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शनिवार, 7 नवंबर 2009

सम्पर्क दिसम्बर २०००: संपादकीय

प्रभु में प्रियों,


सिर्फ प्रभु यीशु की दया और उसके पवित्र सन्तों कि प्रार्थनाओं के उत्तर में सम्पर्क का दुसरा अंक प्रस्तुत कर पा रहे हैं। अनेक भाई बहिनों के पत्रों ने हमें बहुत ही उत्साहित किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें सम्पर्क के माध्यम से प्रभु ने कितना आशीशित किया। इसकी सारी महिमा हमारे प्रभु ही को मिले। आप में से कई लोगों ने हमारे लिये उपवास और प्रार्थनाएं कीं। उसके उत्तर को हम पिछले दिनों में साफ एहसास करते रहे। आपकी इस सहायता के लिए आपका बहुत धन्यवाद।


इस साल की समाप्ति के साथ-साथ कितने ही मौके जो हमारे पास थे, वे भी समाप्त हो गये। समय के अनुसार हमें बहुत आगे होना चाहिये था, पर शयद हम पिछड़ गये। कुछ अपने थे जो हमारे साथ नहीं रहे। कुछ, जो अपने जीवन की परेशानियों से थक चुके होंगे, अपने को मोहताज और हारा हुआ महसूस कर रहे होंगे। कुछ निराशा के कगार पर खड़े होंगे, शयद कुछ ने प्रभु से मौत भी मांगी होगी। बाईबल में कुछ धर्मी जन थे, जैसे मूसा, जिसके द्वारा बाईबल का लगभग १/८ हिस्सा लिखा गया, जो नये नियम के लगभग दो तिहाई भाग के बराबर है, ऐसा प्रभु का महन दास क्या कहता है “...मुझ पर तेरा इतना अनुग्रह हो कि तू मेरे प्राण एकदम ले ले - (गिनती ११:१५) ऐसा महान दास इतनी निराशा में दिखता है। योना नबी क्या प्रार्थना करता है-सो अब हे यहोवा (परमेश्वर) मेरे प्राण ले ले, क्योंकि मेरे लिये जीवित रहने से मरना भला है - (योना ४:) अय्युब क्या कहता है मैं गर्भ में क्यों न मर गया? (अय्युब ३:११) एलिय्याह ने निराश होकर क्या मांगा हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ - (१ राजा १९:) यर्मियाह प्रभु के सामने कैसे रोता है उसने मुझे गर्भ में ही क्यों न मार डाला कि मेरी माता का गर्भाशय ही मेरी कब्र होती - (यर्मियाह २०:१७) ये सब धर्मी जन थे और धर्मी जन की प्रार्थनों से बहुत कुछ हो सकता है (याकूब ५:१६) इन धर्मी जनों ने प्रर्थनाएं तो कीं पर इनकी प्रार्थनाएं सुनी नहीं गईं। आप ही अकेले ऐसी निराशाओं का सामना नहीं कर रहे हैं। बाईबल का ६० सदियों का इतिहास ऐसे निराश, हारे हुए लोगों से भरा है जो अपने को पूरी तरह से हारे हुए महसूस करते थे। पर प्रभु ने इन्हीं के द्वारा बड़े बड़े काम कर डाले। यही उसकी महानता है कि उसने ऐसे नालायकों, कमज़ोरों और अयोग्यों को बड़ी योग्यता से उप्योग कर डाला है। शायद बीते वर्ष में आपने पाप को गम्भीरता से न लिया हो और आप पाप में गिर गये हों। हाँ यह तो सत्य है कि पाप के कारण ताड़ना सह कर उसकी महंगी कीमत तो चुकनी पड़ती है। पर प्यारा प्रभु आपको ना छोड़ेगा ना त्यागेगा। इब्राहिम ने मिस्त्र मेंजाकर और सारा के कहने में आकर हाज़िरा के पास जाकर पाप किया। इस विश्वासियों के पिता ने यह बड़े अविश्वास का काम किया। मूसा पृथ्वी का सबसे नम्र व्यक्ति था। उसने घमंड से कहा, मैं कब तक तुम्हारे लिये पानी निकालता रहूँगा। दाऊद जिसके द्वारा भजन संहिता के ७३ अनुपम भजन लिखे गये हैं, इस प्रभु के जन ने व्यभिचार और हत्या का पाप करके प्रभु के दिल को कैसा दुखाया था। पतरस अपने प्रभु का तीन बार शर्मनाक ढंग से इन्कार कर गया। प्रभु ने इनमें से एक को भी न कभी छोड़ा और न त्यागा। आपका प्रभु आज भी अपके लिये वैसा ही है। भले ही आप क्यों न बदल गये हों, आने वाले सालों में वो वैसा ही बना रहेगा जैसा पहले था, और यह बात इस काबिल है कि ऐसे ही कबूल की जाए।


