लिए पूरा किया। प्रभु की दया से अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ।

जब कभी मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे एहसास होता है कि प्रभु कितना महान है। उसका प्रेम अद्भुत है, वह मुझे हर समय संभाले रहता है। मेरी इच्छा है कि मैं ज़्यादा से ज़्यादा समय प्रभु के चरणों में बिताऊँ।

मुझे आप सब की प्रार्थनों की बहुत ज़रूरत है।

गुरुवार, 4 जून 2009

सम्पर्क नवम्बर २००२: आराधना का आधार

रात तो काफी गहरा चुकी थी। बाहर बड़े आंगन में काफी गहमा-गहमी थी। मौसम काफी ठंडा ज़रूर था, पर माहौल बहुत गरमाया हुआ था। कुछ लोग आंगन में आग के चारों ओर बैठे थे। शायद, जैसे ही किसी ने दबी आग पर कुछ लकड़ियाँ लगा कर आग दहकाई, तैसे ही आग के चारों ओर बैठे लोगों के चेहरे साफ दिखने लगे। महायाजक की लौंडियों में से एक वहाँ आई और पतरस को आग तापते देख कर कहा कि तू भी तो यीशु नासरी के साथ था। पतरस तुरन्त मुकर गया (मरकुस १४:६८)। प्रभु यीशु के साथ जीने-मरने की कसम खाने वाला वह चेला, उस एक रात में, मुर्गे के बांग देने के पहले, तीन बार कसम खाकर अपने प्रभु का साफ इंकार कर गया। दूसरी तरफ पतरस का प्रभु, सारी रात अपमानित और प्रताड़ित होता रहा। इस अपमान और ताड़ना के समय में एक पल ऐसा आया जब इन्कार करते हुए पतरस का सामना प्रभु से हुआ। प्रभु ने पतरस को देखा और अपनी आँखों से ही उससे कुछ कहा, शायद ये कि, “हाँ पतरस, मैं तुझे अब भी प्यार करता हूँ, मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूंगा, कभी नहीं त्यागुंगा” (लूका २२:६०-६२)। कैसा अद्भुत प्रेम, कैसी अद्भुत वफादारी, अपनी असहनीय पीड़ा में भी अपने इन्कार करने वाले कमज़ोर चेले को हियाव देना, उसे फिर से उठा कर खड़ा करना। इस प्रेम, इस अपनेपन का कोई सानी नहीं। ऐसा प्रेमी परमेश्वर ही आराधना का सच्चा हकदार है, उसका यह क्षमा करने वाला प्रेम ही हमारी आराधना का आधार है।

मैं आपसे, मनुष्य रूप में आए इस प्रभु परमेश्वर की कहानी कहना चाहता हूँ। आप इस कहानी को उसके प्यार के प्रकाश में देखिएगा। इसी का नाम मेरे सीने में बसता है। वही मेरी आराधना का आधार है।

* दो हज़ार साल पहले एक बहुत ही ग़रीब और मामूली परिवार में उसका जन्म हुआ, ऐसा परिवार जिसके पास न धन था, न संपत्ति और न कोई प्रभाव। बहुत ही ग़रीबी की हालत में पला-बड़ा हुआ और गुज़र किया । आज उसका प्रभाव सारे संसार में है, उसके वचन को आधार बनाकर कई देशों ने अपने संविधान बनाए हैं; समाज सुधरकों ने समाज के उत्थान की प्रेरणा और मार्ग दर्शन पाया है; रंग भेद, जाति भेद, लिंग भेद आदि से ऊपर उठ कर सभी इन्सानों के समान स्तर होने को समझा और समझाया है। समाज के हर वर्ग के लोग उसके अनुयायी हैं, धनवान भी, आलिम और दानिश्मंद भी, वैज्ञानिक भी, साधारण भी।

* एक देश के छोटे से दायरे में ही सम्पूर्ण जीवन जिया। उसके जीवन में केवल एक बार, उसके शिशुकाल में, उसकी जान बचाने को, उसके माँ-बाप थोड़े समय के लिए उसे देश की सीमाओं से बाहर ले गए। लेकिन आज संसार का कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ उसका नाम और उसके अनुयायी नहीं हैं।

