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शनिवार, 27 जून 2009

सम्पर्क फरवरी २००२: बस बहुत हो गया

मौत और मातम से भरे एक साल को इतिहास के पन्नों में दफना कर अब हम एक नए साल को नई उम्मीदों के साथ लेकर खड़े हैं। पर सच तो यह है कि आनेवाला कल फिर से कितनी खूनी ख़बरें साथ लेकर आएगा, कोई नहीं जानता। आदमी ने ये बड़ी बरबादी खुद ही बोई थी और आज उसी की फसल काटने पर मजबूर है। अब संसार अपनी समाप्ति के समीप आ पहुँचा है; हाँ सच मानिए अन्त का आरंभ अब शुरू हो चुका है। दुनिया के सबसे अच्छे साल अब समाप्त हो गए हैं; संसार अपने समय सीमा का ज़्यादातर हिस्सा पूरा कर ही चुका है। जो समय अब बचा है वह स्थान स्थान पर होने वाले विनाश की गाथाओं, दिल दहला देने वाली घटनाओं और मनुष्य के अमानवीय व्यवहार के समाचारों से भरा होगा। इन्सान की दरिंदगी अब खुलकर सामने आने लगेगी।

हमने अपने देश की विधान सभाओं और संसद में अपने नेताओं का व्यवहार देखा है। नेता शोर-शराबा, गाली-गलोच करते हैं, फाइलें फाड़ डालते हैं, सभास्थल में लेट जाते हैं और काम अवरुद्ध करते हैं, अनुशासन भंग करने के कारण मार्शल उन्हें उठाकर सभास्थल से बाहर करते हैं। इन देश के संचालकों द्वारा उछल-कूद, लातम-लात, जूते फेंकना, माईक तोड़ना और फेंकना, कई बड़े नेताओं का सदन की मेज़ों के नीचे छिपना देशवासियों ने देखा है। ये वही नेता हैं जो सदन के बाहर सब जगह लोगों से देश में शान्ति और एकता लाने के वायदे करते फिरते हैं, कानून व्यवस्था लागू करने की कसमें खाते हैं। इनके हाथों में कितना सुरक्षित है हमारा देश और कानून? “एक मज़ाक है” कार्यक्रम में रेडियो पर एक उदघोषणा की गई कि एक भाई और एक बहन काफी समय से लापता हैं। उन्हें आख़िरी बार सन १९४७ में देखा गया था। भाई का नाम ‘सच’ है और बहन का नाम ‘ईमानदारी’ है। देश को इन दोनो की सख़्त ज़रूरत है। जो व्यक्ति इन दोनों को ढूंढ लाने में सहायता करेगा, उसे पूरा आश्वासन दिया जाता है कि उसका नाम-पता राजनेताओं और धर्मनेताओं से पूरी तरह से छिपा कर रखा जाएगा।

हमारे राजनेताओं को मान-सम्मान की कोई चिंता नहीं। बेशर्मी की चिकनाई ऐसी चढ़ा रखी है कि शर्म का पानी ठहरता ही नहीं; बन्दा चन्दा तो ऐसे चबाता है जैसे कुछ किया ही नहीं। ‘राजनीति’ एक भद्दा शब्द बन गया है। किसी भी दाँव-पेंच से अपनी धाक जमाना ही इनका मकसद रह गया है।

कुछ डाक्टर होते हैं जो बिमारी से भी ज़्यादा खतर्नाक होते हैं। ऐसे ही हमारे धर्म और धर्मगुरू हैं। हमारे धर्म हमारी समस्याओं का उपचार देने की बजाए उन्हें और बढ़ा देते हैं। जैसे कैंसर या अन्य कोई भी रोग, जिस शरीर में पलता है उसी को नष्ट करता है, धर्म भी समाज में लगे एक भयानक रोग की तरह समाज को ही नष्ट करने में लगा है। धर्म के नाम पर मानव में विभाजन ही आया है, धर्म ने कब हमें जोड़ा है, कितने ही टुकड़ों में तोड़ ज़रूर डाला है। समाज के भयानक अपराधी इतने निर्दोषों की हत्याएं नहीं कर पाए जितनी ‘धर्म’ ने धीरे से ही कर दीं। आतंकवाद भी धर्म की ही देन है।

