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गुरुवार, 13 अगस्त 2009

सम्पर्क अगस्त २००१: एहसास एक बदले जीवन का

मेरा नाम मेघा चानी है। मैं एक डॉक्टर हूँ और धमतरी हस्पताल, छत्तीसगढ़ में काम करती हूँ। मेरा जन्म १९६६ में एक विश्वासी परिवार में हुआ। मेरे माता-पिता दोनो सच्चे विश्वासी थे इसलिए बचपन से ही हमारे परिवार में नित्य पारिवारिक प्रार्थनाएं होती थीं। मुझे छोटी उम्र से ही सिखाया गया था कि मैं अपनी हर ज़रूरत को प्रभु के पास प्रार्थना के द्वारा ले जाऊँ। मेरे माता-पिता का जीवन भी मेरे लिए एक बहुत बड़ा उदाहरण था। उनके पास बहुत पैसा तो नहीं था, इस्लिए हमें अक्सर कमी-घटियों का सामना करना पड़ता था। परन्तु इसके बावजूद हमारे घर में परमेश्वर की सच्ची शाँति और आनन्द था।

ऐसे माहौल में पलते हुए मैं दूसरों की नज़रों में एक अच्छी लड़की थी। मैं पढ़ाई में मेहनती थी और शिक्षकों का आदर भी करती थी। फिर भी मुझे अपने अन्दर पाप का एहसास होता था। मुझे ऐसा लगता था कि मेरे जीवन में किसी चीज़ की कमी है।

जब मैं सातवीं कक्षा में थी तो धमतरी हस्पताल में कुछ विशेष आत्मिक सभाएं आयोजित की गयीं। उन सभाओं में मैं आत्मिक गीत गाने वाली टोली में थी। वहाँ मैंने प्रचारकों के द्वारा सुना कि हम सब पापी हैं और हमें पापों की माफी के लिए प्रभु यीशु मसीह और उसके लहु के द्वारा शुद्ध होने की ज़रूरत है। मुझे एहसास हुआ कि चाहे मैं बाहर से अच्छी हूँ और अच्छे काम करती हूँ, फिर भी मैं एक पापी हूँ। मैं उस सभा में आगे जाकर प्रभु यीशु को ग्रहण करने से झिझक रही थी, यह सोच कर कि लोग क्या कहेंगे। परन्तु जैसे सभाएं चलती रहीं तो वैसे मेरी बेचैनी भी बढ़ती गई। एक रात मैंने अपनी माँ को यह बात बताई और अगले दिन आगे जाकर प्रभु यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता ग्रहण कर लिया। तब मुझे लगा कि मेरे जीवन में यही खालीपन था जो केवल प्रभु यीशु ही भर सकते थे। शायद बाहर से लोगों को कोई परिवर्तन न दिखाई दिया हो, लेकिन मैं अपने अन्दर एक बदले हुए जीवन का एहसास करने लगी। मेरे अन्दर वचन के लिए बहुत भूख जाग उठी और तब मैं स्वेच्छा से वचन पढ़ने और प्रार्थना करने लगी।

प्रभु के अनुग्रह से १९८५ में मेरा दखिला एक मैडिकल कालिज में हो गया जहाँ से मैंने अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी की। अप्रैल १९९१ में मेरे पिता अचानक प्रभु के पास चले गये। इस हादसे से हमें एक गहरा आघात लगा। आर्थिक रूप से भी हम बड़ी मुशकिलों में पड़ गये। ऐसी परिस्थिती में मेरे मन में कई प्रश्न उठते और मेरा मन भी कठोर होने लगा। लेकिन प्रभु ने ना तो हमें छोड़ा न त्यागा। धीरे-धीरे प्रभु ने हमारी सब ज़रूरतों को पूरा कर दिया और मेरी उच्च शिक्षा के सारे प्रयोजन भी पूरे कर डाले।

मैं लगभग २९ वर्ष की हो चुकी थी और मेरे साथ के मित्रों में से बहुतों के विवाह भी हो चुके थे। पर मैं एक विश्वासी से विवाह करना चाहती थी। बहुत सालों तक मैं प्रार्थना में इन्तज़ार करती रही। अन्त में मुझे लगा कि शायद प्रभु मुझे अविवाहित ही रखना चाहता है। यह विचार मुझे निराश करते थे। परन्तु मैंने अपने जीवन में प्रभु के प्रेम और विश्वासयोग्यता का एहसास किया था। सन १९९६ में प्रभु मेरे सामने एक विश्वासी का रिश्ता लाया। और करीब आठ महीने प्रार्थना के बाद हम दोनो इस विवाह के लिए सहमत हुए। मई १९९७ में मेरा विवाह प्रभजोत सिंह चानी के साथ हो गया।

मेरे पति की गवाही पढ़ने से आपको यह एहसास होगा कि हम दोनो कितने अलग पारिवारिक और व्यक्तिगत परिस्थितयों से गुज़रे हैं। हम दोनो के स्वभाव भी अलग-अलग हैं। लेकिन प्रभु ने अपनी अदभुत दया से हमें अपने परिवार में सच्ची खुशी और शान्ति दी है और हमें निश्चय है कि प्रभु ने नमें जोड़ा है “यह प्रभु की करनी है और हमारी दृष्टि में अदभुत है” (भजन ११८:२३)। मेरी पढ़ाई और धमतरी हस्पताल में कुछ अनिवार्य सेवा के कारण हम दोनो को अलग रहना पड़ रहा है, परन्तु हमने अपने परिवार में परमेश्वर की दया से सच्चा प्रेम और आनन्द पाया है। आपसे निवेदन है कि हमारे इस छोटे परिवार को अपनी प्रर्थनाओं से सहारा देते रहें।