* आम आदमी की तरह उसे भूख, प्यास लगती थी; कभी-कभी झील पर तैरती नाव में ही सो जाता था।

* उसने कभी डॉकटरी नहीं सीखी पर बिना दवाईयों के ही बिमारों को चंगा कर देता था और कोई फीस भी नहीं लेता था, हर टूटे दिल को जोडने की सामर्थ रखता है।

* उसने खुद कभी कोई किताब नहीं लिखी; पर आज संसार में कोई ऐसी लाईब्रेरी नहीं है जहाँ उससे संबंधित कोई किताब न हो। मानव इतिहास में आदमी की कलम से कभी किसी एक आदमी के बारे में इतनी किताबें नहीं लिखीं गयीं जितनी इसके बारे में लिखी गयीं।

* उसने कभी कोई गीत नहीं लिखा; लेकिन इसके बारे में, सारे संसार में, न केवल इतने गीत लिखे गए जितने किसी और के बारे में कभी नहीं लिखे गए; और इतने लोग उन गीतों को आज भी गाते हैं जितने किसी और के लिए नहीं गाते।

* वह कभी कोई सैनिक अधिकारी नहीं रहा, न कभी कोई हथियार चलाया न किसी को कभी मारा या सताया; लेकिन इसके प्रेम और कुर्बानी को संसार में पहुँचाने और बयान करने के लिए सबसे अधिक लोगों ने अपनी जान जोखिम में डाली, सबसे अधिक लोगों ने अपनी जान कुर्बान भी की और आज भी उस प्रेम और कुर्बानी के सुसमाचार का बयान करने के लिए सबसे अधिक लोग ऐसा करने को तैयार हैं।

* जो देश कभी इसके विरोधी थे, आज वही उसके अराधक हैं। सारे संसार में, हर सात दिन के चक्र के समाप्त होते ही, लाखों लोग इसकी आराधना के लिए इकठ्ठे होते हैं।

* उसके जन्म के दो हज़ार साल बाद भी, उसके अनुयायियों की संख्या, सारे विश्व में, समाज के हर वर्ग में से, बढ़ती ही जा रही है, कभी घटी नहीं है।

* इस देने वाले ने इतना दिया कि अपने आप को ही दे डाला। लगभग दो हज़ार साल पहले उसे नाश करने के लिए उसके समाज के हाकिमों ने षड़यंत्र रचकर उसे पकड़ा और झूठे मुकद्दमे के द्वारा क्रूस पर चढ़ा कर मार डाला। कब्र उसे रख न सकी और वह तीसरे दिन जीवित होकर, बंद कब्र से बाहर आ गया, चालीस दिन तक उन्हीं लोगों के बीच में रहा और उनके देखते हुए स्वर्ग पर चला गया। वह आज भी जीवित है और लोगों के जीवन बदल रहा है।

* उन बदले हुए जीवन वाले लाखों मनों की ऊंचाई पर विराजमान होकर आज उनका परमेश्वर कहलाता है। स्वर्गदूत इस बात को स्वीकारते हैं, सन्त सराहते हैं और शैतान उसके नाम से ही सहमता है।

* इस जीवित, सर्वसामर्थी, सर्वव्यापी, सर्वज्ञानी, शाश्वत, परमसत्य का नाम प्रभु यीशु है; वो मेरा उद्धारकर्ता है, मेरा प्रभु है, मेरा स्वामी है।

जो जन हमारे लिए सब कुछ होता है, हम उसके लिए सब कुछ कर गुज़रते हैं। क्या आपको मालूम है कि आप प्रभु यीशु के लिए सब कुछ हैं? इसीलिए वह आपके लिए सब कुछ कर गुज़रा। आप ही उसकी खुशी हैं, जैसे ही कोई मन फिराकर प्रभु में आता है, स्वर्ग में खुशी और जश्न मनता है। वह आपको अपनी जान से ज़्यादा प्यार करता है, इसलिए उसने अपनी जान आपके लिए दे दी।