परमेश्वर प्रेम है पर धर्मों में कहाँ प्रेम है? धर्मों में क्षमा देने की सामर्थ नहीं है। धर्म ने हमारी साधारण सी समझने की सामर्थ का भी सत्यानास कर दिया है; ऐसा बुद्धिहीन कर दिया है कि ‘धर्म’ के नाम पर कोई भी अधर्म करवा लो, बड़ी सहजता और गर्व से कर जाएंगे। शास्त्रों के शब्दों और सिद्धान्तों को सिर में भर लेने से जीवन नहीं बदलता।

धर्म परिवर्तन के विचार ने भी एक नई समस्या ला खड़ी की है। आपसी विरोध, जलन, बदले की भावना को बड़ी तेज़ी से बढ़ा दिया है। धर्म परिवर्तन के नाम पर गुमराह करने के लिए ऐसी ऐसी बातें बुनकर बताई जाती हैं और लोगों के दिमाग़ों में अटकाई जाती हैं जिससे सुनने वाले आक्रोश से भर जाएं। फिर इस उन्माद को हवा देकर समाज में आग लगाई जाती है और स्वार्थ की रोटीयां सेकी जातीं हैं। सब धर्मों की नीति है कि जो हमारे धर्म की नीति से सहमत नहीं है वह विधर्मी है, काफिर है; ऐसों को नाश कर डालो।

प्रभु यीशु कहता है मैं नाश करने नहीं पर बचाने आया हूँ। परमेश्वर का वचन बाईबल कोई धर्म हम पर नहीं थोपता, केवल सत्य को हमारे सामने प्रस्तुत करता है। हज़ारों साल का इतिहास इस बात का सबूत है कि बाइबल जैसा कहती है, वैसा ही होता है। मानव इतिहास, अनेक प्रयासों के बावजूद, बाईबल के एक भी दावे को आज तक झुठला नहीं पाया है। बाईबल के पूर्णत्या सत्य और परमेश्वर का वचन होने के प्रमाणों की कमी नहीं है, कमी तो लोगों के उन प्रमाणों को मानने की मन्सा में है। बिना जाँचे परखे ही लोग बाईबल को शक की निगाह से देखते हैं; ऐसों को समझाना वास्तव में बड़ी टेढ़ी खीर है।

कुछ दिन पहले मैं और मेरी पत्नि एक अच्छे पैसे वाले व्यक्ति के घर गए। वह व्यक्ति तो घर पर नहीं मिले, उनकी पत्नि और उसकी सास ही घर पर मिलीं। सास काफी बुज़ुर्ग थीं और उन्ही विचारों के साथ जी रहीं थीं। सास ने मेरी पत्नि से पूछा “आपके पास कितने बच्चे हैं?” मेरी पत्नि ने जवाब दिया “हमारे दो बच्चे हैं।” सास ज़रा अचरज से बोलीं “बस दो ही?” सास के ऐसा कहते ही बहू बोल उठी “दो ही बहुत हैं न जूते खाने के लिए।” और मैं सोचने लगा कि माँ-बाप को अपने बच्चों से क्या यही आशा बची है?

हम अपने परिवार में ही आपस में बिखरने लगे हैं। कई अपने भी अपने से नहीं लगते और अपनों में भी पराएपन का एहसास होता है। हम झूठे और खूबसूरत शब्दों से अपनों को ही धोखा देते हैं। पति-पत्नि में, सास-बहू में, बाप-बेटे के रिश्तों में अब काफी खटास आ चुकी है। कुछ तो इस आस में जी रहें हैं कि कब बाप मरे तो कुछ हाथ लगे। कितने अपनी पत्नियों को सिर्फ शब्दों से ही सहलाते हैं, पर अपना मन कहीं और लगाए रखते हैं।

एक आदमी की बीमार बीवी अपनी आखिरी साँसें गिन रही थी। बीवी ने मरते-मरते अपने पति से पूछा, “क्या मेरे मरने के बाद तुम दूसरी शादी करोगे?” पति ने बहुत कोशिश करके आँखें नम करीं और ग़मग़ीन लहज़े में बोला, “कभी नहीं, मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।” बीवी बोली, “मुझे मालूम है तुम दूसरी शादी ज़रूर करोगे। मेरी एक विनती है कि मेरे शादी के कपड़े उसे मत पहिनाना, वरना मेरी आत्मा को बहुत दुख पहुँचेगा।” बीवी को समझाते और तसल्ली देते देते पति झोंक में बोल गया, “वैसे भी तुम्हारा शादी का सूट नसीमा को फिट तो बैठेगा नहीं।” अभी बीवी मरी नहीं थी, वह आगे की तैयारी पहिले ही कर चुका था।

