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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

सम्पर्क मई २००१: संपादकीय

प्रभु यीशु के क्रूस पर किए काम और उसके महान नाम की जय-जयकार हो जिसने “सम्पर्क” के माध्यम हमारी सीमाओं को एक नया विस्तार दिया है। सम्पूर्ण सम्पर्क परिवार आपकी प्यार भरी प्रार्थनाओं के लिए ऋणी है।

इस बार तो हम हिम्मत हार ही गये थे, पर यह अंक आप तक लाने के लिए हमें आपके पत्रों और प्रार्थनाओं ने फिर से कुछ करने का हियाव दिया। मैं परमेश्वर के वचन का सबसे प्यार भरा कोमल स्पर्ष तब महसूस करता हूँ जब प्रभु अपने वचन से मुझ से कहता है, “ मैं तुझ को प्यार करता हूँ और मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूँगा।” यह सोच ही मुझे आनन्द और आराधना से भर डालती है कि प्रभु मुझ जैसे व्यक्ति से भी प्यार करता है।

एक बार ट्रेन में सफर करते समय मैंने देखा कि एक महिला एक बच्चे को सीने से चिपकाए बैठी थी। वह बच्चा बहुत ही सूखा सा था, उसकी बेहद मुचड़ी सी खाल उसकी हड्डियों से चिपकी पड़ी थी और उसका रंग तपे ताँबे की तरह था। उसकी दयनीय दशा देखकर मन विचिलित होता था पर माँ ने उसे एक बेशकीमती चीज़ की तरह संभाल्कर सीने से लगा रखा था। इस पर एक और अजीब बात यह थी कि माँ ने उस बच्चे के माथे पर एक काला टीका भी लगा रखा था कि कहीं उसे किसी की कोई बुरी नज़र न लग जाए। किसी और की नज़र में वह बच्चा चाहे जैसा भी हो, माँ की नज़र में वह बहुत ही कीमती और सुँदर था, जान से ज़्यादा प्यारा था। शैतान इस प्र्यास में जुटा रहता है कि आप को यह यकीन दिलाए कि परमेश्वर आप जैसे आदमी से कैसे प्यार कर सकता है? एक माँ एक ऐसे बदसूरत, बीमार और देखने वालों का मन विचिलित कर देने वाले बच्चे से कैसे ऐसा प्यार कर सकती है? यह तथ्य हमारी समझ में आये या न आये, पर यह सच झुठलाया नहीं जा सकता कि बस वह अपने उस बच्चे से ऐसा प्यार करती है, उस पर जान छिड़कती है। माँ और परमेश्वर में ज़मीन आसमान का फर्क है, परमेश्वर का प्रेम माँ के प्रेम से भी कहीं आगे, बहुत-बहुत आगे बढ़कर है। माँ अपने इकलौते बेटे की जान अपने किसी बदकार दुश्मन के लिए नहीं दे पाएगी, पर परमेश्वर ने अपने दुश्मनों के लिए अपने इकलौते बेटे की जान बलिदान कर दी। वह अपने शत्रुओं से भी नफरत नहीं करता, वह तो बस यही चाहता है कि उसके दुश्मन भी किसी तरह उद्धार पाकर उसके साथ रहें, और हमेशा के लिए हमेशा के आनन्द में आ जाएं (१ तिमुथियुस २:४)।

शैतान बाईबल की इस सच्चाई को मिटा डालना चाहता है कि परमेश्वर उन्हें भी दिल से प्यार करता है जो कतई प्यार करने के लायक ही नहीं हैं। हमारा दो कौड़ी का दिमाग़ परमेश्वर के असीम प्रेम को समझ नहीं सकता। क्या आपको मालूम है कि वह आपको किस हद तक प्यार करता है? बाईबल का अद्भुत पद “जैसे तूने मुझ से प्रेम रखा है वैसे ही उनसे प्रेम रखा है (युहन्ना १७:२३)” बिल्कुल सच है। परमेश्वर मुझ जैसे और आप जैसे इन्सान से प्रभु यीशु की तरह प्यार करता है; पर कुछ ही लोग उसके प्यार का एहसास कर पाते हैं। जो महसूस करते हैं उन्हें परमेश्वर का प्यार विवश करता है। वे उसके प्यार के कारण अपने मन से मजबूर हो जाते हैं कि अपने प्यारे प्रभु के लिए कुछ करें। परमेश्वर के वास्तविक बच्चे परमेश्वेर के प्यार के स्पर्ष को साफ पहिचान लेते हैं।