मैंने प्रभु की एक बात पकड़ी है; एक बात है जिसके करने के लिए हमें मना करता है, लेकिन खुद करता है। देखिए वह क्या कहता है, “प्रभु को उस पर तरस आया और कहा मत रो” (लूका ७:१३); “तू क्यों रोती है?” (यूहन्ना २०:१५); “वह नगर के निकट आया तो नगर को देखकर रोया” (लूका १९:४१); “यीशु के आंसू बहने लगे” (यूहन्ना ११:३५); “वह आंसू बहा-बहा कर प्रार्थना करता था” (इब्रानियों ५:७)।
क्या बात इस प्यार की जो हमें रोता हुआ तो देख नहीं पाता और खुद हमारे लिए रोता है।



बुधवार, 3 जून 2009

सम्पर्क नवम्बर २००२: सम्पादकीय

प्रभु यीशु के प्यारे नाम से सम्पर्क आपके सम्मुख है। क्षमा चाहते हैं कि यह अंक काफी देर से आपके हाथों में पहुँचा पा रहे हैं। आपकी प्रार्थनाएं और पत्र हमें हमेशा हियाव देते हैं। हमारी अभिलाशा है कि स्याही से छपी इस छोटी काग़ज़ी किताब से आप परमेश्वर की आवाज़ को सुन सकें। यह बात आप पर है कि आप उसकी बात को स्वीकारें या ठुकराएं। आप कह सकते हैं कि ये लोग पुरानी कहानी, बासी शब्दों के साथ फिर हमारे सामने परोसने में लगे हैं। सम्पर्क आपके हाथ में है, आप सम्पर्क के हाथ में नहीं। आप जब चाहें इसे खोल कर पढ़ सकते हैं, जब मन ऊबे तो बंद कर सकते हैं, यदि झुंझला जाएं तो फेंक सकते हैं और फाड़कर जला भी सकते हैं। यह बात आपके हाथ में है। पर प्रभु की दया से सत्य को साफ कह देना सम्पर्क का कर्तव्य है। प्रभु करे कि जो लिखा है, उसके वास्तविक अर्थ को आप समझ सकें।

पवित्रशास्त्र कोई मुर्दा लाश नहीं है, परन्तु परमेश्वर की जीवित सामर्थ है। परमेश्वर का वचन बीज है और उसमें जीवन है जो बढ़ने और फलने को मचलता है। बस उसे एक अच्छी भूमि की ज़रूरत है, जिससे तीस गुणा, साठ गुणा, सौ गुणा फल सके। पवित्रआत्मा तो तैयार है पर बहुतों का मन पवित्रआत्मा की बात मानने को तैयार नहीं है; वे आत्मा को बुझा देते हैं, उसको शोकित कर उसकी आवाज़ को दबा डालते हैं। वे सारी सम्भावनाओं को खुद ही समाप्त कर डालते हैं।

ऐसे विश्वासी धीरे-धीरे स्वभाविकता को उतार कर मक्कारी को पहन लेते हैं। वे हमेशा दूसरों पर दोष लगाते मिलेंगे और अपनी मजबूरियाँ गिनाते रहेंगे। वे मौका और मौसम देख कर चलते हैं। वे प्रार्थना सभा, बाईबल अद्ध्यन की सभाओं से अलग होकर, धीरे-धीरे आराधना सभा के दिन भी गोल होने लगते हैं। इनके जीवन में प्रभु की मेज़ का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता। कितनों ने खुद अपनी गवाही की ही हत्या कर डाली है; बस विरोध से भरे रहते हैं। कहीं यह आपके व्यवहार का चित्रण तो नहीं है?

