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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

सम्पर्क दिसम्बर २००९: जीना ज़रूरी नहीं, मजबूरी है

दार्शनिक नीत्शे कहता था "परमेश्वर मर चुका है।" नीत्शे के पिता, भाई और परिवारजन धर्मगुरू थे। वह उन्हीं के साथ पला बढ़ा था। वह कहता था, "इन धर्मगुरूओं के साथ रहकर तो देखो, धर्म पर से तुम्हारा विश्वास ही हट जायेगा। हमने उस हत्यारे परमेश्वर की हत्या कर दी है जिसके नाम पर इतनी हत्याएं कर दी जाती हैं।"

सच तो यह है कि जिसके लिये परमेश्वर मर गया, वही आदमी आज जीते हुए भी मरे जैसा है। जिस आदमी के दिल में परमेश्वर का डर न हो, उस आदमी पर एक पागलपन सवार हो जाता है। नास्तिकता भी ऐसा ही पागलपन पैदा करती है। ज्ञान के घमंड ने नास्तिक नीत्शे को पागल कर दिया और वह पागलपन में ही मरा।

जो आदमी नास्तिकता में जीता है, वह एक दुविधा में जीता है। उसे बहुत सारे सवाल सताते हैं - कैसे हुआ? पृथ्वी कैसे बनी? इससे आगे क्या होगा? वह एक बेचैनी में जीता है और यही सिद्ध करने में लगा रहता है कि परमेश्वर है ही नहीं। नास्तिक की आस्था बे सिर-पैर के सवालों पर खड़ी रहती है। वे कहते हैं कि जैसे परमेश्वर किसी के बिना बनाये बना है तो क्या पृथ्वी भी बिना किसी के बनाये नहीं बन सकती? वे भूल जाते हैं कि परमेश्वर और पृथ्वी की एक-दूसरे से तुलना करना मूर्खतापूर्ण है क्योंकि परमेश्वर बना नहीं था, वह है! पृथ्वी नश्‍वर है, और रोज़ उसकी चीज़ें जन्म भी लेती हैं और मरती भी हैं।

कुछ लोग यह तो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, लेकिन उनकी मानसिकता परमेश्वर से नहीं धर्म से बंधी होती है। ज़्यादतर हमारा समाज ऐसे ही धर्म को मानने वाला समाज है। वह धर्म के लिये सब कुछ कर सकता है। वह अपने धर्म के लिये दूसरे धर्म के मानने वालों की हत्या कर सकता है, उनके घर उजाड़ सकता है, उनके बच्चों को ज़िन्दा जला सकता है। ऐसे-ऐसे काम धर्म ही करवा सकता है, परमेश्वर नहीं। जो परमेश्वर से प्यार करते हैं वे इन्सान और इन्सानियत से भी प्यार करते हैं। जो धर्म से प्यार करते हैं उनके लिये इन्सान और इन्सानियत का कोई महत्व नहीं है।

हमारे समाज की हालत भी देखिएगा; आदमी साँप से भी ज़्यादा डरावना हो गया है। सुनसान जगह पर साँप का नहीं आदमी का डर ज़्यादा सताता है। आज लोग ज़हीरेले जानवरों से बचने के उतने प्रयास नहीं करते जितने वे दूसरे आदमियों से बचने के करते हैं। साँप तो कभी-कभार एक आदमी को काटकर मारता है, पर आदमी का ज़हर तो रोज़ ही आदमी को मार रहा है।


हमारे अधर्म एक से हैं

हमारे धर्म अलग-अलग हैं पर हमारे अधर्म एक से ही हैं। चाहे धर्म कोई भी हो, हमारे कर्म भी एक से हैं और एक सी ही हमारे जीवन और परिवार की हालत है। एक छत के नीचे एक बिखरा हुआ परिवार मिलता है। बाप, पिता होने की अकड़ में जीता है, तो पत्नि पति पर एहसान जताती रहती है-क्या किया, क्या दिया बस यही ताने सुनते रहो, अगर बोले तो बवाल मच जाएगा। कल जो जन-ए-मन थी आज जान-ए-बवाल है। बच्चे अपने में मस्त हैं। रिश्तेदारों में खींचतान है। मिलते तो रहते हैं पर उनके दिल मिले नहीं होते। अपने लहु का सगा भी कब धोखा दे जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता। आखिर विश्वास करें तो किस पर करें और किस पर नहीं? आमने-सामने मूँह मुस्कुराता है पर मन कोसता है। हम जानते भी नहीं कि हर मुस्कुराहाट के पीछे कितने झूठ छिपे हैं।