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

सम्पर्क अगस्त २००१: आप की तलाश में

सच मानियेगा, कोई आपको पा लेने की तलाश में है, तभि तो आप इस पत्रिका को पढ़ पा रहे हैं। वह कौन है? एक वक्त था जब मैं मानता नहीं था कि ‘वो’ है।

बात तब की है जब मैं बड़ा गुरुघंटाल आदमी था; माफ कीजिए, तब मैं आदमी नहीं एक जवान लड़का ही था, जो परमेश्वर को नहीं मानता था। बाइबल को झूठी किताब कहता था। मैं अपने बेबुनियाद, बेजोड़ और बेतुके तर्कों से बहुतों का मूँह बन्द कर देता था। मेरे अहंकार का आखिरी फैसला होता, “मैं श्रेष्ट हूँ और मेरी मान्यताओं का कोई सानी नहीं है।” उन दिनों में एक बहिन जो उम्र में मुझ से काफी बड़ी और काफी पढ़ी लिखी भी थी, मुझे काफी समझाने की कोशिश करती रही कि परमेश्वर है और बाईबल सच्ची है। मैं कितने ही सवाल उससे करता रहा, जैसे: “यह कैसे हो सकता है, सृष्टी कैसे बनी?” वह बड़े धीरज से मुझे समझाती रही कि परमेश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है। मैंने इस मौके का रंग ताड़कर तपाक से कहा, “यदि परमेश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है तो उसके लिए यह भी सम्भव होगा कि वह अपने लिए कुछ न कुछ असम्भव कर ले।” बेचारी ठगी सी रह गई और कहने लगी कि “यह तू सिर्फ शब्दों के हेर-फेर का खेल खेल रहा है।” मेरे लिए यह बात महत्व्पूर्ण नहीं थी कि परमेश्वर है कि नहीं। मुझे तो अपने से ज्ञानवान को हराना था, बस हरा दिया।

हम अपने शब्दों और तर्कों से जीत तो सकते हैं पर अपने मन की छिपी बेचैनी पर जीत नहीं पाते। हम अपने आप से, अपने हालात से, अपने स्वभाव से हारे हुए व्यक्ति हैं। खूब खा लिया, खूब पहन लिया, खूब जी लिया, फिर भी अन्दर एक खालीपन खटकता है। हम एक दिमाग़ी बोझ के साथ जीते हैं। फिर भी हमारी दिमाग़ी अकड़ हमें इतना अकड़ा कर रखती है कि हम अपने विचारों के खिलाफ कुछ भी सुनना पसंद नहीं करते।

कई बार हमारे लिए धर्म, राजनीति और पैसा बड़ी परेशानी पैदा करते हैं। हमारे धर्म हमें सुधारने में तो सहयोगी साबित नहीं हो पाए पर उन्होंने हमें आपस में बाँटने में बड़ा सहयोग दिया है। हम बंटकर भी रुके नहीं, वरन जाति, उपजाति, वर्ग आदि के आधार पर और भी छोटे छोटे टुकड़ों में बंटते चले गये। इस सोच ने हमें बहुत बौना बना डाला है। हम बड़ी शान के साथ अपने नाम के पीछे एक दुमछल्ला ज़रूर लिख लेते हैं जो हमारे धर्म और जाति का परिचायक होता है, भले ही हमारे काम नीचता की सारी सीमाओं को क्यों न छू गये हों। ऊँची पढ़ाई के बावजूद, इतनी नीची बातें हमारे दिमाग में जमीं रहती हैं, जैसे: “हम लोग ऐसे नहीं होते”, “उस जाति के लोग ऐसे होते हैं।” हमारा दुर्भाग्य है कि कई बार कई जातियों के नाम का उपयोग हम गाली की तरह करते हैं; हमारे समाज के दिमाग में ऐसा कूड़ा कूट-कूट कर भर दिया गया है। इसके बावजूद हम अपने आप को श्रेष्ठ समझने का अहंकार अपने सीने में सजा कर रखते हैं, दूसरे के धर्म और जाति पर हमेशा चोट करने के लिए तैयार रहते हैं। एक चोर-डाकू, रिशवतखोर, व्यभिचारी और शराबी का क्या धर्म है? वह ऊँची जाति का हो या नीची जाति का, इससे क्या फर्क पड़ता है? और इसमें भी कोई फर्क नहीं कि वह पढ़ा लिखा है या अनपढ़, आस्तिक है या नास्तिक, बड़ी चोरी करता है या छोटी, ऑफिस से सामान की चोरी करता या घर में बिजली की या अस्पताल में दवाईयों की या फिर रिशवत ले देकर काम करता है। प्यारे दोस्तों ज़रा सोचो तो सही, हम सब इन्सान हैं और हम सबने पाप किए हैं। सच सुनिएगा - “कोई फर्क नहीं, क्योंकि सबने पाप किया है (रोमियों ३:२३)”।

ज़रा ठण्डे दिमाग से यह भी सोचिए, धर्म कोई क्यों न हो, सब अपने अपने धर्म की रक्षा करने में जुटे हैं। जिस धर्म की रक्षा हमें खुद करनी पड़े, वह धर्म हमारी रक्षा कैसे कर पाएगा? एक अन्य सोच, है तो बड़ी छोटी पर है बहुत खतरनाक - धर्म परिवर्तन की सोच। सच मानिए, धर्म बदल्ने की तो कतई कोई ज़रूरत नहीं है और न ही कोई फायदा है। बात तो तब है जब जीवन और स्वभाव ही बदल जाए।