यह तो सत्य है कि पाप बहुत महंगा मेहमान है, पर आप पाप के लिये नहीं हैं और न संसार के लिये। आपको परमेश्वर ने एक विशेष उद्देश्य के लिये सृजा है। अगला साल भी इतना सहज तो नहीं होगा जितना आप सोचते हैं। शैतान एक हारे हुए युद्ध की लड़ाई लड़ रह है। युद्ध हारकर पीछे हटती हुई सेना, जितना नुकसान कर सकती है, करती हुई लौटती है। शैतान भी आपका नुक्सान कर सकता है पर आपको नाश नहीं कर सकता। आपको निराश कर सकता है पर आपका विनाश नहीं कर सकता।


एलिय्याह के दिन ऐसे ही दिन थे। ईज़ेबेल और अहाब जैसे दुराचारी लोगों के हाथ में राजनैतिक सत्ता थी। ये वे लोग थे जिन्होंने नाबोत जैसे ईमान्दार लोगों पर झूठे मुकद्दमे चलाकर उनकी हत्या करवा दी और उनकी ज़मीन हड़प कर ली (१ राजा २१:-१६)। उनके दिनों में बाल के पुजारी बड़े प्रबल थे। उन्हें पूरा रजनैतिक संरक्षण प्राप्त था। वे यहोवा की वेदियों को ढाते और सच्चे नबियों की हत्या करवा डालते थे (१ राजा १९:१०)। उन दिनों में झूठे नबियों की भी कोई कमी नहीं थी जो यहोवा के नाम से भविष्यवाणी करते थे। ऐसे हालात में ७००० ऐसे सच्चे लोग भी थे जिन्होंने बाल के आगे अर्थात ऐसे विपरीत हालातों के आगे घुटने नहीं टेके थे (१ राजा १९:१८)। एलिय्याह के द्वारा प्रजा का हृदय यहोवा की ओर फिरने लगा था। इन हालात में इजेबेल रानी को राजनैतिक सत्ता हाथ से छिन जाने का डर सताने लगा। उसे एलिय्याह का पत्ता साफ करना था पर वह यह भी जानती थी कि एलिय्याह की सीधी हत्या करवाना अपने विरुद्ध बगावत को आमंत्रण देना था। इजेबेल ने चालाकी से काम लिया और एलिय्याह के पास सिर्फ एक दूत भेजकर उसे कहा के अगले २४ घंटों में मैं तुझे मरवा दूंगी (१ राजा १९:)। अगर वह मरवाना ही चाहती थी तो केवल एक दूत ही क्यों भेजा, हत्यारों का दल भेज देती; और फिर अपने शिकार को चेतावनी क्यों देनी, सीधे वार करती? वह एलिय्याह को मारना नहीं उसे डराकर भगाना चहती थी, और एलिय्याह उसके झांसे में आकर डर कर वहाँ से भाग निकला। अकसर शैतान हमें भी ऐसे ही किसी झांसे में फंसा कर हमसे अपनी मर्ज़ी करवा डालता है।


