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सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

सम्पर्क फरवरी २००१: परमेश्वर के वचन से सम्पर्क

यूहन्ना प्रेरित नये नियम के उन आठ लेखकों में से एक है जिनके द्वारा पवित्र आत्मा ने नये नियम की २७ पुस्तकों को लिखवाया। उनमें से ५ पुस्तकों का लेखक यूहन्ना है।

यूहन्ना यहूदी धर्म का अनुयायी और गलील प्राँत के बेथसदा के निवासी जब्दी और शलोमी के छोटे बेटे थे। ये लोग गलील की झील से मछली पकड़ने का धंधा किया करते थे। यह झील २१ की०मी० लम्बी और ११ की०मी० चौड़ी है। इतनी बड़ी झील में वे पूरी पूरी रात मशालें लेकर नाव खेते थे। भारी जाल जो १०० फीट के घेरे में फैलता था, उसे उन्हें बार बार फेंकना और खींचना पड़ता था। ऐसी सख्त मेहनत ने इनके कंधों, हाथों और जिस्म को आम आदमी से कहीं ज़्यादा मज़बूत बना दिया था।

ये लोग अपना दिमाग का कम और शरीर का ज़्यादा उपयोग करते थे और लड़ने मरने को तैयार रहते थे। इसलिए इस्त्रायली लोग गलील के लोगों को बिलकुल अक्ल से पैदल समझते थे। इस्त्राएल के सर्वोच्च धर्म गुरुओं का विश्वास था कि गलील से कभी कोई नबी प्रकट नहीं होगा (यूहन्ना ७:५२)। अजीब बात यह थी कि प्रभु ने अपने १२ में से ११ चेलों को ऐसे गलील से ही चुना; बस एक यहूदा से था और वह था यहूदा इस्करियोती।

प्रभु के चुनाव को देखिये, उसने जगत के बेवकूफों को चुन लिया, जिन्होंने जगत को उथल पुथल कर डाला और मानवीय इतिहास में ऐसा परिवर्तन लाए जो आज २००० साल बाद भी रुका नहीं। मेरे प्रभु ने ऐसे लोगों को ऐसा बना दिया जैसा कभी कोई सोच भी नहीं सकता। वही प्रभु आज भी वैसा ही है और उसने कहा “मैं तुम्हें बनाऊँगा (मत्ती ४:१९)। जो कोई मेरे पास आयेगा उसे मैं कभी न निकालूँगा (यूहन्ना ६:३७)।” जो भी हो, जैसा भी हो, वह उसे निकालेगा नहीं पर बना देगा।

प्रेरितों के काम ५:३६,३७ पद बताते हैं किउस काल में इस्त्राएलियों ने रोमी सरकार के विरुद्ध कई विद्रोह किये थे और और उन विद्रोहों को रोमियों ने बुरी तरह कुचल डाला था। यूहन्ना ऐसे माहौल में पैदा हुआ और बड़ा हुआ परन्तु वह एक सच्ची शाँती का खोजी था इसलिए वह यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का चेला बन गया। एक दिन उसके इस गुरू ने एक व्यक्ति को उसे दिखाया और उससे एक बड़े भेद की बात कही। उसने प्रभु की ओर इशारा करते हुए कहा “देखो यह परमेश्वर का मेमना है जो जगत के पाप उठा ले जाता है (यूहन्ना १:२९)।” बस फिर क्या था, उसने अपनी जवानी में ही अपना जीवन प्रभु को समर्पित कर दिया और प्रभु ने उसे एक ऐसा साहसिक पुरुष बना डाला जो इतिहास में अनन्त तक जीवित रहेगा।

यूहन्ना रचित सुसमाचार में यूहन्ना प्रेरित पवित्र आत्मा के द्वारा इतने सटीक शब्द चित्र प्रस्तुत करता है जैसे सीधे घटना स्थल से कोई चश्मदीद गवाह बोल रहा हो। इन बातों को कोई चुनौती दे नहीं सकता, जैसे: “यह बात दसवें घंटे की है(यूहन्ना १:३९)”; “और यह बात छटे घंटे के लगभग हुई (यूहन्ना ४:६)।” यह सुसमाचार इन घटनाओं के लगभग ५० साल बाद लिखा गया था पर इन घटनाओं का प्रभाव देखिये कि यूहन्ना को घंटे तक याद थे।