हमारे पास बहुत सारे धर्म और बहुत सारे धर्मगुरू हैं, पर इन सब से हमारे जीवन पर क्या फर्क पड़ता है? हमारा स्वभाव तो जैसा का तैसा ही है। ऐसे व्यर्थ उलझाव में मत उलझें, हम आपको किसी नए धर्म की दलदल में नहीं फंसाना चाहते। असीम परमेश्वर को किसी धर्म के दायरे में खोजना कतई बुद्धिमता की बात नहीं है। सच मानिएगा, धर्म बदलने से या सरकारें बदलने से कुछ होने वाला नहीं है। आने वाले दिन और भी बुरे होते जाएंगे। आप पूछेंगे क्यों? हमारा जवाब है क्योंकि परमेश्वर का वचन कहता है, “पर यह जान रख कि अन्तिम दिनों में कठिन समय आएंगे...(२ तिमुथियुस ३:१)”।

आज सादे से सफेद कपड़े पहिने कोई यह घोषणा करे कि यह आदमी खतरनाक है तो उसकी बात पर बहुत से विश्वास कर लेते हैं, क्यों? क्योंकि वह नेता है, हमारे समाज को चाटने, चबाने और पचाने वाले नेता। हर गली मुहल्ले में दो चार तो ज़रूर मिल ही जाएंगे। इन्होंने हमारे देश की बुनियाद, हमारी एकता को अन्दर ही अन्दर कुतर कर कमज़ोर कर डाला है। हमारा हर नेता हमें शान्ति और सुरक्षा देने का वयदा करता है; क्या खुद उनके पास शान्ति है? सुरक्षा गार्डों में घिरे नेता खुद सुरक्षित नहीं हैं तो वे हमें क्या सुरक्षा दे पाएंगे।

संसार का समस्त ऐश्वर्य प्राप्त हो भी जाए तो क्या आदमी चैन से जी पाएगा? क्या पैसा आदमी को सन्तुष्ट कर सकता है? क्या धनी लोग सन्तुष्ट हैं? कितने ही आदमी पैसा बनाने की मशीन बनते जा रहे हैं। आदमी और ज़्यादा बेचैनी में धंसता जा रहा है, फिर भी हराम की कमाई में उसे बड़ा रस आता है। ईमान्दारी तो सिर्फ बेवकूफी लगती है। सोचो तो सही, सच्चाई इस कदर सिकुड़ गई है। एक बोला “मैंने बड़ी ही अजीब चीज़ देखी”, दूसरे ने तपाक से पूछा “क्या देखा?” पहले ने कहा “सुनेगा तो सुनकर सन्न रह जाएगा। मैंने एक रिशवत ना लेने वाले सिपाही को देखा।” लुटेरों के समाज में हर तरफ हर कोई लूटने को तैयार खड़ा है। हर विभाग में, हर बाज़ार में यही हाल है। किसी बड़ी दुर्घटना के बाद सहायता करने वालों में कई ऐसे भी होते हैं जो बचाने के बहाने घायलों और लाशों की जेब और सामान टटोलते फिरते हैं। इन्सान इतना गिर चुका है, अब और कहाँ तक गिरेगा? अन्दर पाप बसा है तो पाप ही करेंगे, पर ध्यान रहे, शीग्र ही पाप का परिणाम भी बरसेगा।

कितने लोग अन्धे मुँह वाले हैं, हाँ अन्धे मुँह वाले। उन्हें नहीं मालूम कि वो क्या बोल रहे हैं, कहाँ बोल रहे हैं। वह तो अपनी बहू-बेटी-बाहिनों के सामने भी माँ-बहिन की छिछोली बाज़ारू गालियाँ बकते हैं। उन्होंने अपने विवेक को जलते लोहे से दाग़ लिया है (१ तिमुथियुस ४:२)। कितने तो इतने अन्धे हैं कि जब कभी साईकिल की चेन बार बार उतरने लगे तो साईकिल को ही गाली देने लग जाते हैं, और ज़्यादा गुस्सा आए तो साईकिल को लात भी मार देते हैं। उन्हें कोई एहसास नहीं कि चोट साईकिल को नहीं उन्हें लगती है, साईकिल का नुकसान भी तो खुद उनका ही है, किसी और का नहीं। इसी तरह हमारा हर पाप भी आखिरकर हमें ही नुक्सान पहुँचाता है। पाप हमेशा परेशानी छोड़ जाता है। मौत के बाद भी यह पाप पीछा नहीं छोड़ता। वह हमें हमेशा की परेशानी में धकेल जाता है। आपके शर्मनाक छिपे पापों के लिए क्या आपका विवेक आपको कभी कोसता है? क्या आपने कभी अपने आप को ही धिक्कारा है - “अरे मैं क्या आदमी हूँ? मैंने यह क्या कर डाला? मैं अब भी क्या कर रहा हूँ?” क्या ऐसे सवाल आपको कभी बेचैन करते हैं? विवेक की वेदना असहाय होती है। जब विवेक कचोटता है तब लगता है कि अब कुछ शेष नहीं रहा, कोई समाधान नहीं सूझ पड़ता और मन इस वेदना से निकलने के लिए आत्महत्या करने की सोचने लगता है।

परमेश्वर के पास वो आँखें हैं जो सब कुछ देख सकती हैं, आपकी बेचैनी और परेशानी को भी। लेकिन उसके पास वो दिल्भी है जो सब कुछ माफ कर सकता है, चाहे कोई क्यों न हो, कैसे भी पाप क्यों न किए हों। सृष्टि का सामर्थी सम्राट गिरे से गिरे व्यक्ति को भी प्यार से क्षमा देने की सामर्थ रखता है और उसका नम प्रभु यीशु है। वह कतई नहीं चाहता कि आप इसाई बन जाएं, पर वह चाहता है कि आपपने पापों की क्षमा पाकर आनन्द्मय जीवन पाएं। आप अपना सब कुछ त्याग भी दें तो भी जीवन का वास्तविक आनन्द नहीं पा सकते। मुक्ति पाने के लिए मुक्तिदाता से बस इतना कहना है, “हे प्रभु यीशु मुझ पापी पर दया करो, मेरे पाप क्षमा करो।”