पुराने नियम के अन्तिम दो पदों और में परमेश्वर कहता है - मैं तुम्हारे पास एलिय्याह को भेजूँगा... (मलाकी ४:) और मैं आकर पृथ्वी को सत्यनाश करूं (मलाकी ४:)पुराने नियम में एलिय्याह यर्दन नदी के पार से जीवित स्वर्ग पर उठा लिया गया (२ राजा २:-११) और यर्दन नदी के तट पर यूँ उसकी पुराने नियम की सेवकाई समाप्त हुई। नये नियम में फिर उसी यर्दन नदी के तट से यूहन्ना के रूप में एलिय्याह की सेवकाई फिर शुरू होती है। आप भी जहाँ पाप में गिर गये, जहाँ हालात से थक गये या जहाँ प्रार्थना, प्रचार या संगति में कमज़ोर पड़ गये हों, बस प्रभु की ओर हाथ फैलाइये और वही प्रभु आपको यह नया साल एक नई विजय के साथ पूरा कराएगा। शैतान यह जानता है कि जब तक प्रभु का ठहराया हुआ समय न आये, वह आपका बाल भी बाँका नहीं कर पायेगा। निराश और हताश एलिय्याह के पास प्रभु ने भोजन भेजा और उसे फिर से उठाकर तैयार किया; एलिय्याह के समान प्रभु आप से भी कहता है उठकर खा, क्योंकि तुझे बहुत भारी यात्रा करनी है (१ राजा १९:-)


बाइबल में कुछ बातों के लिये अवश्य शब्द का प्रयोग किया गया है। यह उन बातों के अनिवार्य या न टल सकने वाला होने को दिखाता है, जिनके संदर्भ में इस अवश्य का प्रयोग हुआ है, जैसे- . नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है (यूहन्ना ३:)। मुझे पिता के घर में रहना अवश्य है (लूका २:४९)। ३. अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ (यूहन्ना ३:३०) - प्रभु के घर में छोटा बनने से ही बड़ा बना जाता है; मेरा मैं घटना और प्रभु का हमारे जीवन में बढ़ना अनिवार्य है। छोटा बनकर माफी माँगने से कभी पीछे न हटें। ४. अवश्य है कि उसके भजन (आरधना) करने वाले आत्मा और सच्चाई से उसका भजन(आरधना) करें (यूहन्ना ४:२४)। ५. सुसमाचार सुनाना अवश्य है (१ कुरिन्थियों ९:१६)। इन सब बातों को मैं अवश्य नहीं कह रहा, बाइबल कह रही है, इसलिए आप भी इन बातों को अवश्य ही मान लें।


प्रभु में आपका


सम्पर्क परिवार

सोमवार, 2 नवंबर 2009

सम्पर्क फरवरी २००१: सुन तो लो... कल क्या होगा

गुजरात के २६ जनवरी २००१ में आये भयानक भूकम्प से ठीक ८१ दिन पहिले. सम्पर्क के पहिले अंक (सम्पर्क ५ अक्टूबर २०००) के पृष्ठ तीन में यह अंश छपा था “और कोई भी अगला भूकम्प का झटका हमारे शहर को पल भर में मलबे के ढेर में बदल सकता है और उस मलबे के ढेर में कुछ ज़िंदा लोग मुर्दा लाशों को ढूँढते फिरेंगे।”

वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले दस सालों में आये भूकम्पों की संख्याओं में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। परमेश्वर का वचन दो हज़ार साल पहिले ही हमें बताता है कि “यह सब बातें पीड़ाओं का आरम्भ होंगी।” “... और जगह जगह अकाल पड़ेंगे और भुईंडोल होंगे (मत्ती २४:७,८)।” आने वाली घटनाओं को देखकर लोगों के जी में जी न रहेगा। परमेश्वर के वचन के ११८९ अध्याय के लगभग ७,७४,७४७ शब्दों में से एक शब्द भी, हज़ारों साल के इतिहास में, कभी बिना पूरा हुए नहीं रहा और न रहेगा। परमेश्वर का वचन कहता है “पर यह जान रख कि अंतिम दिनों में कठिन समय आयेंगे (२ तिमुथियुस ३:१)।” अगले झटके में यह भी हो सकता है कि जिस छत के नीचे आप बैठे हों वही छत नीचे आ पड़े। अभी तो इस संसार को और भी अधिक भयानक पीड़ाओं, आपदाओं एवं बीमारियों का सामना करना है। ऐसी पीड़ा कि आदमी पीड़ा के मारे अपनी ज़ुबान खुद ही चबा जाए (प्रकाशितवाक्य १६:१०,११)। “यहोवा की पस्तक में से ढूँढ कर पढ़ो, इनमें से एक भी बात बिना पूरी हुए नहीं रहेगी (यशायह ३४:१६)।” ज़रा ध्यान दें, ‘परमेश्वर की पुस्तक’ बाईबल किसी धर्म विशेष की पुस्तक नहीं है। हमारे मनों में यह बात इस तरह बैठा दी गई है कि हम ‘यीशु मसीह’ को इसाई धर्म से अलग करके सोच ही नहीं सकते; जबकि यह सोच बिलकुल गलत और झूठ है। सम्पूर्ण बाईबल का एक एक पद छान डालिएगा, पहिले तो बाईबल में ‘इसाई’ या ‘इसाई धर्म’ जैसा कोई शब्द ही नहीं ढूँढ पाएंगे; फिर प्रभु की शिक्षाओं में धर्म परिवर्तन की कोई बात कहीं नहीं मिलेगी। प्रभु यीशु जगत के पापी, निराश और बेचैन लोगों को उद्धार देने और अपनी शाँति देने आया था, कोई धर्म देने नहीं। वह नहीं चाहता कि आने वाले प्रकोप की भयानकता की चपेट में कोई आ फंसे।