हालातों ने कितनों के दिल ही छील डाले हैं। कितने अपने घरों में ही अजनबी की तरह जीते हैं, तब खामोशी में यह विचार आता है कि चल खुदकुशी ही कर ले। जो हमारी आँखों को दिखता है, वह आदमी का असली चेहरा नहीं होता। जो बात हमारे कान सुनते हैं वास्तव में वह आदमी के दिल की बात नहीं होती।

एक व्यक्ति की पत्नि की अर्थी जा रही थी। वह आदमी चिल्ला-चिल्ला कर रो रहा था। बाहर से दुखी दिखता था पर अन्दर से था नहीं। भीड़ उसे बहुत दिलासा दे रही थी। गाँव के आखिरी संकरे मोड़ पर एक पुराना बरगद का पेड़ था, मुड़ते समय अर्थी उससे टकरा गई, कफन हिला और बीवी उठ बैठी। आदमी का रोना-पीटना तो बन्द हो गया पर अब दिल दुखी हो गया। अन्दर ही अन्दर सोचने लगा कि “यह मुसीबत फिर जी उठी।” बीवी दो साल और जीवित रह कर फिर मर गई।

आदमी फिर रो रहा था, फिर अर्थी उसी रास्ते जा रही थी, फिर वही मोड़ और बरगद का पेड़ आया। वह आदमी रोना बन्द कर, तेज़ी से अर्थी के आगे आया और उठाने वालों से बोला, “भाई लोगों ज़रा ध्यान से और बरगद से बच कर निकलना।” लोग उसे रोता चिल्लाता तो देख रहे थे पर अन्दर की बात तो कुछ और ही थी। हम परिवार में भी अपनों को ही धोखा देते और अपनों से ही धोखा खाते रहते हैं।

परमेश्वर ने अगर हमारी खोपड़ी में एक खिड़की लगा दी होती तो बड़ा ग़ज़ब हो गया होता। खिड़की से झाँक कर लोग पता कर लेते कि अन्दर क्या चल रहा है। कितने घर बरबाद हो गये होते। पर परमेश्वर की दया से केवल परमेश्वर ही देख पाता है कि आपकी और मेरी खोपड़ी में क्या क्या चल रह है। वो देखता है कि आप कितनों के प्रति जलन से भरे हैं, गन्दे विचारों से भरे हैं। उसे पता है कि आपने कितनों के पैसे और सामान वापस नहीं किए और न करने की मन्सा रखते हैं। आपके घर में क्या क्या चल रहा है, कितने गन्दे संबंध छिपाकर पाल रखे हैं, परमेश्वर सब जानता है। हम अपनी ज़िन्दगी के असली रंग तो बहुत छिपाकर रखते हैं, पर औरों को वह दिखाते हैं जो हैं ही नहीं।

कुछ लोग अपने आप से, अपने परिवार से बहुत उदास परेशान रहते हैं। कुछ के ग़म सारी उम्र उनके दिल पर ठहरे रहते हैं। कुछ अपनी समस्याओं का अन्त आत्म हत्या में ढूँढते हैं। पर आत्म हत्या तो कोई उपाय नहीं है। यह तो एक हत्या है और एक ऐसी हाय है जो हमेशा के हादसे में कुदा देती है। वैसे तो बहुतों के पास बहुत कुछ है पर वास्तविक खुशी और चैन नहीं, तभी मन का एक सूनापन उन्हें बहुत सताता है। आप और आपके परिवार का क्या हाल है?