सारी सृष्टि का सम्राट आपको पा लेने के लिए, गुलामों की कीमत में बिक गया। सृष्टि के सबसे महत्वपूर्ण सप्ताह की समप्ति के समीप, यीशु ने आपके पापों की भयानक सज़ा अपनी देह पर सही। अजीब बात यह थी कि उस शुक्रवार की शाम को वह जो मर गया था, रविवार की सुबह जीवित प्रकट हुआ। वह परमेश्वर है जो अनन्त मौत से मुक्ति देकर, मौत को हमेशा के लिए मात दे गया। उसी शुक्रवार की सुबह, धर्मगुरूओं ने राजनेताओं के सहयोग से दो डाकुओं के बीच में उसे कीलों से क्रूस पर ठोक दिया था। उस समय दोनो डाकू भी प्रभु को कोस रहे थे (मत्ती २७:४४)। इतनी पीड़ा में पड़े प्रभु ने अपने प्यार भरे शब्दों से न जाने कितनों का दिल ही बदल डाला और आज भी बदल रहा है। भयानक पीड़ा के समय वह अपने शत्रुओं के लिए कहता है “हे पिता इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि यह क्या कर रहे हैं।” बताओ तो सही, प्यारा प्रभु आपको क्षमा करने के लिए और क्या करे। यह किसी मनुष्य का प्रेम नहीं था। उन दोनों डाकुओं में से एक पहचान गया कि यह परमेश्वर है, यह किसी से नफरत नहीं रखता, यह खुद में खुदा है और खुदा प्यार है।

इस डाकू ने पूरी तरह अपना जीवन बरबाद कर डाला था। मौत से कुछ पल पहले ही इसने मान लिया कि वह इस सज़ा के लायक है। उसने यह भी पहचाना कि जो सज़ा वह भुगत रहा है वह तो मौत के साथ खत्म हो ही जाएगी, पर जो सज़ा मौत के बाद बचेगी, उस हमेशा की भयानक्ता से सिर्फ यही यीशु है जो उसे बचा सकता है। उसने मान लिया कि वह क्षमा के लायक भी नहीं है। फिर भी एक पश्चातापी हृदय से उसने कहा “हे यीशु जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी सुधि लेना” (लूका २३:४२)। प्रभु ने उसे फौरन प्यार भरा आश्वासन दिया “तू आज ही मेरे साथ स्वर्ग लोक में होगा” (लूका २३:४३)। एक सवाल आपके मन में खटकता होगा - ऐसे बड़े पापी को प्रभु ने इतना बड़ा आदर और प्यार क्यों दिया? प्रभु ने कहा है “जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी नहीं निकलूँगा” (यूहन्ना ६:३७)। यह घटना दर्शाती है कि अभी इतनी देर नहीं हुई कि आप प्रभु के पास न लौट सकें। प्रभु ने डाकू का धर्म नहीं बदला, बल्कि उसका जीवन बदल दिया। वह ऐसे ही आपका भी जीवन बदल सकता है, बस आप अपनी बुनियादी बेईमनी से निकल कर ईमानदारी से अपने पापों को प्रभु के सामने मान लें।

दिन पर दिन आते हैं और हर दिन हमें हमारे आखिरी दिन के करीब ला रहा है। आखिरी दिन कब होगा? जब आप सोचते भी नहीं होंगे। एक दिन अचानक ही आपको हैरान करेगा और आपकी मौत को आपके सामने खड़ा कर देगा। शायद तब आपकी बेबस आँखें आखिरी बार इस सँसार और अपने करीबी साथियों को देखती हुई याचना कर रही होंगी “कुछ तो करो” पर सब असहाय से खड़े रह जाएंगे और आप हमेशा के लिए इस सँसार से चले जाएंगे। ज़िन्दगी आपके हाथों से ऐसे फिसल जाएगी और आप कुछ नहीं कर पाएंगे। बस फिर अनन्त भयानक्ता को भोगना ही बकी रह जाएगा।

अब अभी आपके पास ऐसा शुभ अवसर है जहाँ जीवन का सारा अभिशाप एक प्रार्थना से हमेशा के लिए मिट सकता है। बस एक सच्ची पुकार की ज़रूरत है “हे प्रभु यीशु मुझ पापी पर दया करो, मेरे पाप क्षमा करो।” प्यारा प्रभु आपकी तलाश में है, कि आप नाश न हों पर बच जाएं और एक अनन्त आनन्द से भरा जीवन पाएं।

शनिवार, 8 अगस्त 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००१: ...इसी तरह नाश हो जाओगे

शायद मेरी बेटी ४ य ५ साल की रही होगी, बार बार ज़िद कर रही थी कि डैडी मुझे पैसे दे दो। मैंने बड़े प्यार से बोला बेटा मेरे पास टूटे पैसे नहीं हैं। वह झुंझलाकर बोली ‘नहीं नहीं मुझे टूटे हुए पैसे नहीं चाहिए मुझे बिलकुल साबुत पैसे ही चाहिएं।’ मेरे शब्दों का सही अर्थ वह नहीं समझ पा रही थी। हमारी नासमझी की वजह से हम परमेश्वर को और उसके प्यार को नहीं समझ पाते हैं। परमेश्वर तो एक ही है, फिर आपका परमेश्वर, मेरा परमेश्वर, उसका परमेश्वर इन सबका का क्या अर्थ है?