हमारे मनों में कुछ गलत धारणाऐं घर कर गई हैं। बात बहुत पुरानी है, जब मैं अविवाहित था। एक दिन मैं पापों क्षमा और सच्ची शाँति के बारे में कुछ पर्चे बाँट रहा था। एक जवान आकर कहने लगा कि यदि मैं इसाई धर्म अपना लूं तो मुझे क्या मिलेगा? मुझे तो खुद ही तीन पीढ़ी के बाद इसाई धर्म से छुटकारा मिला था, इसलिए अभी जवाब सोच ही रहा था कि उसने मुस्करा कर खुद ही बात फेंकी, “यार बस अमरीका-समरीका ही भिजवा देना।” मैंने कहा “यार मैं ही नहीं गया हूँ, तो तुम्हें कैसे भिजवाऊँगा?” उसने तुरन्त तीसरी बात ठोंकी, “अच्छा यार कम से कम मेरी शादी तो करवा ही दोगे?” मैंने कहा “इतने साल हो गये पर्चे बांटते बांटते, अभी मेरी ही शादि नहीं हुई तो तुम्हारी कहाँ से करवा दूँ? पर जो मुझे मिला है वह मैं तुम्हें बता सकता हूँ। मैं जीवन से निराश होकर मौत ढूँढता था पर पापों की क्षमा के बाद मुझे आनन्द से भरा हुआ जीवन मिल गया है।” यह इस बेचारे जवान की ही धारणा नहीं, अधिकांश व्यक्तियों में भी यह धारणा व्याप्त है।

ऐसा कौन सा धर्म है जिसे परमेश्वर ने सर्टिफिकेट दिया हो कि यह ‘परमेश्वर का धर्म’ है? आदमी जब पैदा होता है तब धर्म की कैद से आज़ाद होता है। धीरे धीरे धर्म का ज़हर दिमागों में भर कर आदमी को ज़हरीला बनाया जाता है। उसके मन में भरा जाता है कि ‘मेरा धर्म अच्छा है और दूसरे का बुरा।’ धर्म ने आदमी को आदमी से जोड़ा नहीं वरन आपस में तोड़ डाला है। सारी उम्र आदमी धारणाओं की एक कैद में जीता है, धर्म की ज़ंज़ीरों को गहने की तरह पहिनता है, और इन धारणाओं से जुड़े भले-बुरे के बोझ से दबी ज़िन्दगी को शमशान तक घसीटता है। धर्म हमारी एक ऐसी कैद है जहाँ हम आजीवन कारावास काटते हैं, जन्म से मृत्यु तक। धर्म के बाहर झांकना भी पाप समझा जाता है, पर जो वास्तव में पाप है, उसे पाप नहीं मानते।