मैं भाई डी. एल. मूडी की एक कहानी आपके साथ अपने शब्दों में बांटना चाहुँगा। एक माँ को खबर मिली कि उसका बेटा किसि दूसरे शहर में एक बुरी दुर्घटना का शिकार होकर शहर के अस्पताल में भर्ती है। माँ ने पहली गाड़ी पकड़ी और बताए हुए पते पर पहुँची। वह अपने बच्चे से मिलने के लिए बहुत आतुर थी, किसी ज़रिए उस तक पहुँचना चाहती थी। पर डॉकटर ने उसे यह कह कर रोका कि काफी समय बाद वह लड़का मुशकिल से सो पाया है, अतः वह उससे अभी न मिले। माँ ने रोते-रोते कहा “डॉकटर साहब, मुझे मेरे बच्चे को एक बार देखने दो, हो सकता है कि फिर मैं उसे ज़िन्दा कभी न देख पाऊं। मैं आपसे वायदा करती हूँ कि मैं उससे कुछ भी नहीं कहूँगी, बस उसके पास चुपचाप बैठकर उसे देखती रहूँगी।” डॉकटर उसकी इस बात पर राज़ी हो गया और वह एक स्टूल पर अपने बेटे के पास बड़ी खामोशी के साथ बैठ गयी। बेटे के सिर और आँखों पर पट्टियाँ बंधीं थीं। माँ आँसुओं के साथ खामोशी से अपने बेटे को देखती रही। वह कभी उसके हाथ देखती और कभी उसके पैर, उसकी आँखें बस अपने बेटे पर ही लगीं थीं। थोड़ी देर बाद वह अपने आप को रोक ना पाई और बड़े धीरे से उसने अपने हाथ को बेटे के सिर पर रख दिया। बेटे ने तुरन्त धीमी आवाज़ में कहा “माँ तू आ गई।” उस बेटे ने सालों बाद माँ के हातों के स्पर्ष को पाया था लेकिन उसे उस प्यार भरे हाथ को पहिचानने में ज़रा भी देर नहीं लगी। क्या आपका दिल आपके प्रभु के प्यार का एहसास करता है?

जब मेरा प्रभु क्रूस पर अपनी पीड़ा के चरम सीमाओं को सह रहा था, तब एक तीखा पर सच्चा ताना उस पर कसा गया “इसने औरों को बचाया पर अपने आप को न बचा सका (मरकुस १५:३१)।” प्यारे प्रभु को दो में से एक बात को चुनना था - वह औरों को बचाए या अपने आप को; उसने फैसला किया कि वह औरों को बचाएगा। उसका यह फैसला सिर्फ उस प्यार के कारण था जो वह आपसे और मुझ्से करता है। हम स्वर्ग इसलिए नहीं जाना चहते हैं कि वहाँ सोने की सीढ़ीयाँ हैं, पर हम इसलिए जाना चहते हैं क्योंकि वहाँ हमारा प्यारा प्रभु है और हम उसके प्यरे छिदे कदमों को चूम पाएंगे।

प्रभु के वचन में लिखी कहानियाँ कोई कागज़ी कहानियाँ नहीं पर वास्तविकता हैं। पवित्र आत्मा ने अपने अनुग्रह से हमारे लिए इन छोटी कहानियों में बड़े आत्मिक भेद सजा कर रखे हैं। ये प्रभु के वे शब्द चित्र हैं जो सीधे हमारे दिलों पर असर करते हैं। प्रभु यीशु के पवित्र होठों से कहे गए दृष्टांतों में से ३८ नये नियम में लिखे गए हैं। आईये थोड़ी देर के लिए इन दृष्टांतों में से एक पर थोड़ा विचार करते हैं। यह दृष्टांत लूका के १५वें अध्याय में मिलता है। यहूदी समाज में बाप की जायदाद का बंटवारा बाप की मौत के बाद होता था लेकिन छोटे बेटे ने बाप के जीवित रहते ही बंटवारे की माँग की। एक तरह से उस बेटे ने, धन संपत्ति के लालच में, यह कह दिया कि बाप उसके लिए मर चुका है। बाप ने भी उसकी मान ली और वह बेटा अपने हिस्से की संपत्ति लेकर बाप का घर छोड़कर अपनी मर्ज़ी और मौज करने निकल पड़ा। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि बाप के दिल पर क्या गुज़र रही होगी। वह बेटा अपने बाप के घर से तो निकल गया पर बाप के दिल से नहीं निकल पाया। वह एक बड़े शहर में चला गया और कुछ समय में सब कुछ गवाँ बैठा और बरबाद हो गया। जब वह किसी लयक नहीं रहा और खाने के भी लाले पड़ने लगे तो उसे याद आया इतना सब कुछ करने के बाद भी उसका पिता है और वह उसे माफ भी कर सकता है। इस एहसास के होते ही वह अपने बाप से मिलने चल पड़ा, एक समय का राजपुत्र अब भिखारियों की तरह अपने बाप के घर की ओर लौटा। दूर से ही उसे आता देखकर वह बाप अपने बेटे से मिलने दौड़ पड़ा और उसकी उसी बदहाल दशा में, जिसमें वह आया था, उसके एक भी शब्द बोलने से पहले ही बाप ने उसे अपने सीने से चिपटा लिया, उसे चूमा और उसे ऐसा प्यार और आदर दिया जैसे उसने कभी बाप के विरोध में कुछ किया ही न हो। प्रभु का यह दृष्टाँत परमेश्वर पिता के प्रेम और क्षमाशीलता को दरशाता है।