ज़रा सोचें तो सही, परमेश्वर के लिए धर्म महत्त्वपूर्ण है या आदमी? दुनिया पर धर्म का बड़ा ज़हरीला असर बड़ी तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। हमारे पास जीने के लिए यही इकलौती दुनिया है। इसे भी हमने बेचैनी से, बरबादी से और नफरत से भर दिया है। आज दुनिया समाजवाद या पूँजीवाद के आधार पर नहीं पर धर्म के आधार पर बंटती जा रही है। इतना ज्ञान पा लेने के बाद भी आज धर्म फिर अपने भयानक रूप में लौट रहा है। हम आज इन्सान को इन्सान नहीं मानते पर उसे इस तरह मानते हैं कि यह इसाई, यह मुसलमान, यह सिख और यह हिन्दू है। हाँ सहब आदमी निहायत खौफनाक आदमी बन गया है। इन्सान की शक्ल ही हज़रत आदम से मिलती जुलती सी रह गयी है पर वह अपने कामों से तो हैवान बन ही चुका है। धर्म के दायरे में बंध कर हमारा दिमाग़ भी ज़ंग खा चुका है। हमारे धर्मों की महामारी हर रोज़ हज़ारों मासूमों को मौत के घाट उतार डालती है। क्या आज के इन हालत में यह सवाल और भी महत्त्वपूर्ण नहीं है कि आदमी महत्त्वपूर्ण है या धर्म?
बचपन से हमारे दिमाग़ों में धर्म भर दिया जाता है। इसे हम एक उदाहरण से समझने की कोशिश करेंगे। दो व्यक्ती हैं, यदि उनके सामने बढ़िया मीट बनाकर रखा जाए तो एक के मूँह में पानी आने लगता है और दूसरे को उलटी; ऐसा क्यों? क्योंकि उनके दिमाग़ में अलग अलग धारणा बचपन से ही भर दी गई है, और उस धारणा के कारण वही चीज़ एक को बढ़िया भोजन दिखती है तो दूसरे को वही चीज़ बेचैन कर देती है। ऐसे ही धर्म को लेकर बचपन से ही हमारे मनों में धारणाएं भर दी जाती हैं, जिस कारण दूसरे के धर्म को देखकर और उसके बारे में सुनकर आदमी झल्ला उठता है। जो विरोध बचपन से ही हमारे मनों में भरा गया है, यह उसी की प्रतिक्रीया है।

हमारे धर्म नेता हों या राजनेता, श्वेत वस्त्रधारी साफ सुथरे, धुले-पुछे चिकने चुपड़े दिखने वाले ये लोग पूरे घाग हैं, कोई कच्ची गोटी नहीं खेले हैं। अधकचरी उम्र से ही लोगों के मनों में जलन, विरोध, बदले की भावना, को भर देते हैं और फिर इनके हुक्म समाज में कानून की तरह चलते हैं। ये धर्म की राजनीति, लाशों की राजनीति, आतंकवाद की राजनीति, जहाँ जैसा भी मौका लगे लगा देते हैं। विरोधियों का पलड़ा यदि भारी दिखाई दे तो फौरन कहते हैं “कैसे भी हो, डंडी मारो, बस किसी भी तरह विरोधियों को कम तौल कर दिखाओ।” राजनीति का मूल मंत्र है बेपैंदी के लोटे का सिद्धाँत - जिधर भी भार बढ़े उधर झुक जाओ; या फिर दो घोड़ों की सवारी का सिद्धाँत - एक अटक जाए तो दूसरे पर सवार हो जाओ। ना तो पार्टी क महत्त्व है ना सिद्धाँतों का, महत्त्व है तो बस मंत्री पद का। हमारा समाज भी नए सिद्धाँतों से सजता जा रहा है। आज के समाज का भी एक मूल मंत्र है “ज़रूरत पड़े तो गधे को बाप बनाकर पेट में घुस जाओ और जब काम निकल जाए तो गले में फंसी हड्डी मत बनो, फौरन टाटा कर जाओ।”

भ्रष्टाचार का सोता हमारे समाज में ऊपर से नीचे की तरफ लगतार बहता रहता है। जी हाँ ऊपर से नीचे तक, मंत्री से संत्री तक, अधिकारी से कर्मचारी तक यह सोता सब को तृप्त करता जाता है। भले ही सरकार बदले या सरकार के सिद्धाँत, पर यह बदलने वाला नहीं है। हमारी ही सरकारें, हमारे ही सिर पर सवार होकर, हमारा ही शोषण करती हैं। किसी सरकारी विभाग में सालों से आपका काम रुका हो तो कुछ मुद्रा दिखाइये, वही सालों से रुका हुआ काम एक्सप्रेस गति से दौड़ने लगेगा। हर दुविधा सुविधा में बदल जाएगी बस सुविधा शुल्क साथ लगा दें। हमारी नयी सड़कों का निर्माण कार्य पूरा हो भी नहीं पाता कि उन्हीं सड़कों की मरम्मत के टेंडर अखबारों में निकलना शुरू हो जाते हैं। क्या अदभुत प्रगति पर हैं हम! हम तो बस हम ही हैं, हमारा क्या जवाब है? देश की डगमगाती नाव में लोग पतवार की जगह हथौड़ी और छैनी लेकर इस इरादे से बैठे हैं कि डूबती नव के कुछ फट्टे ही हाथ लग जाएं। हमारे यहाँ कई नसल के चोर होते हैं, जैसे - खुले चोर, छिपे चोर, और कुछ गिरे चोर। चोरों की एक नसल और भी है जिन्हें हम कामचोर कहते हैं। इन नमूनों के चोरों की हमारे सरकारी विभागों में बड़ी भरमार है। हमारे बाज़ारों में नकली माल की भरमार है - नकली सामान, नकली नोट, नकली दवाई, नकली नेता और नकली धर्मगुरू। अर्थशास्त्र का नियम है कि असली से पहले नकली चलता है। मान लें कि आपकी जेब में एक असली नोट है और एक नकली, आप पहले किसे चलता करेंगे? इस तरह नकली नोट तेज़ी से बाज़ार में भर जाते हैं।