यूहन्ना प्रेरित हमारे सामने किसी एतिहासिक यीशु को नहीं रखता पर एक वास्तविक यीशु को जो स्वयं परमेश्वर है प्रस्तुत करता है। वह इसी बुनियादी सच्चाई को लेकर चलता है। वह अपना सुसमाचार आरंभ करता है “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था और वचन ही परमेश्वर था। यही आदि में परमेश्वर के साथ था (यूहन्ना १:१,२)।” “आदि” शब्द किसी भी समय सीमा के साथ बांधा नहीं जा सकता। इन दो पदों में चार बार “था” शब्द का प्रयोग किया गया है। “आदि” में कितना भी पीछे चले जाएं, जहाँ जाएं वहाँ वचन “था” । यह वचन पैदा नहीं हुआ परन्तु हर जगह पहले ही से “था” । यह वचन सृष्टि नहीं, सृष्टिकर्ता है।

ध्यान दें इन तीन शब्दों पर - (१) ध्वनि, (२) शब्द, और (३) वचन। ध्वनि अर्थहीन होती है और शब्द या आवाज़ सन्देश वाहक होते हैं, जिनके द्वारा सन्देश या विचार हम तक पहुँचता है। लेकिन जिस “वचन” शब्द का प्रयोग यहाँ किया गया है वह इन दोनो से बिलकुल अलग है। उसमें अर्थ है, सामर्थ है: “और वह सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ के वचन से सम्भालता है...” (इब्रानियों १:३)। इसी वचन के सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है (रोमियों १०:१७)। यही वचन हमें सम्भालता और सुधारता है। यह वचन कोई फिलौसफी नहीं है, यह परमेश्वर के दिल की आवाज़ है। इसी वचन में परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर की इच्छा है। यूहन्ना अपने इस सुसमाचार में ३६ बार इस “वचन” का प्रयोग करता है। ध्यान दें “वचन” शब्द का उप्योग करता है, वचन्मों का नहीं। प्रभु यीशु के ३७ नामों में से एक नम “परमेश्वर का वचन” भी है। यानि यही एकलौता वचन जो एकलौता पुत्र है।

मेरे लिए तो एक और बात है कि मैं इस वचन के द्वारा अपने अन्दर तक इमानदारी से देख पाता हूँ और यह मेरे लिए पवित्र आत्मा की आवाज़ है। प्रभु की दया से मैं इस वचन काअपने दिल से आदर करता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि यही परमेश्वर है। यह मेरे लिए कोई इतिहास की किताब नहीं है, हर रोज़ का जीवन है। यह मेरे लिए ‘बड़े दिन’ या जन्म दिन का केक नहीं पर हर रोज़ की रोटी है। जब मैं दिल की सच्चाई से इसे पढ़ता हूँ तो मैं कई बार इसके सहारे अपने जीवन को पढ़ने लगता हूँ। जब मैं भटकने लगता हूँ तब यह मेरी अगुवाई कर सही मार्ग पर लाता है। इसमें ज़रा भी मिलावट नहीं है। शुरू में सारी सृष्टी इसी वचन के द्वारा ही सृजी गई और सृष्टी का अन्त भी इसी वचन के द्वारा ही होगा, और फिर सबका न्याय भी इसी वचन के अनुसार ही होना है।

यही वचन आदि में परमेश्वर के साथ था और आज यही वचन आपके पास है, जो आज आपसे बात कर रहा है। इसी वचन में प्रभु ने आज्ञाएं भी दीं हैं पर प्रभु बड़े दुखी मन से कहता है “जब तुम मेरा कहना नहीं मानतॆ तो क्यों मुझे हे प्रभु हे प्रभु कहते हो?” (लूका ६:४६)।