बात तो मज़ाक की है पर हमारे घरों के हालात समझने में सहायता करेगी। एक पति-पत्नि में लड़ाई हुई, पति ने गुस्से में बाज़ार से ज़हर लिया और खाकर लेट गया। मरा तो नहीं पर बीमार ज़रूर पड़ गया। पत्नि, पति से चिल्लाकर बोली, "मैं हमेशा यही बात तो कहती हूँ कि सामान देख-भाल कर खरीदा करो। अब देखो पैसे भी गये और काम भी नहीं हुआ।"

शायद आपके घर में ऐसा न हुआ हो, पर बहुत से परिवारों में पति-पत्नि के संबन्धों में खटास आ चुकी है। उनमें मतभेद नहीं पर मनभेद हो चुके हैं। बहुत से साथ जीते तो हैं पर मन में उनका तलाक हो चुका है। साथ जीना उनके लिये एक मजबूरी बन गया है। अक्सर जब पति-पत्नि के संबन्ध टूटते हैं तो लोग कहते हैं कि "वे एक दूसरे को समझ नहीं पाए।" पर वास्तविक रूप में एक दूसरे की असलियत तो शादी के बाद ही समझ में आनी शुरू होती है, चाहे शादी से पहले भी एक दुसरे को जानते हों।


दर्द और दरवाज़े

भले ही हम दूसरे के दर्द समझ न पाएं, पर दर्द तो हर दरवाज़े की कहानी है। जैसे, किसी बेचारे गंजे की परेशानी को आप सही तौर से समझ नहीं पायेंगे। पहला तो यह कि वह मूँह कहाँ तक धोये? दूसरा यह कि नाई के पास जाते हुए बड़ी शर्म आती है कि वहाँ बैठे लोग क्या कहेंगे? खैर कहते तो कुछ नहीं पर उनका कनखियों से देखना और फिर हल्का सा मुस्कुराना बहुत तीखा चुभता है। नाई भी बेचारा परेशान कि कहाँ से काटूँ और कहाँ से छोड़ूँ? पैसे लेते वक्त भी उसे परेशानी होती है कि पैसे बाल काटने के लूँ या ढूंढने के? हम दूसरों की परेशानी को सही तरह समझ नहीं पाते; पर इतना ज़रूर है कि मैं और आप कहीं न कहीं परेशानियों से निकल रहे हैं।

एक विदेशी पर्यटक को देख कुछ भिखारी हाथ फैला कर उससे भीख माँगने लगे। उस विदेशी पर्यटक ने पहले अपना कैमरा तैयार किया, फिर एक अजीब बात की, पैसे निकाल कर उनके हाथों में देने की जगह, ज़मीन पर बिखेर दिये। सारे भिखारी तेज़ी से ज़मीन पर गिरे सिक्कों को उठाने लगे और उनमें सिक्के उठाने की होड़ लग गई। पर्यटक भी उनकी इन हरकतों को अपने कैमरे में फुर्ती से कैद करने लगा। एक आदमी जो यह देख रहा था, उसे बड़ा बुरा लगा। उस विदेशी के जाने के बाद उसने उन लोगों से कहा, "वह अपने देश में लेजा कर इन तस्वीरों को पत्रिकाओं में छापेगा। तब हमारे देश के लिये कितनी शर्मनाक बात होगी और उन लोगों के दिमाग़ में हमारी क्या तस्वीर बनेगी? क्या तुमने कभी यह सोचा?" एक भिखारी ने जवाब दिया, "साहब, हम तो यह जानते हैं, पर भूखा पेट नहीं जानता; और आप सिर्फ बडी-बड़ी बातें मत कीजिये, कुछ करना ही है तो हमारी इस हालत को सुधारने के लिये कुछ कीजिये।" समस्याओं पर उपदेश तो हमारे पास बहुत हैं, पर समस्या का समाधान नहीं है।