हमारी प्रगति की एक और तसवीर यह भी है कि जहाँ कभी शहर के कूड़े-कचरे के बदबूदार ढेरों पर सूअर के बच्चे अपना पेट पालने के लिए गन्दगी कुरेदते फिरते थे, आज वहीं आदमी के बच्चे अपना पेट पालने के लिए प्लास्टिक, काँच, लोहे के टुकड़े और गत्तों के फट्टे ढूंढते फिरते हैं। आदमी इस कीमत का रह गया है। जिसने गरीबी नहीं देखी हो वह इस गरीबी के दर्द को क्या समझेगा। हमारे जनसंख्या नियंत्रण या परिवार नियोजन विभाग को आतंकवाद ने, भयानक बीमारियों ने, अकालों ने अच्छा सहयोग दिया है। अब तो काफी लोग गरीबी से परेशान होकर आत्म हत्याएं भी परिवार सहित करने लगे हैं।

हमारे इस बेपरवाह और दिखावटी समाज में कितने तो इतने अहंकारी हैं कि कहीं छोटे न दिख जाएं, इसलिए अपने को खूब बढ़ा-चढ़ा कर दिखते हैं। पूरे फेंकूलाल हैं, दुसरों पर रौब डालने के लिए ऐसी-ऐसी फेंकते हैं कि हम इस खानदान के हैं, हमारा भाई ये है, हमारा चाचा वो था और मामा ये है, इत्यादि। चाहे ये रिशतेदार उसे घास भी न डालते हों फिर भी बे सिर पैर की फेंकने से नहीं रुकते। एक अन्य प्रवृति के भी लोग इसी समाज का हिस्सा हैं, जो हर जगह एक-दूसरे की चुगली लगाने से, एक को दूसरे भिड़ाने से नहीं चूकते। वो ऐसा है, उसने ये कहा, फलां ऐसा कह रहा था - जहाँ आग न भी लगी हो, वहाँ जलन और द्वेश का धुआं तो ये उठा ही देते हैं।

एक दिन एक बहुत परेशान, हारा हुआ सा व्यक्ति मुरझाया चेहरा लिए अपने मित्र के घर पहुँचा। मित्र ने बैठाकर दिलासा देते हुए पूछा “अच्छा बताओ क्या खाओगे?” उसका उदास और खिसिया हुआ जवाब था “यार जूते छोड़ कुछ भी खिला दो क्योंकि वह तो पहले ही घर से काफी खाकर आ रहा हूँ।” परिवारिक संबंधों की हालत बिगड़ती जा रही है। कितने पति-पत्नी दावतों में, बाज़ारों में मुस्कुराते हुए एक दूसरे के साथ साथ तो दिखते हैं पर उनकी असली हालत घर में देखते ही बनती है। जो मियां बीवी छोटी छोटी बातों पर अपने अहंकार के कारण अक्सर एक दूसरे से लड़ते रहते हैं, वे अपने बच्चों को प्रेम से एक दूसरे के साथ रहने का पाठ पढ़ाते हैं। मक्कारी और बेशर्मी की हद है कि जो एक दूसरे के साथ मेल-मिलाप से नहीं रह सकते, वह बच्चों को मेल-मिलाप से रहने और भाई-बहिन का फर्ज़ निभाने की बातें सिखाते हैं। सास को परेशानी है क्योंकि उनहें लगता है कि बेटा अब उनके हाथ से निकल कर बीवी के हाथों में चला गया है, और मौका लगते ही, अपनी मनोभावना को किसी तीखे कड़ुवे अन्दाज़ में व्यक्त करने से वो नहीं चूकतीं। पति की बुरी लतों के कारण परिवार का चैन खो गया है, बच्चे बिगड़ गये हैं। कुछ का घर पति-पत्नी के एक दुसरे पर शक करने के कारण बर्बाद है, तो कहीं वास्तव में एक दूसरे की पीठ पीछे दुराचार होता है। कुछ अपनी बीमारियों से परेशान हैं तो कुछ अपनी नौकरियों से और कुछ नौकरी के लिये परेशान हैं।

कितने तो झूठ बड़ी स्वाभविक रीति से बोल जाते हैं, उनहें सोचना भी नहीं पड़ता, बात और मौके के मुताबिक झूठ तैयार होता है मूँह से बाहर आने के लिए। एक महाशय छुट्टी के दिन, घर के बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। सड़क चलते एक भिखारी ने उनकी ओर गुहार लगाई, “महराज एक आध रुपया मिलेगा”, वह बिना मूँह उठाए बोले, “पैसे नहीं हैं”। भिखारी ने फिर गुहार लगाई “तो महाराज कोई बची-कुची रोटी सब्ज़ी ही दे दो”, महाशय कुछ झल्लाकर बोले “रोटी सब्ज़ी भी नहीं है”। भिखारी ने फिर प्रयास किया “महाराज काफी ठंड है, कोई पुराना कपड़ा-चादर ही दे दो”। महराज खिसियाकर बोले, ‘क्यों सवरे-सवरे दिमाग़ चाट रहे हो, कह दिया न नहीं है”। भिखारी बोला जब तुम्हारे पास न पैसा है, न रोटी, न कपड़ा तो फिर बेकार बैठे समय क्यों बरबाद कर रहे हो, एक कटोरा लेकर मेरे साथ चलो, मिलकर धंधा करेंगे।” झूठ बोलने की तो लोगों को आदत हो गई है, घर में पति-पत्नी एक दूसरे से झूठ बोलते हैं, बच्चों से झूठ बोलते हैं और बच्चे अपने माँ-बाप से झूठ बोलते हैं। बाप ऑफिस से पैन, पैंसिल, कागज़, रबड़ आदि हाथ साफ कर लाता है तो पत्नी और बच्चे बाप की जेब पर हाथ साफ कर लेते हैं। जिसको जैसा मौका मिलता है वो बस झूठ, बेईमानी, धोखे से अपना उल्लू सीधा करने में लगा है; उचित-अनुचित, अपने-पराये या घर-बाहर का कोई मतलब नहीं रह गया है। मेरे प्रीय पाठक आपकी और आपके परिवार कि क्या दशा है? क्या आपके घर की कोई शर्मनाक कहानी अभी बाहर आने को तो नहीं है?