एक भी ऐसा धर्म दिखा दीजीए या ढूँढ कर बताईये जिसमें जान लेने वालों या देने वालों, झूठ बोलने वालों आदि की कमी हो। सिर्फ नाम का ही तो फर्क है, व्यवहार तो सब के अनुयायियों में एक जैसा ही है। क्या यह सब चचेरे - मौसेरे भाई नहीं? धर्म पहिले तो हमें अन्धा बना देता है, और फिर हमें आईना दिखाता है। परमेश्वर पहिले हमारी आँखें खोलता है, तब हमें आईना दिखाता है, हमारी बेचैनी, निराशा, बोझ बनी ज़िन्दगी और इन सब की वजह हमारे जीवन का पाप हमें दिखाता है। रिशवत लेना और देना आज एक आम और खुली बात हो गयी है। झूठ और फरेब के सहारे अपना उल्लू सीधा करना अक्लमंदी मानी जाती है। अश्लीलता का खुला नाच हमारे परिवारों में घुस आया है। स्वयं माँ-बाप अपने बच्चों को अशलील नाच-गानों में भाग लेने और नुमाइश बनने को उत्साहित कर रहे हैं। टी०वी० ने बच्चों को बचपन में ही जवान बना दिया है। जिस किसी जीवन में पाप है, उस में पाप का श्राप और उससे उत्पन्न बेचैनी भी होगी। यही बेचैनी हर एक मनुष्य, मनुष्यों के परिवार और फिर इन परिवारों से बने हमारे समाज में भी दिखेगी, उन पर प्रभाव करेगी। इसीलिए हमारे परिवार और समाज इस बेचैनी को ढो रहे हैं।

एक आयकर विभाग में काम करने वाला व्यक्ति मुझे अपना नया घर दिखा रहा था। घर काफी बड़ा और महंगी चीज़ों से सुसज्जित था। वह व्यक्ति बार बार मुझ से कहता “बस यह सब ऊपर वाले की कृपा है” और मैं अपने मन में कह रहा था कि यह सब ऊपरी कमाई की कृपा है। बस चोरी करने का अवसर मिलना चाहिये - बिजली की चोरी या ऑफिस से कागज़ कलम की चोरी हो। रेल में बिन टिकट यात्रा कर लो। शादी से पहिले और शादी के बाद भी गलत सम्बंध रख लो, कितने गर्भपात करा लो। मुझे ताज्जुब होता है ऐसे बूढ़े लोगों को देखकर जिनके पैर कब्र में लटके हैं, मुँह में दाँत नहीं, पेट में आँत काम नहीं करती, आँखों पर मोटे चश्मे लगे हैं लेकिन अशलील पुस्तक-पत्रिकाओं, चित्रों और फिल्मों में पोपले मुँह खोलकर ऐसी ललचाई निगाहों से घूरते हैं कि यदि मौका मिले तो पता नहीं क्या कुछ कर डालें।

कितनों ने अपनी बुरी लतों से अपने परिवारों को नरक बना डाला है। कितने ही पति-पत्नी मजबूरी में साथ जुड़कर रहते दिखते हैं, पर उनके दिल कभी जुड़े नहीं। कुछ के पास बहुत धारदार बुद्धी और पैसे की भरमार है फिर भी अन्दर एक खालीपन और बेचैनी है। परेशान से एक मजबूरी की ज़िन्दगी जी रहे हैं और अपनी बेचैनी दुसरों के जीवन में भी घोल रहे हैं। ऐसी ज़िन्दगी को क्या खाक ज़िन्दगी कहेंगे? इन्सान ने इन्सानियत को कन्धा देकर शमशान तक पहुँचा दिया है। बस अब इस मरी हुई इन्सानियत का दाह संस्कार भर करना ही बाकी है। जो भी हम बो रहे हैं उन पापों का परिणाम भी हम ही काटेंगे। अचानक वह सब हो जाएगा जिसकी आप कल्पना भी नहीं करते हैं। अब इस संसार का अन्त उसके समीप खड़ा है। परमेश्वर आपके और हर एक के हर एक पाप का खुला हिसाब लेगा, चाहे वह कितने ही छिप कर या चालाकी से क्यों न किये गए हों। मौत के बाद की भयाकनता को शायद हम अपने शब्दों के सहारे आपको नहीं समझा पाएं, परमेश्वर का वचन कहता है “जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है (इब्रानियों १०:३१)” और उससे बचकर भागना असंभव है। लेकिन अपने न्याय से पहिले, परमेश्वर अपने प्रेम में, आपको पश्चाताप का अवसर और निमंत्रण दे रहा है।