जैसे ही कोई पापी पश्चाताप के साथ परमेश्वर की ओर मुड़ता है, परमेश्वर उसे वैसे ही ग्रहण कर लेता है जैसे उस बाप ने अपने बेटे को कर लिया। ऐसा ही प्यार प्रभु ने मुझ जैसे से किया और आप से भी करता है। मन की सादगी से ही इस प्यार का एहसास हो पाता है। सादगी का अर्थ यह कदापि नहीं है कि संत लोग लंगोटी पहन कर बैरागी हो कर जीयें। संतों के स्वभाव में सादगी होनी चाहिए। लेकिन अक्सर वे अपनी मक्कारी और बनावटीपन से इस आत्मिक सादगी को खो बैठते हैं। प्रभु हमें ऐसा मन दे जो उसके प्यार का एहसास कर सके और उसको दिल से प्यार कर सके। यही प्रेम हमें विवश करेगा कि हम उसके लिए कुछ कर पाएं।
हमें “सम्पर्क” के लिए आपकी विशेष प्रार्थनों की आवश्यकता है। हम अलग-अलग स्थानों में “सम्पर्क” सभाएं आयोजित करने की इच्छा रखते हैं। यदि आप चहते हैं कि आप के गाँव या शहर में इनका आयोजन हो तो आप प्रार्थना करके हमें शीघ्र ही सूचित करें। हम इन “सम्पर्क” सभाओं में किसी भी मिशन या सम्प्रदाय की शिक्षाओं का प्रचार कतई नहीं कर पाएंगे, हम केवल पापों से क्षमा का प्रभु का संदेश ही दे पाएंगे। इन सभाओं के लिए “सम्पर्क” परिवार केवल प्रचारकों के आने-जाने का व्यय ही उठाएगा, सभाओं से संबंधित शेष सभी व्यय आयोजकों को ही उठाना पड़ेगा। यदि प्रभु आपको इन सभाओं की आज़ादी देता है तो शीघ्र पत्र व्यवहार करें।

फिर से हम आपके लिए कुछ प्रार्थनों के विषय छोड़ना चाहते हैं और हमें आशा है कि आप अपनी प्रार्थनाओं से हमारी मद्द अवश्य करेंगे। ये विषय हैं:
१. हम इन बुरे दिनों में प्रभु के लिए एक अच्छा जीवन जी सकें।
संदेश पहुँचा सकें।
३. यदि प्रभु की इच्छा में हो तो हम सम्पर्क को और भी भाषाओं
२. जिन इलाकों तक अभी सुसमाचार नहीं पहुँचा है वहाँ जीवन का य
हमें प्रकशित कर सकें।
४. सम्पर्क पत्रिका और भी अधिक लोगों तक पहुँच सके।

आपके पत्रों की प्रतीक्षा में,

प्रभु में आपका - सम्पर्क परिवार


शनिवार, 22 अगस्त 2009

सम्पर्क अगस्त २००१: परमेश्वर के वचन से सम्पर्क

यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाऐं - यूहन्ना १:७

एक नामधारी “विश्वासी” साहब थे। कहीं किसी दुकानदार ने चालकी से कुछ अच्छे नोटों के बीच एक फटा नोट उन्हें भेड़ दिया। जब उन्हें पता चला तो बहुत झल्लाए, काफी देर तक काफी कुछ सुनाते रहे, जैसे “कैसे नालायक लोग हैं, कैसा ज़माना आ गया है”, वगैरह वगैरह। सच तो यह है कि उन्हें झुंझलाहट ज़माने के हालात से या लोगों के व्यवहार से नहीं थी, असली परेशानी थी कि नोट बड़ा ग़लत फंस गया था। थोड़ी देर झुंझलाने के बाद ज़रा दिमाग़ लड़ाया और शाम के झुटपुटे में एक भीड़ भरी दुकान में गए, अच्छे नोटों में दबाकर फटा नोट व्यस्त दुकानदार को भेड़ दिया, फिर एक सुकून की लम्बी साँस ली और मुस्कुराते हुए बाहर आ गए, जैसे अब सारा ज़माना ही सुधर गया हो। ऐसे ‘तीन-तेरह’ करने वालों के लिए २ तिमुथियुस ३:१३ में ही लिखा है “... धोखा देते हुए और धोखा खाते हुए बिगड़ते चले जाऐंगे।”

हमारी जीवन शैली ही हमारे जीवन की गवाही है। युहन्ना रचित सुसमाचार गवाही का सुसमाचार कहा जा सकता है। ‘गवाही’ शब्द का उपयोग इस सुसमाचार में २२ बार किया गया है। वह - युहन्ना बपतिस्मा देने वाला, गवाही देने आया कि “ज्योति कि गवाही दे ताकि सब मनुष्य विश्वास लाऐं” - युहन्ना १:७। इस पद में तीन बातें मुख्य हैं:-