जीवन में हारे, हाँफते, परेशान, बेचारे, बेचैन लोगों से प्रभु यीशु कहता है “मेरे पास आओ, मैं तुम्हें चैन दूँगा (मत्ती ११:२८)।” प्रभु बताता है कि हर परेशानी की जड़ पाप है। यही पाप हमेशा भयानक परेशानी और बेचैनी उत्पन्न करता है। वह यह भी कहता है कि सबने पाप किया है (रोमियों ३:२३) कोई किसी भी धर्म का क्यों न हो, किसी भी स्तर का क्यों न हो। परमेश्वर “अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है (प्रेरितों १७:३०)।” परमेश्वर के वचन का यह पद शुरू होता है ‘अब’ से। ‘अब’ जब संसार के पाप की दशा परमेश्वर के सहने की सीमा तक आ पहुँची है। ‘अब’ जब बस परमेश्वर की बरदाश्त टूटने और पाप से जुड़ी हर चीज़ पर उसका कहर बरसने को है। इसिलिए वह आपसे कहता है, ‘हर जगह’ सबसे कहता है, इस मौके को न गंवाओ, अभी भी चेत जाओ, बच जाओ। चाहे आप कितना ही गिरा हुआ, शर्मनाक जीवन क्यों न जी रहे हों, आपके पाप कैसे ही क्यों न हों, आपने वह पाप कितने ही छिप कर या गुमनामी में क्यों न किए हों, परमेश्वर से कुछ छुपा नहीं है। वह आपके सब पापों को पूरी तरह से जानता है और अभी उन्हें क्षमा करके आपको एक नया जीवन देना चाहता है - अगर आप लेने को तैयार हों!

परमेश्वर का वचन हमें चार ‘कालों’ के बारे में बताता है - १. भूतकाल (जो बीत गया); २. वर्तमान काल (जो जी रहे हैं); ३. भविष्य काल (जो आने वाला है); ४. आनन्त काल (जो मौत के बाद शुरू होता है और समय की सीमा से बाहर है)। सत्य वचन, इब्रानियों ९:२७ में कहता है “एक बार मरना फिर न्याय का होना निश्चित है। जो भी मनुष्य ने किया, उसका न्याय होगा। हर पापी अनन्त विनाश की पीड़ा में धकेला जाएगा। इसीलिए वही सत्य वचन चेतावनी भी देता है कि “यदि मन न फिराओगे तो इसी तरह नाश होगे (लूका १३:५)।” ‘मन फिराने’ का मतलब है प्रभु यीशु से पापों का अंगीकार करके उन पापों की क्षमा माँगना और उनसे मुँह मोड़ लेना - उस प्रभु यीशु से जिसने आपके पापों की क्षमा, आपको उनके दण्ड से बचाने के लिए, क्रूस पर अपनी जान दी।

अब एक निर्णाय का समय हमारे सामने है। अब, मौका रहते, यदि हमने अपने पापों के बारे में फैसला नहीं लिया तो फिर बात हाथ से निकल जाएगी और परमेश्वर को ही फैसला लेना पड़ेगा। जो पाप की दशा में उसके सामने जाएगा, वह पापी होने का दण्ड भी पाएगा। यदि हमने पापों से क्षमा नहीं माँगी तो हमारे सोचने की सीमा से बाहर हम पर गुज़रने ही वाला है।

प्रिय पाठक, एक प्रार्थना करके कहें “हे यीशु दया करके मेरे पाप क्षमा कर दें।” परमेश्वर का दिल तो आपको माफी देने को तैयार है लेकिन अगर आपका दिल माफी माँगने को तैयार नहीं है तो वह ज़बरदस्ती अपनी माफी आप पर थोपेगा नहीं। वह आपके सामने दोनो मार्ग और उनकी मंज़िलें स्पष्ट रूप से रख देता है, किस मार्ग पर चलना और किस अंजाम तक पहुँचना चहते हैं, यह आप पर है। ध्यान रहे, जो मौका है वो यहीं, इसी जीवन में है। मौत के बाद फिर माफी का कोई मौका नहीं है, फिर तो न्याय है; फिर इस जीवन में किए गए अपने चुनाव का अंजाम अनन्त कल तक भोगने के अलावा और कोई स्थिती नहीं होगी। मौत की लाईन में तो सभी खड़े हैं, कोई आगे है तो कोई कुछ पीछे। कई बार बेटा मौत की लाईन में बाप से आगे खड़ा होता है। जो पैदा हुआ है, वह निश्चय मरेगा भी। हर बीतता पल, हर बढ़ता कदम मौत के और निकट लाता जाता है। इस सच्चाई से आप बेखबर न रहें, जिसने पापों की क्षमा नहीं माँगी वह कैसी दुर्दशा में होगा, न यहाँ चैन से जिया और न वहाँ चैन से रह पाएगा। प्रभु यीशु कोई धर्म देने कतई नहीं आया, वह तो आपको पापों की क्षमा देने आया ताकि कोई नाश न हो पर सब अनन्त आनन्द और अनन्त जीवन पाएं।