मेरे प्रिय पाठक, कहीं आपके जीवन में कुछ ऐसे छिपे पाप तो नहीं जो आपको बेचैन करते हैं, कचोटते हैं? आप कैसे ही क्यों न हों, आपके काम कितने ही शर्मनाक क्यों न हों, परमेश्वर का प्रेम सब को क्षमा करने की क्षमता रखता है। प्रेम सब कुछ सह लेता है। प्रभु यीशु प्रेम है, उसने जगत से ऐसा प्रेम किया और उपाय किया कि जो कोई विश्वास करे वह नाश न हो(यूहन्ना ३:१६)। बस इतना ध्यान रखियेगा कि जब तक आप जगत में हैं तब तक उसके प्रेम की सीमाओं में हैं, जगत से बाहर निकलते ही आप उसके न्याय के अन्तर्गत आ जाते हैं जहां क्षमा नहीं, हिसाब लेना ही है।

आपका मन आपको धोखा दे सकता है और कह सकता है कि आपकी सच्चाई जानने के बाद आप जैसे व्यक्ति को कोई कैसे क्षमा कर सकता है, कैसे प्यार कर सकता है? वह तो आपके जीवन की हर बात और हर पाप को जानता है, केवल उसके सम्मुख उन्हें स्वीकार करने और क्षमा माँगने भर की बात है। या फिर आपको बहका सकता है कि यह तो छोटी सी बात है, सभी करते हैं, ऐसा किये बिना तो काम नहीं चल सकता, आदि। लेकिन जान रखिये पाप तो पाप ही है और उसका अन्जाम भी करने वाले को भुगतना ही है, फिर वह पाप छोटा हो या बड़ा, सब करते हों या कभी कोई करता हो। साथ ही यह भी जान रखिये कि कोई पाप या पापी परमेश्वर प्रभु यीशु की क्षमा और प्रेम से बड़ा नहीं है। परमेश्वर ऐसा प्यार क्यूँ करता है? क्यूँकि वह स्वभाव से ही प्रेम है। आपसे पूछा जाये कि माँ अपने बच्चों से ऐसा प्यार क्यूँ करती है? क्यूँकि यह माँ का स्वभाव है। यदि मैं आपसे कहूँ कि ‘ज़रा पानी को आग पर रखकर ठंडा कर लो’ तो यह बात निरर्थक होगी। क्यूँकि आग का स्वभाव है गर्म करना या जलाना और वह अपने स्वभाव के अनुसार ही कार्य करेगी, स्वभाव के विपरीत नहीं। इसी तरह प्रभु यीशु का स्वभाव है प्रेम करना, ऐसा प्रेम जो सबके सब पापों को क्षमा कर सकता है। वह नहीं चाहता कि आप इस जग पर आने वाली भयानक विपदाओं को भोगें और मौत के बाद हमेशा की भयानकता को।

प्रभु यीशु को धर्म के कट्टर अनुयायियों ने इतनी बुरी तरह ताड़ना दे देकर और अपमानित करके मारा कि उसकी स्वरूप आदमियों का सा नहीं दिखता था। कोड़ों से मार मार कर उसकी पीठ की खाल उधेड़ दी, थप्पड़ और घूँसे मारकर उसके चेहरा बिगाड़ दिया, सिर पर काँटों का ताज गूंथकर फंसा दिया। इस लहुलुहान और दयनीय दशा में भारी काठ का क्रुस उसकी पीठ पर लादकर उसे शहर से बाहर एक पहाड़ी पर ले गये, निर्वस्त्र किया, उसके हाथ और पाँव में कील ठोककर उस क्रूस पर लटका दिया फिर उसका ठठा करने लगे। अपने इन शत्रुओं को, इस भारी यातना में भी, प्रभु ने प्रेम से ही देखा और उनके नाश के लिये नहीं वरन उनके क्षमा के लिए प्रार्थना की “हे पिता इन्हें क्षमा कर, ये जानते नहीं कि ये क्या कर रहे हैं (लूका २३:३४)।”