१. ज्योति २. गवाही ३. ताकि सब विश्वास लाऐं।

१. ज्योति: पुराने नियम और नए नियम के बीच ४०० वर्ष अंधकार का समय था। इस समय में न तो कोई भविष्यद्वक्ता और न ही आतमिक दर्शन प्रकट हुए। इस लम्बे अंधकार के समय के अन्त में यूहन्ना बपतिसमा देने वाला प्रकट हुआ। वह एक जलता हुआ दीपक था (युहन्ना ५:३५) जो भी ज्योति में जीवन जीता है उसका अंधकार से क्या लेना देना? ज्योति हमें जताती है कि हम कहाँ हैं; हम वास्तव में क्या हैं। ज्योति कई छिपी परतों को हटाकर हमारी असलियत हमें दिखाती है। हम कितनी बार काम चलाऊ झूठ बोलते हैं। सच को कहने की और उसके परिणाम सहने की हममें सामर्थ ही नहीं होती। जैसे - हम अक्सर कह देते हैं “आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई” जो वास्तव में सच नहीं होता, असल सच जो मन में होता है कि “यह मनहूस क्यों आ टपका” - हम आदतन झूठ बोलते हैं।

वचन को दर्पण भी कहा गया है (याकूब १:२२)। दर्पण को इससे क्या लेना देना कि उसके आगे कौन खड़ा है। वह किसी का पक्षपात नहीं करता; जो जैसा है, उसे वैसा ही दिखा देता है। यदि मन में कचरा भरा हो तो फिर खुशबू कहाँ से महकेगी, अंधकार के काम घिरे हों तो ज्योति कहाँ से चमकेगी। वचन जीवित ज्योति है, उसमें जीवन है “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अंधकार में चलें तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते (युहन्ना १:६)।” शत्रु-शैतान कितनों को अन्धेपन का ज़हर पिला रहा है। उन्हें पता ही नहीं चलता कि शैतान उनका उपयोग कर रहा है। परमेश्वर के शब्द हमें कई बार छू लेते हैं और हम तिलमिला जाते हैं, उन्हें सह लेना सहज नहीं होता। हम वचन को जानते हैं पर मानते नहीं। जानना बहुत ही सस्ता सौदा है पर वचन को मानना महंगा पड़ता, कीमत चुकानी पड़ती है। बाईबल को बहुत जानने से फर्क नहीं पड़ता, पर वास्तव में मानने से जीवन में फर्क पड़ता है। प्रभु कहता है कि “जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो मुझे हे प्रभु, हे प्रभु क्यों कहते हो? (लूका ६:४६)” ज़्यादतर विश्वासियों को सस्ते सौदे ही सुहाते हैं। मन कहता है कि ऐसे रास्ते सिखाओ कि “हल्दी लगे न फिटकरी बस रंग चोखा जम जाए।” एक-दूसरे पर रंग जमाने के लिए कई बार प्रार्थना सभाओं में प्रार्थनाएं प्रभु को सुनाने के लिए नहीं पर साथियों को सुनाने के लिए ही होती हैं।

संकरा रास्ता सस्ता रास्ता नहीं है। ऐसे कितने नामधारी विश्वासी हैं जिनके मन में परमेश्वर के वचन के लिए दो कौड़ी की भी श्रद्धा नहीं है। उनके लिए बाईबल अद्धयन की सभाओं का कोई महत्व नहीं होता, क्योंकि बाईबल अद्धयन में जाने के लिए धन और समय दोनो की कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसों को शत्रु शैतान बड़ी सहजता से अपना शिकार बना लेता है। ये लोग अपने आवेग पर काबू पाने की क्षमता खोते जाते हैं। इस कारण मण्डलियों में बदला लेने वाले, उग्र, झगड़ालू और दूसरों को अपमानित करने वाले ‘विश्वासियों’ का उदय होता है। ये ही लोग सारी मण्डली में एक सूनापन उत्पन्न करते हैं और प्रभु के लोगों में भी आपस में फूट डालकर मण्डली को तो़ड़ते हैं। वास्तविकता तो यह है कि प्रभु के लोगों की सही सेवा तोड़ने की नहीं पर जोड़ने की होती है - प्रभु यीशु ने कहा है “धन्य हैं वे जो मेल करवाने वाले हैं क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे (मत्ती ५:८)”।

वचन की ज्योति का अभाव जीवन में भटकाव पैदा करता है। प्रकाश के अभाव में रस्सी का टुकड़ा भी साँप सा दिखने लगता है। आत्मिक धुंधलेपन में ऐसे विश्वासियों को सच्चे भाई भी दुश्मन से लगने लगते हैं और उनके जीवन का उद्देश्य ही खो जाता है। “बिना मेल मिलाप और पवित्रता के परमेश्वर को कोई कदापि न देखेगा - इब्रानियों १२:१४”। ऐसे में क्या आप के दिल में प्रार्थना है कि हे प्रभु मुझे अपने आश्रय में बनाए रख, कहीं अन्धकार में खो न जाऊँ; आमीन।