बहुत से बेवकूफ कहते हैं “कल किसने देखा है?” पर हकीकत यह है कि कल तो हर एक ने देखना भी है और भोगना भी है। बड़ी खामोशी से साल दर साल हाथों से खिसकते चले गए और मालूम ही नहीं पड़ा। उम्र तो बीतती ही जा रही है, लीपा-पोती से कोई कब तक जवान रहने का भ्रम बना कर रख सकता है। जिस्म की जिल्द से झुर्रियों को छुपने की भरसक कोशिश कर लो, खिज़ाब से बालों का असली रंग छुपा कर रख लो पर इन दिखावों से बढ़ती उम्र न रुकती है न घटती है। जिस घटना के बारे में सोचते ही दहशत आती है, कहीं जीवन के अगले ही पल में वो आपका इंतज़ार ना कर रही हो। मौत के सन्नाटे किसी न किसी के लिए तो हर पल के साथ जुड़े खड़े हैं, कब किसको अपने साथ जोड़ लें किसी को नहीं पता। मौत आई तो फिर पापों से क्षमा माँगने की मोहलत कभी नहीं देगी, बस चुपचाप दबे पाँव आकर उठा ले जाएगी।

आदमी एक अन्देखी शक्ति - पाप करने की प्रवर्ती से बंधा खड़ा है। जो नहीं चाहता वह कर डालता है, जिससे घृणा आती है उसे भी करने से अपने आप को रोक नहीं पाता (रोमियों ७:१५)। कैसा भी और कितना ही प्रयास क्यों न कर लो, अन्ततः यह शक्ति हावी हो ही जाती है। अगर प्रगट में नहीं तो छुपकर, शरीर में नहीं तो मन में, कर्मों में नहीं तो लालसाओं में लेकिन इस शक्ति के प्रभाव से बच पाना मनुष्य की सामर्थ से बाहर है। आपका सच्चा पश्चाताप, आपको इस अन्देखी शक्ति से छुटकारा पाने और बचने की सामर्थ देता है; एक ऐसी सामर्थ जो आपकी नहीं वरन पाप और मृत्यु पर जयवंत प्रभु यीशु की है। क्योंकि सच्चे पश्चाताप और समर्पण के बाद आप प्रभु यीशु के शरणागत हो जाते हैं और उसका आत्मा आप में निवास करता है, आपको सामर्थ देता है। सच मानिएगा सच्ची शान्ति उसी से मिलती है क्योंकि सच्ची शान्ति वहीं है जहाँ पाप नहीं है।

प्रीय पाठक यह लेख तो अब समाप्ति पर है, मेरी आपसे जो इस लेख को पढ़ रहे हैं विनम्र विनती है इस मौके को न गवाँएं। आप चाहें तो अभी प्रभु यीशु से यूँ प्रार्थना कर सकते हैं “हे यीशु मुझ पापी पर दया करके मेरे पाप क्षमा कर दें, मैं जैसा हूँ वैसा ही आपके पास आया हूँ, मुझ पापी पर दया करें। मेरे जीवन में, मेरे परिवार में सच्ची शान्ति और खुशी दें।”

सच्चे मन से की गई पश्चाताप की एक प्रार्थना आपका अनन्त काल बदलने की सामर्थ रखती है।

गुरुवार, 25 जून 2009

सम्पर्क फरवरी २००२: कोई था जो मेरे द्वार पर आया

मेरा नाम शताब सिंह है और मैं ज़िला सहारनपुर की बेहट तहसील के ग्राम लोदिपुर का निवासी हूँ। मैं एक अनपढ़ और ग़रीब परिवार में पला और बड़ा हुआ। मेरे माता-पिता इस स्थिति में नहीं थे कि वे मुझे पढ़ा सकते,इसलिए मुझे १० साल की उम्र से ही एक ज़मींदार के यहाँ पशु चराने की नौकरी पर लगा दिया गया। वहाँ मेरी उम्र के और भी बच्चे थे, जो बड़ी शैतानी करते थे उन्में से मैं भी एक था।

जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया, तो मेहनत मज़दूरी भी करने लगा। जो भी पैसे मज़दूरी से कमाता, बुरी संगति के कारण, बुरे कामों में उड़ा देता था। देखते देखते मैं २५ वर्ष का हो गया और इसी दौरान मेरी शादी भी हो गई। शादी होने के कारण मेरी ज़िम्मेदारी भी बढ़ गई और मेरे मौज-मस्ती के जीवन में विघ्न पड़ गया। लेकिन इत्तेफाक से मुझे एक अच्छी मेहनत करने वाली पत्नी मिल गयी। हम दोनो ही इकट्ठे मेहनत मज़दूरी करते और जो पैसा मिलता उसमें से कुछ बचा भी लेते। उस पैसे को मैं ब्याज़ पर भी दे देता था, और इसी पैसे से मैंने अपना घर भी बनाया। इसके बाद मैं फिर बुरी संगति में बैठने लगा, धीरे धीरे शराब भी पीने लगा और घर वालों को परेशान भी करने लगा। बात यहाँ तक बिगड़ी कि मुझे ग़लत कामों से रोकने पर मैं अपने माँ बाप को डाँट भी देता और उनकी पिटाई भी कर देता था। इस तरह मैं ने अपना सारा धन शराब में उड़ा दिया। अब मैं धीरे धीरे फिर कंगाली की कगार पर आ गया। मेरे मित्र मुझ से कटने लगे और मैं असहाय सा हो गया। अब मेरे सामने बहुत सारी समस्याएं मुँह फैलाए खड़ी हो गईं, रोज़ी रोटी के लाले पड़ गये और मैं बीमार रहने लगा। मैं इतना बीमार हुआ कि मेरी कमर 60० के कोण से झुक गई और मैं बहुत कमज़ोर हो गया। डाक्टरों ने मुझे हड्डी की टी०बी० बताई, मुझे लगने लगा कि मैं अब कुछ ही दिन जीवित रहुँगा। इतना सब कुछ होने के बाद भी मैं न तो परमेश्वर को जानता था और न ही पहचानता था। बस मनुष्य द्वारा निर्मित इश्वरों और साधु-सन्तों में ही परमेश्वर को खोजता रहा।

इस हाल में ही एक दिन मैं टी०वी० पर एक कार्यक्रम देख रहा था, जिसमें मैंने देखा कि यीशु नाम के एक व्यक्ति ने बहुत से बीमारों को चंगा कर दिया। फिर भी लोग उसपर अत्याचार कर रहे थे और उस पर पत्थर मार रहे थे, अन्त में उसे क्रूस पर चढ़ा दिया गया। मैं सोच रहा था कि यह कौन व्यक्ति है जो इतना दुखः सहन करके भी कुछ नहीं बोलता? जो लोग उस पर अत्याचार कर रहे हैं उनके लिए प्रार्थना कर रहा है। मेरे मन में उसे जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उसी दिन शाम को मेरा एक रिशतेदार मेरे पास आया और बोला कि तुम भी चंगे हो सकते हो यदि तुम मेरे साथ चलो। लेकिन इसके लिए तुम्हें शराब बीड़ी आदि सभी गंदी आदतें छोड़नी होंगी। मैं चलने को तैयार नहीं था पर मेरे घर वालों ने मुझे उसके साथ ज़बरदस्ती भेज दिया।

उस स्थान पर पहुँच कर मैंने देखा कि जो चित्र मैंने टी०वी० पर देखा था, वही चित्र वहाँ भी लगा है। मेरे मन में कुछ विश्वास जागा कि यही व्यक्ति मुझे भी ठीक कर सकता है। संगति के बाद उन लोगों ने मुझे एक क्रूस की माला और यीशु का एक पोस्टर भी दिया। मैंने वहाँ संगति में कुछ पैसे भी दिये और कहा कि आप मेरे लिए प्रार्थना करें। उन्होंने कहा कि तुम्हें लगतार संगति में आना पड़ेगा और तुम ठीक हो जाओगे। मैं अपने परिवार के साथ निरंतर संगति में जाता रहा। वे लोग मुझे प्रार्थना करके तेल और पानी भी देते थे और कुछ दिन बाद मैं ठीक भी हो गया। स्वस्थ होने के बाद मैं फिर मज़दूरी करने लगा।