लोग तो परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, यहाँ परमेश्वर आपसे प्रार्थना कर रहा है कि आप अपने पाप की क्षमा माँग लें। संसार अपनी क्षमा की सीमाओं को लाँघ रहा है। कल का इन्तज़ार न कीजियेगा, कल कहीं काल के गाल में न हो। बस ‘आज’ आपके हाथ में है। प्रभु की तरफ क्षमा के लिये हाथ फैलाइये। इस धरती के धरातल पर कोई ऐसा दुष्ट नहीं है जिसे वह क्षमा न कर सके। वह नहीं चाहता कि आप नाश हों, इसिलिये उसने क्रूस पर अपनी जान दी और तीसरे दिन जी भी उठा। वह जीवित परमेश्वर है। अब आपके फैसले का समय है। या तो आप उसके ऐसे बेमिसाल और समझ के बाहर प्यार को ठोकर मारकर कहिये कि यह सब बकवास है, या फिर उसकी क्षमा को आदर और प्यार से अपने दिल में स्वीकार कीजिये और उससे कहिये - ‘हे प्रभु यीशु मुझ पापी पर दया कर, मेरे पाप क्षमा कर।’

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

सम्पर्क फरवरी २००१: यात्रा की समाप्ति के समीप

(संपादक के संक्षिप्त शब्दों के साथ)

एक ऐसे जीवन के साथ थोड़ी देर गुज़ारिएगा जो अब मौत के बिल्कुल करीब खड़ा है। मालूम नहीं पर ऐसा हो सकता है कि जब तक “सम्पर्क” का यह अंक आप तक पहुँचे वह प्रभु के पास न पहुँच जाए। डॉक्टरों के अनुसार उसके जिस्म में जीने के लिए अब ज़्यादा कुछ बचा ही नहीं है। जनवरी में इस भाई का यह संदेश मुझे मिला कि वह मुझ से मिलना चाहता है। मैं उससे जाकर मिला। मिलते ही उसने मुझसे पूछा, भाई आपकी तबियत कैसी है? और कहा मैं आपके लिए प्रार्थना करता हूँ। उसके चेहरे पर कोई उदासी नहीं थी, वह खुश था, जबकि वह मौत के इतना करीब था, मौत का ज़रा सा भी डर उसमें नहीं था। मौत के सामने खड़ा होकर जैसे मौत का मज़ाक बना रहा हो। वह अपने प्रभु के पास जाने की तैयारी में था। जब हम उसे छोड़ कर जाने लगे तो उसने मुझसे कहा कि मेरे पास लोग आते हैं पर उन्हें देने के लिए मेरे पास सुसमाचार के पर्चे नहीं हैं। मैंने जाते हुए पिछले सम्पर्क के अंक की कुछ प्रतियां उसे दीं। उसमें इस संसार से जाते जाते भी अपने प्रभु के लिए कुछ कर डालने की साहसिक इच्छा थी। ऐसे जलते हुए जीवन के सामने खड़ा होना ज़रा भी सहज नहीं है।

(अनिल भाई ने यह गवाही खुद नहीं लिखी क्योंकि वह लिखने लायक हाल में नहीं था। वह जो बोलता गया, एक दूसरा भाई लिखता रहा।)

मेरा नाम अनिल कुमार है। मेरा जन्म उत्तरांचल के हरिपुर गाँव, ज़िला देहरादून में सन् १९६५ में हुआ। कई साल के बाद हम हिमाचल प्रदेश के किल्लौड़ गाँव में आकर बस गए। जब मैं बड़ा हुआ तो मेरे मन में यह इच्छा जन्मी के मैं परमेश्वर को कैसे पा सकता हूँ? इसलिए मैं हमेशा परमेश्वर की खोज में लगा रहा करता था। मैंने बहुत दूर दूर अनेकों तीर्थों की यात्राएं भी कर डालीं लेकिन मुझे सच्चे परमेश्वर की शांति नहीं मिल पाई। एक दिन मुझे एक जन ने प्रभु यीशु के बारे में पढ़ने के लिए एक पर्चा दिया। मैंने उसे पढ़ा पर विश्वास नहीं कर पाया कि प्रभु यीशु ही सच्चा परमेश्वर है और वही मुझे सच्ची शाँति दे सकता है। इसके बाद मैं अचानक बहुत बिमार हो गया और मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया। उस अस्पताल में भी प्रभु यीशु का सुसमाचार सुनाया जाता था। एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन से एक पद, “हे सब बोझ से दबे और थके लोगों मेरे पास आओ मैं तुम्हें विश्राम दूंगा-मत्ती ११:२८” पर सुसामाचार सुना। पहली बार मुझे एहसास हुआ जैसे कोई मुझसे बात कर रहा है और आशवासन दे रहा है कि मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मुझे निश्चय हो गय कि यह किसी मनुष्य की आवाज़ नहीं है, यह परमेश्वर ही मुझसे बोल रहा है।