२. गवाही: इस पद का दूसरा भाग है “गवाही देने आया”। जिसके पास पुत्र (प्रभु यीशु) है उसके पास गवाही है - १ युहन्ना ५:१०। प्रभु कहता है कि तुम मेरे गवाह हो। जो गवाह गवाही न दे वो किस काम का? यदि विश्वासी सुसमाचार न दे तो वह निश्चित रूप से हारा हुआ जीवन जीएगा। एक जयवन्त जीवन जीने के लिए हर दिन सुसमाचार सुनाना ज़रूरी है - “प्रतिदिन उसके उद्धार का सुसमाचार सुनाते रहो (१ इतिहास १६:३०)”। गवाही मात्र दूसरों को बचाने के लिए ही नहीं, पर अपने आप को बचाए रखने के लिए भी ज़रूरी है - “वे मेमने के लहु और अपनी गवाही के वचन के कारण उस पर जयवन्त हुए (प्रकाशित वाक्य १२:११)”।

कई बार जब हम सुसमाचार देते हैं तो ऐसा बुझा सा जवाब मिलता है कि दिल ही बुझ जाता है। एक बार मैं दिल्ली से बस के द्वारा घर वापस आ रहा था, मेरे बगल की सीट पर एक जनाब बैठे थे। ज़रा तुनक मिज़ाज़ के से लग रहे थे, फिर भी मैंने हिम्मत बाँध कर प्रभु की गवाही देने के लिए , शायद, कुछ इस तरह बात शुरू की - “जनाब आप कहाँ जा रहे हैं, कहाँ काम करते हैं?” पता चला जनाब ऋषिकेश के किसी बैंक में काम करते हैं। मैंने बात आगे बढ़ाने के लिए कहा “क्या आप परमेश्वर पर विश्वास करते हैं?” मेरा परमेश्वर का नाम लेना था कि उनके जवाब ने मेरे सवाल का गला घोंटकर सारे सवाल की जान ही निकाल दी। बड़ी कुतर बुद्धी थे, सारी बात को कुतर डाला। तुनक कर बोले “जनाब कुछ लोग कुत्ता पालते हैं, कुछ बिल्ली, कुछ गधा। आपने परमेश्वर को पाल रखा है तो आप पाले रखें, मेरे गले उसे क्यों मढ़ रहे हैं?” मैं जवाब सुनते ही बगलें झांकने लगा क्योंकि आगे कुछ कहने को रहा ही नहीं। ऐसे ही एक बार बस में एक व्यक्ति को सुसमाचार का पर्चा दिया; उसने पढ़ना शुरू किया, लेकिन यीशु मसीह का नाम पढ़ते ही झल्ला गया। पर्चा फाड़ा और मेरे मूँह पर फेंक कर मारा।

यह हमेशा ध्यान रखें कि अन्धों की दुनिया में आँखों वलों को सम्मान नहीं मिलता और झूठों की दुनिया में सच्चों को अपमान ही मिलता है। यहाँ ईमान्दार को बेवकूफ कहते हैं और ईमान्दारी को बेवकूफी।
बात १९८५ की है, प्रभु के बहुत ही प्यारे दास सी. ई. दासन पहली और आखिरी बार रूड़की में सेवकाई के लिए आए थे। उनके जीवन की आखिरी सेवकाई के बाद उनकी हालत काफी नाज़ुक होती गई। शाम को जब मैं भाई के कमरे से लौटने लगा तो वे मुझ जैसे व्यक्ति से कहने लगे कि “भाई क्या तुम मेरे लिए प्रार्थना करके नहीं जाओगे?” मैं टूट गया यह सोच कर कि इनके सामने मैं क्या हूँ? क्या मैं इस दास के लिए प्रार्थना करने के लायक हूँ? २३ अक्तूबर १९८५ को उनकी मौत से कुछ घंटे पहले नर्सिंग होम में मैं उनके साथ था। भाई की हालत नाज़ुक होने के कारण उन्हें दिल्ली ले जाने की तैयारी की जा रही थी। तभी अचानक दो लड़कियाँ मना करने के बाद भी उनसे मिलने उनके कमरे में आ पहुँचीं। भाई दासन ने सबसे पहली बात उनसे यह पूछी “क्या तुम्हें पापों की क्षमा मिल गई?” और फिर उसी हालत में वे उन्हें सुसमाचार देने लगे। मैं बीच-बीच में बार बार उन्हें टोकता रहा कि भाई आप मेहरबानी से ज़्यादा न बोलियेगा पर वे रुके नहीं। जब वे लड़कियाँ चली गईं तब उन्होंने मुझसे कहा “भाई अपनी बाईबल से अभी प्रेरितों के काम ४:२० पढ़ो।” मैंने वह पद पढ़ा, वहाँ लिखा था “क्योंकि यह तो हमसे हो नहीं सकता कि जो हमने देखा और सुना है वह न कहें।” मैं इस प्रभु के दास की तरफ देखता रहा और मेरे पास कहने को कोई शब्द थे ही नहीं। वे अब अपनी अंतिम यात्रा के लिए प्रस्तुत थे। वह इस महान दास के द्वारा कहा गया आखिरी पद और दी गयी आखिरी गवाही थी। कुछ ही घंटों बाद वह अपने प्रभु के पास चले गए। प्रभु की गवाही देने में वे मृत्यु तक विश्वास योग्य रहे।