बहुतेरे विश्वासी बहुत सी पाप की छोटी छोटी रस्सियों से बन्धे खड़े हैं। जैसे इर्ष्या, विरोध, लालच, कई छिपे गंदे काम, दोगलापन-बोलते कुछ हैं पर करते कुछ और ही हैं। पाप की ऐसी छोटी छोटी रस्सियों से बन्धा जन कुछ भी करने की सामर्थ खो देता है।

एक बार हमारे आदरणीय भाई जॉर्डन खान मेरठ में आए थे। मैं उस समय लड़का सा ही था। वहाँ एक आदमी प्रार्थना में ज़ोर ज़ोर से शैतान को बाँध रहा था (शायद भाई जॉर्डन खान उस व्यक्ति को जानते हों)। भाई ने बीच में ही ज़ोर से डाँटकर कहा, “चुप कर तू क्या शैतान को बाँधेगा, तुझे तो खुद शैतान ने बाँध रखा है।” शब्द तीखे थे पर सत्य थे। अनेक लोग परमेश्वर के सामने घुटने झुकाए दिखते हैं पर वास्तव में उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में शैतान के सामने घुटने झुका रखे हैं। जब उनके काम फंस जाते हैं तो चुपचाप इधर उधर रिश्वत देकर अपना काम निकलवा लेते हैं और फिर आकर सुनाते हैं कि कैसे प्रभु ने मेरे काम करवा डाले। क्या वास्तव में वह कम प्रभु ने करवाये या रिशवत ने? ये वे जीवन हैं जिनमें परमेश्वर के वचन का कोई काम नहीं है। ऐसे जीवन परमेश्वर के वचन का सीधा अपमान करते हैं, उस वचन का जो स्वयं परमेश्वर ही है।

एक बार की बात है, एक बूढ़े व्यक्ति ने अपने साथियों से पूछा, “ज़रा सामने देखो, वह जो आदमी बकरी को बाँधकर खींचे ले ज रहा है; क्या तुम मुझे बता सकते हो कि उस आदमी ने बकरी को बाँध रखा है या बकरी ने उस आदमी को?” उसके दोस्तों ने कहा “अबे यार तू वाकई में सठिया गया है। क्य तुझे दिखता नहीं कि आदमी ने बकरी को बाँध रखा है।” बुज़ुर्ग ने जवाब दिया “तो यार इन दोनो के बीच से इस रस्सी को हटा दे और तब बता कि बकरी आदमी के पीछे आएगी या आदमी बकरी के पीछे भागेगा।”

चाहे देखने में आदमी ने बकरी को बाँध रखा हो पर वासत्व में बकरी ने आदमी को बाँध रखा है। ऐसे ही कई नामधारी विश्वासियों को शैतान ने पाप की छोटी छोटी रस्सियों से बाँध रखा है। लेकिन इसी वचन में प्रभु ने अपनी बड़ी दया में कहा है “तुम सत्य को जानोगे और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा...(यूहन्ना ८:३२)।” “उसका वचन सत्य है। (यूहन्ना १७:१७)”

अगली बार प्रभु ने चाहा तो “सम्पर्क” के माध्यम से आप और हम फिर परमेश्वर के इस जीवित वचन से सम्पर्क करेंगे।



शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

सम्पर्क फरवरी २००१: मैं तुझे न छोड़ूँगा, तू मेरा है

मेरा नाम अभयेन्द्र कुमार सिंह है। मैं रुड़की विश्वविद्यालय में मैकनिकल इंजीनियरिंग के तृतीय वर्ष का २१ वर्षीय छात्र हूँ। मेरा जन्म फीजी देश में हुआ, जो प्रशान्त महसागर में ३३८ टापुओं का एक समूह है। मेरी माँ एक धार्मिक और काफी पूजा-पाठ करने वाली स्त्री थी। फिर भी मेरे परिवार में बहुत पारिवारिक समस्याएं रहती थीं। मेरा बड़ा भाई दुष्ट आत्माओं द्वारा जकड़ा हुआ था जिसके कारण हमारे घर में बहुत क्लेश होता था। अचानक १९९४ में मेरे इसी बड़े भाई ने आत्म हत्या कर ली। इस बात ने मुझे बुरी तरह झिंझोड़ दिया और मेरे मन में ईश्वर के प्रति आस्था को कुचल डाला।