इसके बाद मुझे यह अहसास हुआ कि मैं एक पापी मनुष्य हूँ और पाप के बोझ से दबा एक बेचैन व्यक्ति हूँ। मुझे पाप के बोझ से छुटकारे की ज़रूरत है। मैंने परमेश्वर के वचन की इस सच्चाई पर विश्वास किया कि प्रभु यीशु ने मेरे पापों का बोझ अपने उपर लेकर अपनी जान दी और मर कर तीसरे दिन जी उठा। अचानक मेरी बीमारी बढ़ने लगी और मुझे खून की काफी उल्टियाँ आने लगीं। लेकिन मैं प्रभु की दया के सहरे चँगा होकर घर आ गया। घर आने के बाद मैं प्रभु यीशु को और जो काम उसने मेरे जीवन में किया था, फिर सब भूल गया।

यूं सालों बीत गये, तब एक दिन हमारे गाँव में कुछ विश्वासी भाई प्रभु यीशु का संदेश लेकर आये। उन भाईयों ने मुझे फिर प्रभु यीशु के प्रेम के बारे में बताया। इससे मेरे विश्वास में एक नयी जान जागी और मैं प्रभु में बढ़ने लगा। उन्होंने मुझे निमंत्रण दिया कि भाई आप हमारे यहाँ संगति में आया करो। फिर मैं लगातार प्रभु के लोगों की संगति में जाने लगा। जब मैं प्रभु के लोगों में आया तो तब प्रभु ने मुझे अपने वचन से यह निश्चय दिया कि उसने मेरे पापों को माफ कर दिया और मेरे अन्दर पाप की बिमारी को चंगा कर दिया है। प्रभु ने मुझे अद्भुत शांति और अद्भुत आनंद से भर दिया।

आज भी मैं शारीरिक तौर से बहुत बीमार हूँ और बीमारी के बिस्तर पर हूँ लेकिन तौ भी मेरे पास प्रभु की अद्भुत शांति और आनन्द है। मैंने परमेश्वर के वचन में अय्युब नाम के एक व्यक्ति के बारे में पढ़ा है कि वह कैसी कैसी मुशकिलों और दुखों से होकर गुज़रा लेकिन तब भी उसने न केवल विश्वास को थामे रखा, वरन उसने परमेश्वर को धन्यवाद ही दिया। इससे मेरे विश्वास को और बढ़ोत्री मिली कि चाहे दुख हो या खुशी, हमें प्रभु को नहीं भूलना चाहिए, बल्कि धन्यावाद ही देना चाहिए कि प्रभु परमेश्वर जो भी तूने किया उसके लिए तेरा धन्यवाद हो। परमेश्वर के वचन में मैंने पढ़ा कि सब बातें मिलकर, उनके लिए जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, भला ही उत्पन्न करती हैं - रोमियों ८:२८। अब मेरे पास एक जीवित आशा है कि चाहे मैं मरुं या जीऊँ, प्रभु मुझे नहीं छोड़ेगा। अगर मैं मर गया तो एक दिन प्रभु के साथ स्वर्ग में होऊंगा। इस संसार से जाने से पहले मैं आप से कहना चाहता हूँ, प्रियों क्या आपके पास ऐसा अद्भुत आनन्द और सच्ची शांति है? यदि नहीं तो आज ही प्रभु यीशु की तरफ अपने हाथ फैला कर उससे माँगें और वह आपको देगा।