ज़रा झुकें और ईमान्दारी से अपने अन्दर झाँकें और जाँचें कि किस उद्देश्य के लिए जी रहे हैं? “जिसने मुझे भेजा है, हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है; वह रात आने वाली है जिसमें कोई कुछ नहीं कर सकता (युहन्ना ९:४)।” आइये इस बहुमूल्य समय का सम्मान करें।

३. सब विश्वास लाऐं: इस पद का तीसरा और अंतिम भाग है “ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाऐं”। ज़्यादतर इसाईयों के पास बड़ा छोटा सा मसीह है जिसे वे इसाई धर्म के दायरे में ही रखते हैं। वह मसीह जो स्वर्गों में भी नहीं समा सकता, उस परमेश्वर को कितनो ने तो इतना छोटा बना डाला है कि वे उसे सिर्फ अपने मिशन और ग्रुप में ही लपेट कर रख सकें। मसीह ने अपने बारे में कहा “मैं जगत की ज्योति हूँ (यूहन्ना ८:१२)।” जगत की ज्योति को किसी धर्म, मिशन या ग्रुप के ढक्कन के नीचे कभी नहीं रखा जा सकता। लूका लिखता है “मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिए है (लूका १:१०)।” मत्ती कहता है “वह (यीशु) लोगों को उनके पापों से उद्धार देगा (मत्ती १:२१)।” प्रभु इन दो पदों में दो बातों पर ज़ोर देता है, पहली बात “सब लोगों के लिए” दूसरी, पाप के लिए नहीं पर पापों के लिए, अर्थात सब पापों के लिए। पाप करने वाला कोई क्यों न हो, कितने भी और कैसे भी पाप क्यों न किये हों “उसका लहु हमें सब पापों से शुद्ध करता है (१ युहन्ना १:७)”।

सारे धर्म यही सिखाते हैं कि अच्छे काम करने के द्वारा परमेश्वर तक पहुँचा जा सकता है। परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि हमारे कोई भी और कितने भी अच्छे काम इतने अच्छे कतई नहीं हैं कि हम उनके द्वारा परमेश्वर तक पहुँच सकें (यशायह ६४:६, तीतुस ३:५)। केवल एक ही अच्छा काम है जो परमेश्वर को ग्रहण योग्य है और जिसके आधार पर हम परमेश्वर के पास आ सकते हैं, वह अच्छा काम प्रभु यीशु ने कलवरी के क्रूस पर अपनी जान देकर किया और उसके द्वारा समस्त मानव जाति के लिए उद्धार का मार्ग खोल दिया। बस जो कोई, जैसा भी, जहाँ भी हो, यदि उस पर विश्वास करेगा, वह नाश न होगा पर अनन्त जीवन पाएगा।

अब हम संसार की समप्ति के समीप खड़े हैं जहाँ पर इस संसार की और सहने की सीमाएं समाप्त हो चुकी हैं। परमेश्वर नहीं चाहता कि उसका वचन सिर्फ आपके घर की दीवारों पर ही ठुक रहे, वह चाहता है कि उसका जीवन्दायी वचन किसी तरह आपके दिल में भी ठुक जाए। जल की तस्वीर को दीवार पर लगा लेने से प्यास तो नहीं बुझ सकती। आप जल के बारे में बहुत सुनते, बहुत जानते, बहुत प्रचार भी करते हैं पर सच्चाई तो सिर्फ यही है कि जब तक जीवन के जल को आप ग्रहण नहीं करते, तब तक तृप्ती पा नहीं सकते। यह भी सम्भव नहीं कि जल मेरे माँ-बाप ग्रहण करें और प्यास मेरी बुझ जाए। जो भी जीवन के जल को ग्रहण करते हैं, उन्हें फिर किसी धर्म को ग्रहण करने की ज़रूरत ही नहीं बचती। उनके जीवन में एक नया परिवर्तन प्रकट होता है। ऐसा बदला हुआ जीवन स्वयं गवाही देता है।











सोमवार, 17 अगस्त 2009

सम्पर्क अगस्त २००१: एक प्यासा जीवन के जल के पास

मेरा नाम प्रभजोत सिंह चानी है। मेरा जन्म १९६७ में दिल्ली के एक सिख परिवार में हुआ। मैं अभी रूड़की विश्वविद्यालय में एक अध्यापक हूँ। मेरे माता पिता ने बचपन से ही मुझ पर कोई धार्मिक दबाव नहीं डाला। जबकि मुझे अपने धर्म का कुछ भी ज्ञान नहीं था, लेकिन फिर भी मुझे सिख होने का घमण्ड था। मैं बहुत छोटी उम्र से ही एक दोगला जीवन बिताने लगा-एक जीवन घर में दूसरा घर के बाहर। बचपन से ही मैंने अपने माँ बाप के बीच में छोटी बड़ी बातों पर लड़ाई झगड़ा होते देखा; उनकी गालियों और चीखने चिल्लाने से मैं बहुत सहम जाता। घर के अन्दर मैं एक सहमा दबा हुआ जीवन जीता और घर के बाहर अपने दोस्तों के साथ गन्दे घिनौने पापों में मज़ा लेकर मन बहलाता।