उन मुश्किल के दिनों में जब मैं हाई स्कूल का छात्र था, तब कुछ लोगों ने मेरे स्कूल में बाईबल के नए निय्म की कुछ प्रतियाँ बाँटीं। मैं जब जब उस नए नियम को पढ़ता था तब तब मुझे एक अजीब सी शाँति मिलती थी। इसके बाद मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ एक प्रार्थना घर में जाने लगा। वहाँ पर सन्देश सुनने और नया नियम पढ़ने से मुझे प्रभु यीशु मसीह के प्रेम का एहसास होने लगा। प्रभु यीशु मसीह के क्रूस की गाथा मुझे बड़ी अजीब लगती थी। परन्तु धीरे धीरे मुझे बाईबल की इस सच्चाई पर विश्वास हो गया कि मैं एक पापी हूँ और प्रभु मेरे पापों के लिए क्रूस पर मारे गए, गाड़े गए और तीसरे दिन जी उठे। तब मैंने अपने पापों का पश्चाताप किया और प्रभु यीशु को अपने दिल में ग्रहण किया। मुझे विश्वास हो गया कि प्रभु ने मेरे सारे पापों को माफ कर दिया है। उसी क्षण मेरे जीवन में एक अद्भुत शान्ति आ गई।

उन्हीं दिनों मेरी बड़ी बहन ने भी प्रभु यीशु पर विश्वास करके अपने पापों से पश्चाताप किया, जिससे प्रभु यीशु पर मेरा विश्वास और भी मज़बूत हो गया। मैं हर रविवार को प्रभु के लोगों की संगति में जाने लगा। वहाँ मुझे बड़ा अद्भुत आनन्द मिलता था। परमेश्वर के अनुग्रह से १९९८ में जब मैं रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया तो यहाँ पर भी मुझे प्रभु के लोगों की संगति मिल गई। यह सब पढ़ कर आप सोच रहे होंगे मैं प्रभु में आगे ही बढ़ते जा रहा था; लेकिन ऐसा नहीं था। अब मैं आपको अपने जीवन के उस दुखदायी हिस्से के बारे में बताना चाहता हूँ।

इन सब आशीशों के बाद भी मेरे जीवन में कई गलत समझौते सालों तक पनपते रहे, पर मैं उनको लापरवाही से लेता रहा। इन समझौतों के चलते मैं धीरे धीरे परमेश्वर के लोगों की संगति से दूर होने लगा और मेरा समय बुरे दोस्तों के साथ मौज मस्ती में बीतने लगा। मैंने शैतान को अपने जीवन में काम करने का खुला द्वार दे दिया, जिसके चलते मैं एक भयानक पाप में फँस गया जिसके बारे में बताते हुए मुझे आज भी बहुत शर्म आती है। मैं जानता था कि परमेश्वर की नज़रों में मैं दोषी हूँ, परन्तु फिर भी इस पाप में मैं गिरता चला गया। मेरे जीवन के इन भयानक दिनों में मैं बहुत मानसिक तनाव से दब गया, लेकिन मेरा दिल इतना कठोर हो चुका था कि मैं अपनी इस दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिये प्रभु की ओर अपने हाथ नहीं फैला रहा था।

इन्हीं दिनों मेरे पिताजी का देहान्त हो गया और मेरा देश भी एक बड़े राजनैतिक संकट में पड़ गया। यह सारी विपरीत परिस्थितियाँ मिलकर मेरे सहने से बाहर हो रही थीं। गर्मियों की छुट्टियों में अपने परिवार से मिलने मैं फिजी गया लेकिन उन दिनों में भी मैंने परमेश्वर से और उसके वचन से मिलने का कोई प्रयास नहीं किया। अपनी मूर्खता में मैं यही सोचता रहा कि मैं खुद अपनी आत्म शक्ति से अपने पापों और विपरीत परिस्थितियों पर काबू पा लूँगा। मैं यह भूल गया कि शैतान और अंधकार की शक्तियाँ मेरी आत्म शक्ति से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं।