एक दिन मुझे पता चला कि ग्राम ताहरपुर में एक संगति है जो रात्रि में होने वाली थी। उसमें मैं भी शामिल हुआ। वहाँ पर मैंने एक व्यक्ति को देखा जो बहुत अच्छा प्रवचन देता था और उसके द्वारा बड़े बड़े आश्चर्यकर्म भी हुए। एक दिन मैंने उस व्यक्ति को शराब पीते हुए देखा, मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने संगति के एक व्यक्ति से इसके बारे में पुछा कि आप तो शराब पीने से मना करते हो और यह तो शराब पीता है। तब उसने कहा कि तीन दिन, शुक्रवार, शनिवार और रविवार को छोड़ आप किसी भी दिन शराब पी सकते हो। इतनी बात सुनकर मैंने फिर शराब पीना शुरू कर दिया। साथ ही कमर का दर्द फिर से उठ खड़ा हुआ और इतना बढ़ गया कि उसे दबाने के लिए मैं हर वक्त शराब पीने लगा। मेरी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। धीरे धीरे माँ-बाप, रिशतेदार, यार सभी मेरा साथ छोड़ते गए। तब एक सम्बंधी मुझ पर दया करके मुझे हर्बटपुर के अस्पताल में छोड़ आया जहाँ मेरा इलाज चला। लेकिन मेरे पास न तो पैसे ही थे और न ही सहारा। दवा कहाँ से आएगी, इलाज कैसे चलेगा; इसी उधेड़-बुन में मैं पूरे दिन पड़ा रहता था। सोचता था कि बस अब ज़िन्दगी थोड़े ही दिनों की है।

मैं प्रार्थना करनी नहीं जानता था पर फिर भी प्रभु यीशु के नाम से टूटी-फूटी प्रार्थना कर लिया करता था। उसी का परिणाम हुआ कि एक दिन मेरे पास प्रभु का एक सच्चा दास आया, जिससे मेरी कोई जान पहचान नहीं थी। उसने मुझ से पूछा “आप के दरवाज़े पर जो निशान बना है वो क्या है?” मैंने कहा कि यह प्रभु यीशु के क्रूस का निशान है। उसने फिर सवाल किया कि क्या आप का उद्धार हो गया है और क्या आपके पाप क्षमा हो गए हैं? मैंने कहा मुझे पता नहीं कि उद्धार क्या होता है और पाप कैसे क्षमा होते हैं। उसने मुझ से कहा कि भाई बादशाही बाग़ में एक संगति होती है, आप वहाँ जाया करो। वहाँ आप पापों से मुक्ति और उद्धार के बारे में जान पाओगे। मैंने उसे वहाँ जाने का आश्वासन तो दिया पर नहीं गया। वह भाई फिर मेरे घर आया और पूछा कि “क्या आप बादशाही बाग़ गये थे?” मैंने असमर्थ्ता जताई कि किन्ही कारणों से मैं नहीं जा पाया। एक बार फिर मैंने उसे आश्वासन दिया कि मैं वहाँ ज़रूर जाऊँगा। एक दिन मैं हिम्मत करके वहाँ चला गया।

वहाँ बैठकर मुझे सब कुछ अजीब सा लगा। एक दिन वही भाई मेरे पास पुनः आया और उसने वही सवाल किया “क्या आप बादशाही बाग़ गए?” मैं ने कहा भाई मैं गया था और मुझे वहाँ बहुत अच्छा लगा लेकिन सच तो यह था कि मुझे वहाँ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था। उसने मुझ से फिर से जाने के लिए कहा, फिर एक दिन वो ही भाई मुझे अपने साथ बादशाही बाग़ संगति में लेकर गया और वहाँ उसने मेरी मुलाकात कई विश्वासी भाईयों से करवाई। वहाँ उन्होंने मुझे पढ़ने के लिए नए नियम पस्तक की एक प्रति भी दी।

इस बार मुझे कुछ अच्छा लगा और मेरे अन्दर प्रभु यीशु को जानने की उत्सुकता जागी। जैसे-जैसे मैं संगति में जाता रहा और प्रभु में बढ़ता रहा, तैसे-तैसे शैतान भी अपने हमले मुझ पर तेज़ करता गया। इधर मैं प्रभु में बढ़ रहा था उधर मेरी पत्नि और मेरी लड़की बिमारी में बढ़ रहीं थीं। मैं प्रार्थना करने लगा और भाईयों को भी प्रार्थना के लिए कहा। उन्होंने प्रभु के वचन के द्वारा मुझे बहुत हियाव दिया। धीरे धीरे मेरे सब पाप और बुरे काम छूतते चले गए। मैं सोच भी नहीं सकता था कि किसी तरह मेरे गन्दे काम छूट जाएंगे, लेकिन ऐसा हो गया। मैं बुरे दोस्तों की संगति से भी दूर चला गया। प्रभु की दया से, दाऊद के समान, मैं सब लौटा ले लाया।