मेरे पिता लगातार अपनी नौकरी में तरक्की करते गए। घर में सच्ची खुशी और शान्ती के सिवाए किसी चीज़ की कमी नहीं थी। दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ स्कूल में पढ़ने से मुझे लगने लगा कि जीवन का वास्त्विक आनन्द पैसे और अधिकार से ही मिलता है। फिर भी मेरे मन में अजीब सी बेचैनी और अकेलापन रहता था। मैं कभी अपने माँ बाप से खुलकर बात नहीं कर पाता था और अपने हम-उम्र दोस्तों में खुशी खोजता था पर यह खुशी थोड़े समय की ही होती थी। ११वीं कक्षा ताक आते-आते मैं पापों में धंस चुका था। सिग्रेट-शराब पीना, भद्दी पार्टियों में जाना, गन्दी किताबें और फिल्में मेरे जीवन का हिस्सा बन चुकी थीं। मेरे माँ बाप के आपसी सम्बन्ध भी बहुत नीचे आ गये थे जिसे मैं चुप होकर देखता रहता। मेरा दिल अपने पिता के प्रति घृणा से भर चुका था। इन सब के बीच मेरी पढ़ाई को चोट लगी परन्तु फिर भी मेरा दाखिला रूड़की विश्वविद्यालय में हो गया। जो विष्य मैं लेना चाहता था वह मुझे नहीं मिल जिससे मेरी निराशा और बढ़ गई। अन्दर ही अन्दर मैं जानता था कि अपनी इस हालत का दोषी मैं खुद हूँ, पर सुधरने के विपरीत कॉलेज और होस्टल के आज़ाद वातवरण में मैं और भी बिगड़ता गया। अपने पिता का पैसा पानी की तरह बहाना और उन्हें झूठा हिसाब देना मेरे लिये हर बार की बात थी। साथ ही साथ मेरी अशान्ति और बढ़ने लगी। मेरे निजी सम्बन्धों में मुझे कुछ और करारे झटके लगे जिससे मैं अपने माँ बाप से और दूर होता चला गया।

१९८७ के आखिर में आते-आते तक मैं अपने आप को खोया हुआ महसूस करने लगा, सब कुछ होते हुए भी मैं कंगाल खड़ा था। ऐसा लगता था कि अब आगे चलने की ताकत नहीं रही। मैं हार चुका था अपने स्वभाव से, अपने पापों से अपनी परिस्थितियों से। एक शाम मैं अपने डिपार्टमेंट से अपने हॉस्टल लौट रहा था, जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, मेरी आँखों में आँसू थे। एक मोड़ मुड़ते हि मैंने अपने सामने एक लड़के को खड़ा देखा जिसके बारे में मैंने उन दिनों सुना था कि वह कहता था कि रूड़की में मेरा नया जन्म हुआ है। उसके इस अजीब वाक्य ने मुझे उसकी ओर खींचा। मैं सड़क पर चलते-चलते उससे बात करने लगा, लेकिन वह मुझसे पापों के प्रायश्चित के बारे में बातें कर रहा था। उसकी यह बातें मेरी कुछ खास समझ नहीं आईं पर उसने रात अपने कमरे पर आने का निमंत्रण दिया जो मैंने स्वीकार कर लिया। मुझे नए विचार सुनना अच्छा लगता था इसलिए उस रात मैं उस छात्र के कमरे पर गया। उसने मुझे बाईबल से खोल कर दिखाया और जो पद मेरे सामने थे, उन्में लिखा था “जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा, परन्तु जो जल मैं उसे दूँगा वह फिर प्यासा न होगा...” (यूहन्ना४:१३)। मुझे ऐसा लगा कि मानो कोई मुझ से बात कर रहा हो। यह मेरे जीवन की हालत थी। मेरे पास सब कुछ था, पर फिर भी मैं प्यासा था; और यह यीशु मेरी प्यास हमेशा के लिए बुझाने का आश्वासन दे रहा था। मैं अपने कमरे पर वापस लौट आया। इस बातचीत ने मुझे बहुत प्रभावित किया, परन्तु मैं यीशु और परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं कर सका क्योंकि जवान होते-होते मैं नास्त्क प्रवर्ति का बन चुका था। कुछ दिन बाद वही छात्र मेरे कमरे पर आया और मुझे एक प्रार्थना करने के लिए कहा। मैंने उसकी बात रखने के लिए और थोड़ी जिज्ञासा के साथ उसके पीछे-पीछे एक प्रार्थना की पंक्तियाँ दोहरा दीं। मुझे शब्द तो याद नहीं पर वह पापों की माफी और प्रभु यीशु पर विश्वास करने की प्रार्थना थी।