जब मैं छुट्टियों के बाद वापस अपने विश्वविद्यलय लौट के आया तो वही पाप मुझे फिर से जकड़ने लगे। ऐसी बुरी हालत में भी प्रभु यीशु ने मुझे नहीं छोड़ा और मुझे अपना ही सर्वनाश करने से रोके रखा। इस बार प्रभु ने अपनी बड़ी दया से उन दोस्तों की संगति से अलग कर दिया जो मेरे पतन का कारण थे। अचानक वही दोस्त मेरे शत्रु बन गये और मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया। इस अकेलेपन में मैं एक बार फिर परमेश्वर के वचन को पढ़ने लग गया और वह वचन मुझे उस गिरी हुई दशा से फिर से उठाने लगा।

मैंने फिर से अपने विश्वासी भाइयों की संगति में जाना शुरु कर दिया जो मेरे बुरे दिनों में भी, जब मैं प्रभु और उसके लोगों की संगति से दूर रहा, मेरे लिये प्रार्थना करते रहे। प्रभु ने मुझ भगौड़े बेटे को उसी प्रेम से फिर स्वीकार किया जैसे उसने मुझे पहले ग्रहण किया था। उसके वचन और संगति ने मुझे फिर से उभार कर खड़ा कर दिया।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मेरा दिल खुशी से भर जाता है, यह सोच कर कि मैं कहाँ तक गिरा और उसने मुझे कहाँ से उठा लिया। कितना सच है उसका यह कथन “मैं तुझे कभी नहीं छोड़ूँगा और न कभी त्यागूँगा (इब्रानियों १३:५)।”

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

सम्पर्क फरवरी २००१: संपादकीय प्रभु में प्रियों

आपका आभार प्रकट करने के लिये हमारे पास बहुत ही सीमित शब्द हैं। आपके प्यार भरे पत्र और पवित्र प्रार्थनाएं हमें संभालती और हियाव देती हैं। प्रभु यीशु की दया और आपका सहयोग रह तो “सम्पर्क” की सीमाएं, नये सदस्यों के साथ फैलती जाएंगी।

किसी बात को जानने में और समझने में बहुत बड़ा फर्क है। एक पत्नि अपने पति से गुस्से में बोली, “मैं तुम्हें खूब अच्छी तरह समझती हूँ।” वह अपने पति को न सिर्फ जानती थी वरन सालों उसकी संगति में रहकर अब वह उसकी बातों को और उसकी फितरत को खूब समझती थी। आज अधिकांश नये विश्वासियों के पास प्रभु की संगति का समय समाप्त सा होता जा रहा है। सुबह उन्हें बिस्तर नहीं छोड़ता, दिन व्यवसाय और काम से संबंधित भागा-दौड़ी में निकल जाता है और शाम को टी०वी० उन्हें पकड़ लेता है; बस उनके दिन ऐसे ही बीतते जाते हैं।

इसलिये बहुत से विश्वासी जानते तो बहुत हैं पर वचन को गंभीरता से समझ नहीं पाते। आपसी संबंधों में छोटी छोटी बातों पर आपस में उलझकर मच्छर छानने में लगे हैं और अपनी बेवकूफी से ऊँट निगले जा रहे हैं। जलन विरोध और बदले की भावना आदि सब ऊँट ही तो हैं जो निगले जा रहे हैं। ऐसे विरोध के पुराने पाप कितनी नई समस्याओं को जन्म देते हैं।

मक्कारों की भीड़ में वास्तविक विश्वासी खो सा गया है। ढूँढ कर देखो तो दो चार वास्तविक विश्वासी ही मिल पायेंगे। अब तो आलम यह है कि कई विश्वासियों पर ही विश्वास नहीं हो पाता। कई दफा हम यह गलत धारणा मन में रखकर जीते हैं कि प्रभु हमारी बरदाश्त कर ही लेगा, हमें माफ कर ही देगा। हम खुद हर बार परमेश्वर से क्षमा चाहते हैं पर हम खुद दूसरों को क्षमा करना नहीं चाहते। लेकिन वचन में लिखा है “और यदि तुम क्षमा न करो तो तुम्हारा पिता भी जो स्वर्ग में है, तुम्हारा अपराध क्षमा न करेगा (मरकुस ११:२६)।” “और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कोई विरोध हो तो क्षमा करो इसलिए कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे (मरकुस ११:२५)।” सच्चाई से क्षमा पाया हर एक जीवन हमेशा दूसरों को क्षमा करने का मन रखता है।