सब कुछ करके, सब कुछ पा के, अक्ल के सारे घोड़े दौड़ा कर भी आदमी बेचैन और परेशान है क्योंकि मन का पाप मन में शाँति होने नहीं देता। बहर से शाँत और प्रसन्न दिखने वालों में से बहुतों की आंतरिक दशा उलट ही है। जीवन ऐसा बन गया है कि न तो जीते बनता है और न मरते। कितने ही जीवन से उक्ता गये हैं और उनहें जीवन जीने लायक ही नहीं लगता है। संसार के लोगों और समाज कि इस दशा का एक ही कारण है - पाप। आपका हर पाप आपका पीछा करता ही रहेगा; आप चाहे उससे इन्कार करें, वह आपका कभी इन्कार नहीं करेगा। आप जितना भी चाहें और जहाँ भी चाहे भाग लें, हर जगह आप उसे साथ ही खड़ा पाएंगे - मौत के बाद भी। यह पाप ही है जिसने सारे संसार को एक दहशत के माहौल में जीने पर मजबूर कर रखा है। कौन कब और कैसे किसकी बेचैनी का शिकार हो जाए, कोई नहीं जानता। किस मोड़ पर कौन सा हादसा किसका इंतिज़ार कर रहा है, कोई नहीं जानता। प्रभु यीशु ने कहा “यदि मन न फिराओगे तो इसी तरह नाश हो जाओगे (लूका १३:५)।” नाश का अर्थ मौत ही नहीं परन्तु मौत के बाद हमेशा के भयानक विनाश में जा पड़ोगे। २००० साल का इतिहास छान डालो, ढूंढ कर देख लो,प्रभु यीशु की कही एक बात भी गलत साबित नहीं हुई है। ध्यान दीजीए प्रभु ने क्या कहा - यदि मन न फिराओगे तो इसी तरह नाश हो जाओगे; उसने धर्म बदलने को कतई नहीं कहा, मन फिराने को कहा है। सच मानियेगा मन बदलते ही आपके हालात और आप बदल जाएंगे, क्योंकि मन से पाप, पाप की बेचैनी और उससे उत्पन्न होने वाली दहशत समाप्त हो जाएंगे।

यह सवाल मन में अटकता है कि मन फिराने का अर्थ क्या है? ध्यान कीजिए, मनुष्य द्वारा की गई हर बुराई मन ही से शुरू होती है - पहले मन में विचार आता है, फिर योजना बनती है और सही मौका देखकर कार्य किया जाता है। यदि मन से बुराई ही उत्पन्न न हो तो शरीर से बुराई होगी भी नहीं। लेकिन मन से बुराइ को हटा पाना मनुष्य के लिए असंभव है। हो सकता है कि आप कुछ समय तक मन को काबू में रख सकें पर उसकी प्रवृति नहीं बदल सकते, जब और जहाँ ज़रा भी मौका मिलेगा, मन बेकाबू होकर बुरा ही सोचेगा और करवाएगा। शेर को पिंजरे में बन्द रखने से वो शाकाहारी नहीं हो जाता और न ही हमला करने का उसका स्वभाव जाता है। मन की यह दशा उसमें बसे पाप के कारण है। जब तक मन से पाप का प्रभुत्त्व नहीं जाता, मन का स्वभाव नहीं बदलता। आप अपने मन में झांक कर अपनी असली हालत देखिए, उन गन्दे और बुरे विचारों पर ध्यान दीजिए जो आपके मन में उत्पन्न होते हैं, पलते हैं, बसते हैं। उन ज़लील और घिनौने कामों पर गौर कीजिए जिन्हें आप छिप कर करते हैं, कर चुके हैं या करने के इरादे रखते हैं लेकिन उनका भेद खुलने से डरते हैं। अपने अन्दर बसे सारे झूठ, व्यभिचार, घमण्ड, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेश आदि का हिसाब कीजिए; आप सव्यं मान लेंगे कि आप पापी हैं, बेचैन हैं। आप अपना कोई भी यत्न क्यूं न कर लें, लेकिन मन पर पाप के इस प्रभुत्त्व को हटा नहीं सकते। इस प्रभुत्त्व को केवल वो ही हटा सकता है जो पाप पर जयवंत हो, सदैव से ही निषपाप और निषकलंक हो। संसार के इतिहास में केवल एक ही ऐसा है, केवल एक ही का जीवन है जिसे न जाने कितनी ही बार जांचा-परखा गया और वह हर बार पवित्र, निषपाप और निषकलंक ही निकला, जिसपर आज तक कभी कोई दोष नहीं रखा जा सका, वह है प्रभु यीशु। प्रभु यीशु पापों की क्षमा देने इस संसार में आया ताकि कोई नाश न हो पर हर एक अनन्त जीवन और अनन्त चैन पा सके। उसके पास धर्म परिवर्तन की कोई बात है ही नहीं, बात तो सारी मन परिवर्तन की है। उसने समस्त जगत के पाप क्षमा और सब के उद्धार के लिए अपनी जान क्रूस पर दी और तीसरे दिन जी उठा। जैसे ही आप सच्चे मन से उसके पास आते हैं और उससे कहते हैं कि हे प्रभु मुझ पापी पर दया कर, मेरे पाप क्षमा कर और अपना मन उसे सौंप देते हैं; वह आपके पाप क्षमा करके उनकी प्रभुता आपके मन पर से हमेशा के लिए हटा देता है और पाप पर जयवंत अपनी सामर्थ आपको दे देता है। यही मन परिवर्तन है अर्थात मन पाप के दासत्व से परिवर्तित होकर परमेश्वर के आधीन हो जाता है अब मन बुराई के अनुसार नहीं पर परमेश्वर के अनुसार सोचता और करता है।