आपको लगभग हर मंडली में कुछ बड़े मंझे हुए झूठे विश्वासी मिल जाएंगे। तोते के रटने के समान, बाईबल के पदों को दिमाग़ से रट कर तो रखते हैं पर उसे दिल में ज़रा जगह नहीं देते, निज जीवन में कतई लागू नहीं करते; उस वचन से उनमें बूंद भर भी परिवर्तन नहीं होता। इन्होंने मंडलियों में बड़ा अनर्थ कर डाला है। वे पवित्रशास्त्र का उपयोग अर्थशास्त्र की तरह करते हैं। इनका प्रचार पैसा बनाने का साधन मात्र है। शैतान ने इन्हीं झूठे लोगों पर प्रभु का काम बिगाड़ाने का दयित्व सौंपा हुआ है। यह जितनों को जितना भरमा सकते हैं उतना भरमा देते हैं। ऐसे तिकड़मी लोग मंडलियों में दोष लगाते और विरोध उपजाते हैं और प्रभु का पैसा भी मार लेते हैं। शैतान इनकी जी तोड़ सहायता करता है। वे परमेश्वर की सहनशीलता को तुच्छ जानते हैं। वे दूसरों के लिए भारी और ऊंचे सिद्धांतों को स्थापित करते हैं पर मसीही जीवन के मूलभूत सिद्धांत-प्रेम, दया और क्षमा को हमेशा दबा देते हैं। जीवित वचन कहता है “वे एक ऐसे भारी बोझ को, जिसको उठाना कठिन है, बांधकर उन्हें मनुष्यों के कंधों पर रखते तो हैं; परन्तु आप उन्हें अपनी उंगली से भी सरकाना नहीं चाहते” (मत्ती २३:४,५)। ये सब काम वो लोगों को दिखाने के लिए करते हैं। सच तो यह है कि इन्होंने अपनी बरबादी की कब्र खुद ही खोद ली है।

बच्चों की कहानी बड़ों को सुनाने का अवसर मिला है, कहानी जानी पहिचानी है, सबने कभी न कभी तो सुनी होगी। आस-पास की दुकान, मकान के सभी चूहों ने एक एमरजैन्सी मीटिंग बुलाई। मामला था कि लाला की बिल्ली ने बड़ा आतंक मचा रखा था। चूहों कि पूरी कौम खतरे में थी, अस्तितव का सवाल था। बिल्ली के करीब आने की खबर कैसे लगे, कि समय रहते जान बचाकर भागा जा सके, इसी समस्या का हल ढूंढना था। बहुत विचार-विमर्श हुआ, अलग-अलग तरिके सुझाए गए, पर कोई भी तरीका जमा नहीं। काफी देर बाद एक बूढ़े चूहे ने सिर खुजाते हुए सुझाव दिया ‘अरे मूर्खों, सरल सी बात है, बिल्ली के गले में घंटी बांध दो।’ सुझाव सुनते ही चूहों ने ज़ोरदार तालियां पीटीं, बड़ी वाह-वाही हुई। एक छोटा चूहा डोरी के साथ एक छोटी घंटी ले भी आया। अब सवाल उठा कि घंटी कौन बांधेगा? सब एक दुसरे का मूँह देखते रहे पर कोई आगे नहीं आया। अन्त में उसी बूढ़े चूहे से पूछा गया कि अब आप ही कोई राह बताईए। बूढ़े चूहे ने जवाब दिया, ‘देखो भाई, हम तो सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं, यानि थ्योरी बताते हैं; प्रैकटिकल तो खुद ही करो।’ चूहों की सभा बिना किसी नतीजे पर पहुँचे बर्ख़ास्त हो गयी। लेकिन अगले दिन सभी चूहे यह देखकर अवाक रह गये कि बिल्ली के गले में घंटी बंधी थी। पूछ-ताछ हुई तो मालूम चला कि जो छोटा चूहा घंटी लाया था, उसी ने बांध भी दी और अभी ज़िन्दा भी है। चूहों ने उसे बुलाकर उससे पूछा कि यह कैसे किया? वो बोला, कुछ खास नहीं, बस नींद की गोली कुतर कर बिल्ली के दूध में डाल दी, जब वो गहरी नींद में सो गयी तो काम कर डाला।

अक्सर यह देखा जाता है कि छोटे ईमान्दार विश्वासी, बड़े-बड़े काम बड़ी खामोशी से कर जाते हैं; जबकि बड़े-बड़े नामधारी विश्वासी छोटी-छोटी बातों पर बड़ी-बड़ी राजनीति खेलते रह जाते हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपने विवेक को जलते हुए कोयले से दाग़ लिया है। इस अन्त के समय में तो ऐसे लोगों की भरमार होगी। इनका विनाश ऊंघता नहीं, बस परमेश्वर का धैर्य ही है जो इनके इस विनाश को रोके हुए है। इन लोगों को देखकर हमें निराश और हताश होने की ज़रूरत नहीं, बस प्रभु मुझ पर और आप पर दया करे कि हम इन्के साथ न लग जाएं।