इस प्रार्थना से कोई बाहरी बदलाव तो नहीं आया लेकिन अगले ही दिन मुझे एहसास होने लगा कि मैं अन्दर से बदलने लगा हूँ। इसकी शुरुआत ऐसे हुई कि मेरे मूँह से गन्दी गालियाँ, जिन्हें मैं बकना छोड़ नहीं सकता था, अपने आप निकलनी बन्द हो गईं। मैं हैरान था कि क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक बात है या वासत्व में कोई जीवित परमेश्वर है? इस सवाल के उत्तर के लिए मैं एक भूखे आदमी की तरह बाईबल पढ़ने लगा। प्रभु यीशु की अदभुत बातें और उसका प्रेम मेरे मन को छू गया। कई बार वचन पढ़ते पढ़ते मैं रो पड़ता था। मेरा जीवन, मेरा स्वभाव बदलता जा रहा था।

मैं प्रभु के लोगों के साथ संगति करने लगा और उनकी संगति और प्रार्थना और वचन पढ़ने से मेरा विश्वास स्थिर होता गया। मुझे विश्वास हो गया कि मुझे पापों और उसकी भयानक सज़ा से छुटकारा देने के लिये ही प्रभु यीशु ने क्रूस पर अपने प्राण दिये और वह मर कर फिर तीसरे दिन जी उठे। जब मैंने यह बातें अपने परिवार में बताईं तो अचानक बहुत विरोध उठ खड़ा हुआ। कुछ कट्टरवादी लोग भी धमकियाँ देने लगे। कई बार लगा कि मेरे पिता मुझे घर से निकाल देंगे। लेकिन अजीब बात यह थी कि अब मेरे अन्दर पहले सा डर नहीं था। प्रभु ने मुझे हिम्मत से भर दिया कि मैं विश्वास में खड़ा रह सकूँ। मेरे मन में मेरे माता पिता के प्रति सच्चा प्रेम और आदर आने लगा।

मैं प्रभु के लोगों के साथ संगति करने लगा और उनकी संगति और प्रार्थना और वचन पढ़ने से मेरा विश्वास स्थिर होता गया। मुझे विश्वास हो गया कि मुझे पापों और उसकी भयानक सज़ा से छुटकारा देने के लिये ही प्रभु यीशु ने क्रूस पर अपने प्राण दिये और वह मर कर फिर तीसरे दिन जी उठे। जब मैंने यह बातें अपने परिवार में बताईं तो अचानक बहुत विरोध उठ खड़ा हुआ। कुछ कट्टरवादी लोग भी धमकियाँ देने लगे। कई बार लगा कि मेरे पिता मुझे घर से निकाल देंगे। लेकिन अजीब बात यह थी कि अब मेरे अन्दर पहले सा डर नहीं था। प्रभु ने मुझे हिम्मत से भर दिया कि मैं विश्वास में खड़ा रह सकूँ। मेरे मन में मेरे माता पिता के प्रति सच्चा प्रेम और आदर आने लगा।

कई साल मैं अपने परिवार को समझाता रहा कि मैंने कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया है बल्कि मेरा जीवन बदल गया है। १९९१ में प्रभु ने मुझे स्पष्ट रीति से रू़ड़की में रहने के लिये कहा। मेरे घर में फिर विरोध हुआ, लेकिन प्रभु मेरे लिए रास्ते निकलता चला गया और मैं उच्च शिक्षा रूड़की विश्वविद्यालय में ज़ारी रख सका।

१९९५ में एक सड़क दुर्घटना में मेरी दाईं टाँग खराब हो गई। कई बहुत काबिल डाकटरों की कोशिशों के बावजूद भी वो उसे ठीक नहीं कर सके। दो साल अस्पताल के अन्दर बाहर और कई अपरेशनों के बीच मैं बहुत अकेलेपन और घोर निराशा से निकला। इस दौरान मैंने अपने आत्मिक जीवन में पहली बार प्रभु को इतना करीब से देखा। धीरे-धीरे मैं सीखने लगा कि मेरे जीवन की डोर उसी के हाथ में है और प्रभु मेरा बुरा नहीं होने देगा। इस हादसे ने मेरे माता पिता पर भी प्रभाव डाला, क्योंकि वे प्रभु के लोगों का मेरे प्रति प्रेम और मेरे जीवन में प्रभु की शांति को देखते थे। मेरे माता पिता चिंतित थे कि हमारा बेटा लंगड़ाता है, सो कौन इससे विवाह करेगा? लेकिन प्रभु ने १९९७ में मुझे अपने अदभुत प्रेम में एक ऐसी पत्नी दी जो प्रभु की दया से सच में मेरे लिए एक उपयुक्त जीवन साथी है। मैंने अपने इस छोटे से परिवार में वह खुशी और आनन्द पाया है जिसकी मैं लालसा करता था। १९९९ में प्रभु ने हमें एक बेटी का दान भी दिया।

जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो मेरा दिल खुशी और धन्यवाद से भर जाता है। यह आज भी मेरे लिये हैरानी की बात है कि मेरा उद्धार कैसे हो गया? प्रभु में आने के बाद मैंने बहुत बार एक हारा हुआ सा जीवन बिताया, लेकिन प्रभु ने न तो मुझे छोड़ा न त्यागा। मेरा आपसे नम्र निवेदन है कि अप मेरी सेवकाई और परिवार को अपनी बहुमूल्य प्रार्थनों में याद रखियेगा।