प्रभु यीशु जीवित परमेश्वर है। केवल वह ही पापों की क्षमा और अनन्त जीवन देने वाला परमेश्वर है। आप कोई क्यों न हों, कैसे भी क्यों न हों वह आप से प्रेम करता है, आप को अनन्त विनाश से बचाना चहता है, आप के पश्चाताप का इंतिज़ार करता है। एक-एक करके छोटे-छोटे पाप बेहिसाब हो जाते हैं और उनका बेहिसाब प्रतिफल भी आप ही को भुगतना पड़ेगा। पाप में जीना अपने आप से दुशमनी करना है, स्वयं अपने लिए विनाश की कटनी बोना है। पाप के ज़हर का प्रभाव आप में और आप के परिवार में तेज़ी से फैलता है जो मुसीबतें, बेचैनियां, आपसी मनमुटाव या बैर आदि के रूप में प्रकट होता है। आपने जो कुछ भी किया है, छिपकर या खुलकर, उस सबसे बचकर आप न छुप पाएंगे न कहीं भाग पाएंगे। आपका पाप आपको नहीं छोड़ेगा, इस संसार में बेचैन रखेगा और आते संसार में एक न्याय और फिर विनाश में ले जाएगा। परमेश्वर का वचन कहता है “…क्या यह समझता है कि तू परमेश्वर के दण्ड की आज्ञा से बच जाएगा (रोमियों २:१३)” वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा। यह निश्चित है क्योंकि परमेश्वर ने अपने सत्य वचन में ऐसा लिखा है। लेकिन दिल से निकली एक दुहाई, एक सच्चे पश्चाताप की प्रार्थना से सब बदल जाएगा। जब पाप क्षमा हो जाएंगे और हटा दिये जाएंगे तो दण्ड का कोई कारण ही नहीं बचेगा “इसलिए अब जो मसीह यीशु में हैं उनपर दण्ड की आज्ञा नहीं है... (रोमियों ८:१)।”

हो सकता है कि आप कहें कि मैं इतना बुरा तो नहीं हूँ। लेकिन आप ईमान्दारी से देखें अपने अश्लील विचारों को, अपनी अभिलाषाओं को, अपने बीते जीवन को। आप ऊपर से कुछ भी दिखते हों, परमेश्वर तो आपके मन को, आपके विचारों को और आपकी अभिलाषाओं को देख लेता है। बाहर से भले होने का दिखावा तो मक्कारी है, असल में आप में जो अपने भले होने का विचार है, वह अपने आप को धोखा देना ही है और आपको एक दिन इस धोखे के परिणाम को भुगतना ही पड़ेगा। सालों पहले की बात है, मैं एक ऐसी जगह खड़ा था जहाँ मौत का सन्नाटा सता रहा था। दिल दहला देने वाला माहौल था, तीन खून से लिथड़ी लाशें वहाँ पड़ी थीं, खून से सने मूँह पर मक्खियाँ भिनभिना रहीं थीं। तीनों पैसे से, शरीर से, रुतबे से बहुत सामर्थी दिखते थे, पर अब अपने मूँह से मक्खी तक नहीं हटा सकते थे। एक हादसे ने एक ही लपटे में इन तीनों को लपेट लिया। एक लाश के हाथ में बन्धी घड़ी अब भी चल रही थी, सैकिंड की सूईं अभी भी चक्कार लगा रही थी पर इन तीनों क वक्त समाप्त हो चुक था। किसीने नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी इनका वक्त पूरा हो जाएगा। इनके पास सब कुछ था पर काल के जाल से बच नहीं पाए। वक्त इनके लिए नहीं रुका पर इन्होंने वक्त को नहीं पहिचाना। प्रभु यीशु कहता है “यदि मन न फिराओगे तो इसी तरह नाश हो जाओगे।” “तुम दण्ड के दिन और उस आपत्ति के दिन क्या करोगे? सहयता के लिए किस के पास भाग कर जाओगे। (यशायह १०:३,४)” प्रभु कहता है, “... चाहे तू उकाब की नाई ऊँचा उड़ता हो, वरन तारागण के बीच अपना घोंसला बनाए तो भी मैं तुझे वहाँ से नीचे गिराऊंगा। (ओबादियाह १:४)”

हमारे संसार का सबसे सुरक्षित देश अमेरिका भी असल में कितना असुरक्षित है यह ११ सितंबर की दिल दहला देने वाली घटना ने सारे संसार को दिखा दिया। अभी तो ऐसी ही कितनी ही अन्होनी होनी बाकी हैं। खतरे और खौफ अपनी हद तक पहुँच चुके हैं, बस अब एक झटके की देरी है। ऐसे ही न्याय का दिन भी अचानक ही सब पर आ पड़ेगा और लोग भौंचक्के देखते रह जाएंगे। बीता कल तो एक यादगार बन कर रह गया है, आज भी तेज़ी से बीते कल में बदल रह है। आज और अब ही आने वाले कल के काल से बच निकलने का वक्त है। मित्र मेरे, आने वाले कल से बचकर भाग नहीं पाओगे, उस आते कल का जो बीते कल से ज़्यादा भयानक होगा, सामना तो करना ही पड़ेगा। मित्र मेरे प्यारा प्रभु यीशु आपको प्यार करता है और चाहता है कि आप नाश न हों। बस आपके माफी माँगने की ही देर है, उसकी क्षमा में देरी नहीं है। बस एक प्रार्थना, एक सच्चे दिल की पुकार “हे प्रभु यीशु मेरे पाप क्षमा कर, मुझ पापी पर दया कर” विनाश को अनन्त आनन्द में बदल देगी, क्या आप यह प्रार्थना करेंगे?