जब ज़िन्दगी बोझ लगने लगती है

"टैन्शन" एक ऐसा शब्द है जिसे आप जीवन के हर पहलू में देख सकते हैं: शादी हो गई तो टैन्शन, नहीं हुई तो टैन्शन। बच्चे नहीं हुये तो टैन्शन, हो गये तो टैन्शन। नौकरी नहीं है तो टैन्शन, मिल गयी तो टैन्शन। आदमी पतला है तो टैन्शन, मोटा है तो टैन्शन। कितनी ही बीमारियाँ हममें टैन्शन बनाये रखती हैं। परेशानियों से सारी उम्मीदें टूटने लगती हैं, आदमी का मन हारने लगता है और कितने डर उसे सताते हैं - क्या होगा? कैसे होगा? आदमी को ज़िन्दगी बोझ लगने लगती है।

कितनी ही अच्छी शिक्षा, अच्छी नौकरी, अच्छा घर और अच्छा सामान हो, किंतु उसमें प्यार, खुशी और चैन न हो तो सब व्यर्थ है। दुनिया की सब चीज़ें पाकर भी अगर परेशान हैं तो सब पाने का क्या अर्थ है? परेशानियाँ होने का कारण धन-दौलत या दुन्याबी चीज़ों की कमी नहीं है; परेशानियाँ हैं क्योकि हममें अहंकार है, बदले लेने की भावना भरी है, दूसरों को नीचा दिखाना चाहते हैं। कितने ही गलत संबंध पाल रखे हैं, बुरी लतों से लदे हैं, खुद का और परिवार का जीना हराम कर रखा है। और फिर रौब ऐसा रखते हैं कि पता नहीं क्या हैं और क्या कर देंगें?

पाषाण युग से कम्पयूटर युग तक आदमी ने बहुत कुछ बदल डाला, पर आदमी अपने स्वभाव को नहीं बदल पाया। हममें से अधिकाँश लोग चाहते हैं कि हमारे राजनेताओं का चरित्र बदले, पुलिस व्यवस्था बदले, सरकारी कामकाज का तरीका बदले, अधिकारियों का व्यवहार बदले। हम दिल से बदलाव चाहते हैं। पर कितने हैं जो चाहते हैं कि स्वयं हम बदलें, हमारा स्वभाव बदले, हमारा चरित्र बदले, हमारा परिवार बदले; और ऐसे बदलाव के किये प्रयत्न करते हैं? अब तो संसार की यह स्थिती है कि न हम और न हमारा संसार संभल सकता है। कल परेशनी में था, आज की परेशानियों भी कम नहीं हैं और आने वाला कल और भी भयानक परेशानियां लिये तैयार खड़ा है।

अगर कहीं चुपके से मौत हमें हमारे पापों के साथ ही ले गई, तो वो हमें हमेशा की परेशानी में पहुँचा देगी। आप माने या न माने, ’पाप’ ही हर परेशानी की जड़ है। पाप तो हम सबने किया है, उसके प्रकार या घिनौनापन अलग अलग हो सकता है। पहले दर्जे का पापी हो या दूसरे दर्जे का, मन्ज़िल सबकी एक ही है। मेरे प्यारे पाठक, केवल प्रभु यीशु ही आपको आपके पाप से छुटकारा दे सकता है, वह इस संसार में आया ही इसी लिये था। जब हम यीशु को इसाई धर्म से जोड़ते हैं तो एक तरह से यह उसे अपमानित करना है, क्योंकि वह किसी धर्म या जाति के लिये नहीं सारे संसार के लिये आया। वह सबका है और सबको प्यार करता है। उसने सारे जगत से ऐसा प्यार किया कि अपने आप को सबके पापों के लिये क्रूस पर बलिदान कर दिया, ताकि मैं और आप अनन्त आनन्द और अद्‍भुत शांति पाएं।