प्रभु पहले हमारे लिये काम नहीं करना चाहता, पर वह पहले हममें काम करना चाहता है। लेकिन कितनों ने अपने मन सख्त कर लिये हैं और प्रभु को काम करने देने के लिये समर्पित नहीं होते। इसलिए उनका आत्मिक प्रचार आत्मिक उपचार नहीं कर पाता। अगर यह सच है कि कुछ छोटी छोटी बातों के कारण दुसरों के प्रति आप अपने मन में विरोध पाले हुए हैं, तो आपके लिए यह सच्चाई और भी अधिक तीखी होगी कि ऐसे आप परमेश्वर के अनुग्रह का अपमान कर रहे हैं, चाहे यह बात आपके गले से नीचे उतरे या ना उतरे। परमेश्वर से माफी माँगना तो बहुत सहज होता है पर अपने भाई, बहिन, माँ-बाप, पत्नि, दोस्तों और मण्डली के लोगों से, दिल की सच्चाई से माफी माँगना बहुत कठिन होता है। यही छोटे पाप आपकी बड़ी आशीशों को रोके खड़े रहते हैं और आपको प्रभु के अनुग्रह से वंचित कर देते हैं। मन की यह गन्दगी हमारी सारी बन्दगी को व्यर्थ ठहरा देती है।

प्रभु ने शायद आपके मन को गहराई से खोदा और क्या कहीं यही सब कुछ तो नहीं पाया? हम झुकना नहीं चाहते, शायद दूसरों को झुकना चहते हैं। पतरस बहुत सालों बाद ही यह सीख पाया कि दीनता से कमर बँधी रहनी चाहिये। प्रभु के साथ पतरस का तीन साल का काम का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं था। बारह चेलों में बड़े बनने की बड़ी इच्छा से जूझता रहा, प्रभु के लिये जान देने का दावा करने के बाद कितने शर्मनाक ढंग से प्रभु का इन्कार कर गया। प्रभु तो उसकी यह सब बातें पहले ही से जानता था, लेकिन फिर भी दीनता के तौलिये को कमर पर कस कर प्रभु ने अपने पकड़वाने वाले शत्रु तक के पैर धो डाले। पतरस ने दीनता के इस पाठ को कई सालों बाद सीखा, और तब यह लिखा कि “तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा के लिये दीनता से कमर बाँधे रहो (१ पतरस ५:५)।” ऐसे विश्वासियों के जीवन में और उनकी बातों में अनुग्रह नहीं दिखता, क्योंकि उनहोंने अपनी कमर दीनता से नहीं बांधी। इसलिये उनके अन्दर का आदाम का नंगा स्वभाव स्बके सामने बार बार आता रहता है। अगर आपका दिल भी किसी के प्रति विरोध से भरा है तो फिर आपको फैसला करना है कि या तो आप उसे ठीक करें या फिर ताड़ना के लिये तैयार रहें। यदि दिल सख्त किया तो प्रभु अपनों को अनुशासित करना भी जानता है। ध्यान रहे कि प्रभु की ताड़ना को हलकी बात न समझें, “हे मेरे पुत्र प्रभु की ताड़ना को हलकी बात न जान...(इब्रानियों १२:५)।” प्रभु हमें वास्तविक दीनता और एक मनता में बनाये रखे।

बन्द करने से पहले आपकी प्रार्थनाओं के लिये अनुरोध करता हूँ। ऐसा न हो कि हम आपको उपदेश पहुँचा कर खुद निकम्मे साबित हों। “सम्पर्क” पत्रिका के प्रकाशन के लिये भी विशेष प्रार्थना करें और अपनी प्रतिक्रिया भी हमें अवश्य लिखें। प्रभु ने चाहा तो आपसे “सम्पर्क” के अगले अंक के माध्यम से फिर सम्पर्क करेंगे।

प्रभु में आपका,
“सम्पर्क” परिवार