अब प्रभु मुझ से अपने वचन के द्वारा बातें करने लगा और मेरा आनन्द बढ़ता गया। मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरे पाप क्षमा हो जाएंगे, लेकिन प्रभु ने अपने वचन से मुझे विश्वास दिया कि उसने मेरे एक-एक पाप को काली घटा के समान मिटा दिया है। लेकिन एक समस्या मेरे साथ उत्पन्न हो गई। जैसे जैसे मैं प्रभु में बढ़ता गया तो मेरे समाज के लोग और रिशतेदार कहने लगे कि यह तो इसाई हो गया है। परन्तु सच तो यह है कि मैंने अपना धर्म नहीं बदला पर अपना कर्म बदला है। पहले मैं पापों में जीता था, अब मेरा पापों से छुटकारा हो गया है। अब मैं पूर्ण रूप से आश्वस्थ हूँ कि यदि मैं आज मर भी जाऊँ तो सीधे स्वर्ग जाउँगा क्योंकि प्रभु यीशु ने मेरे पापों को अपने उपर ले कर मेरा सारा कर्ज़ चुका दिया है और मेरे पापों को अपने लहू से धो दिया है। उसकी दया से आज मेरे पास शान्ति और आनन्द है।

मंगलवार, 23 जून 2009

सम्पर्क फरवरी २००२: आराधना का आधार

प्रार्थना कहीं पर स्वार्थ की पतली गली से होकर भी जा सकती है, पर आराधना स्वार्थ से कहीं परे, प्यारे प्रभु को एक खुले आकाश में दिल से गाती है।

जब स्नेह भरी सेवा शब्दों के साथ करते हैं तो वह स्तुती का स्वरूप धारण कर लेती है।

विशाल सागरों की अपनी सीमाएं हैं, शब्दों की भी अपनी सीमाएं हैं, मानव की सोच की भी अपनी ही सीमाएं हैं।पर प्यारे प्रभु के प्यार की कोई सिमाएं नहीं। वह दया का ऐसा सागर है जो मुझ जैसे को प्यार कर सकता है, क्षमा दे सकता है।

परमेश्वर अपने इकलौते पुत्र को पीड़ा की चरम सीमाओं के समय क्रूस पर भूल सकता है, त्याग सकता है; पर उसका एक अजीब प्यार है जो मुझ जैसे से वाय्दा करता है कि मैं न तुझे कभी छोड़ुंगा न त्यागुंगा।

यह वास्तविक सच्चाई है कि मेरे पास याकूब का सा स्वभाव है, पर इसमें ज़रा भी शक नहीं कि मेरे पास याकूब का परमेश्वर भी है, जो मुझे कभी नहीं छोड़ेगा।

एक व्यक्ति बहुत कुड़कुड़ा रहा था कि उस के पास एक जोड़ी जूते भी नहीं हैं, तभी उस्की नज़र एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जिसके पास दोनों पैर ही नहीं थे। वह धन्यवाद से भर गया और बोला, “प्रभु भले ही मेरे पास जूते नहीं, पर दोनो पैर तो सही सलामत हैं।”

हर ‘असम्भव’ के ‘अ’ को हटाकर ‘सम्भव’ करना, केवल परमेश्वर के लिए ही सम्भव है। मौत पर विजय पाना असम्भव था, पर उसने इसे सम्भव बना डाला। मेरे जीवन से मेरे पापों को हटाना मेरे लिए कभी सम्भव था ही नहीं, पर उसने इसे सम्भव बना डाला।

कुछ विश्वासी शैतान से बहुत परेशान रहते हैं। लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनसे शैतान बहुत परेशान रहता है - ये वे हैं जो हर हाल में प्यारे प्रभु को भजते हैं, शैतान के आगे समर्पण नहीं करते, उसका सामना करते हैं।