जाते-जाते प्रभु के प्रेम की एक कहानी आपके सामने रखना चाहता हूँ। बाईबल में, लूका ७:११-१७ के पन्नों में, नाइन शहर की एक विधवा की कहानी खुदी है जो अपने इकलौते बेटे के जनाज़े में चल रही थी। वह कभी सोच भी नहीं सकती थी कि अपने जवान बेटे को अपनी ही आँखों के सामने दफनाना पड़ेगा। बेटे की बिमारी मौत में बदलते ही उसकी आखिरी उम्मीद भी ढह गयी। इस विधवा के दिल पर क्या बीती होगी? सही एहसास तो हम नहीं कर पाएंगे। माँ ने रात-दिन जागकर, सब कुछ करके देखा होगा। अब जन्म देने वाली माँ जीवन देने में असहाय और अस्मर्थ थी। वैसे तो हमने कितनों के अंतिम संसकार होते हुए देख होंगे, उन्में सम्मिलित भी हुए होंगे। पर जब हम किसी अपने को अंतिम विदाई देते हैं तो दिल पर क्या बीतती है, शब्दों में उस दर्द को ब्यान करने की सामर्थ नहीं है। जैसे-जैसे कब्रिस्तान करीब आता जाता, माँ बार-बार बेटे के चेहरे को चूमती, थोड़ी ही देर में उस चेहरे को हमेशा के लिए कफन से ढाँक दिया जाएगा और लाश पर मिट्टी डाल दी जाएगी। वो माँ कैसे बिलखती हुई लौटेगी अपने सुनसान खाली घर में। लोग शब्दों से आगे क्या सहारा दे पाएंगे? तभी शहर से बाहर जाता हुआ वह जनाज़ा, शहर के अन्दर आते प्रभु यीशु और उसके साथ चल रहे चेलों से रू-ब-रू हुआ। परमेश्वर का बेटा, बेटे के वियोग में तड़पती माँ को देखकर अपने आप को रोक न सका। उस माँ को देखकर प्रभु को तरस आया और प्रभु ने उससे कहा ‘मत रो’ (लूका ७:१३)। ठीक जीवन के सबसे अंधियारे समय में, उस माँ की मुलाकात जीवन की ज्योति से हुई, और ज्योति ने कहा ‘मत रो’। फिर प्रभु उसके बेटे के पास गया जो अब एक लाश, एक दुखदायी बोझ भर बन के रह गया था; अब कहीं कोई उम्मीद बाकी थी ही नहीं। प्रभु ने उस बेटे की लाश से कहा “मैं तुझ से कहता हूँ उठ” और वह जवान ज़िन्दा हो कर उठ बैठा और बोलने लगा। ज्योति ने अंधकार को हर लिया, असंभव संभव हो गया, माँ का मातम आनंद में बदल गया।

शायद आप अपने जीवन में किसी निराशा में फंसे होंगे, हालात से हार चुके होंगे। शायद अब दुनियाँ में कोई रास्ता, कोई उम्मीद की किरण बाकी नहीं होगी। लेकिन प्रभु कहता है “उठ! मत डर, मैं तुझे बनाऊँगा”। अपने घुटनों पर आईये, प्रभु की ओर अपने हाथ फैलाईये और प्रभु से कहिए “हे प्रभु मैं पूरी तरह से हार चुका हूँ, प्रभु मेरी सुधि लें, मुझ पर दया करें।” अपने अंधियारों को उस ‘जीवन की ज्योति’ को सौंप दें और उसकी ज्योति और प्रेम से अपने जीवन को भर लें। वह असंभव को संभव करने वाला, कुछ नहीं से सब कुछ उत्पन्न करने वाला सृष्टिकर्ता परमेश्वर है। वही मार्ग, जीवन और सत्य है (यूहन्ना १४:६)।
सम्पर्क की सीमाएं सीमित हैं, बस अब यहीं ठहरने को कहती हैं। आपकी प्रार्थनों के अभिलाषी.....
सम्पर्क परिवार।