आपकी एक प्रार्थना सब बदल डालेगी। आपको धर्म बदलने की कतई ज़रूरत नहीं है। एक प्रार्थना "हे यीशु मुझ पापी पर दया करके मेरे पापों को क्षमा करें।" सिर्फ १२ शब्दों कि यह क्षमा प्रार्थना, पापों की सारी सज़ा से हमेशा-हमेशा कि लिये छुटकारा दे डालेगी।


जो भी सीने में छिपा है

मुझे वो सब लिखना पड़ता है जो आप अपने सीने में छुपाये हैं। शायद शर्मनाक काम जो कभी अन्धेरों में किये और अब सीने में छुपाये हैं। मेरे और आपके ये काम, ये पाप कब तक और कहाँ तक छिपेंगे? एक न एक दिन तो खुलेंगे ही, यहाँ नहीं तो वहाँ, अब नहीं तो तब; क्योंकि पाप ने हमें हमारी मज़्दूरी तो देनी ही है। हमारे पाप हमें खींच ले जायेंगे उस अनन्त परेशानी में जहाँ से फिर निकल पाना संभव नहीं है।

प्रभु की आवाज़ एक ऐसी आवाज़ है जो बड़े प्यार से सीधे दिल पर वार करती है। कितना भी छिपना चाहें, यह आवाज़ आपके अन्दर के चेहरे को आपके सामने ला खड़ा कर देगी। सीने में छिपे कितने ही काले कारनामों को ऐसे उजागर करती है कि सब कुछ साफ-साफ सामने आ जाता है, अपनी हकीकत अपनी नज़रों के सामने देखकर आदमी सहम सा जाता है। लेकिन वही प्रभु सब बदल भी देता है, अगर उससे कहें तो। सब बदल जायेगा, आप एक कदम तो उठाइये। द्वार तो खोलिये, प्रकाश तो द्वार पर तैयार खड़ा है जीवन के अन्धकार को दूर करने के लिये, देरी और दूरी तो आपकी तरफ से ही है।

यह समय इतने बुरे समय में बदलने जा रहा है कि पश्चाताप करना भी चाहेंगे तो नहीं कर पायेंगे। इसलिये अब जाग उठने का समय आ गया है। प्रकाश को पाना ही अन्धकार को खोना है। सत्य को पाना ही असत्य को खोना है।
अब मैंने यह शब्द इस काग़ज़ के हवाले कर दिये हैं, ताकि परमेश्वर के दिल की आवाज़ आपके दिल तक पहुँच जाये। वह नहीं चाहता कि आप नाश हों। पर एक प्रार्थना सब कुछ बदलने की सामर्थ रखती है - "हे यीशु मुझ पापी पर दया कर।"

मैं आपको चेता सकता हूँ, पर फैसला तो आपको ही करना है। आप एक प्रार्थना करके अभी प्रभु की शक्ति और उसकी आशीश को परख सकते हैं, "हे यीशु मुझ पापी पर दया करके मेरी प्रार्थना की लाज रखें।"

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

सम्पर्क दिसम्बर २००९: अपने में झाँकता आदमी

एक लड़का, ४ या ५ साल का रहा होगा, अपने एक पड़ौसी के लड़के को पीट रहा था। उसके बाप ने देखा तो डाँटते हुए उसे घर में बुलाया और पूछा "क्यों मार रहा था उसे?" लड़के ने जवाब दिया "वो माँ की गाली दे रहा था।" बाप बोला "दो और मारता" और अपने काम में व्यस्त हो गया। थोड़ी देर में एक अधेड़ औरत गुस्से में चीखती हुई आई "तुम्हारे लड़के ने मोहल्ले में जीना मुश्किल कर दिया है, इसकी हिम्मत तो देखो, यह दोबारा हमारे घर घुस कर मेरे लड़के को दो चाँटे मारकार यहाँ दौड़ा आया है।" बाप ने गुस्से में लड़के से पूछा "अबे तू फिर क्यों मारकार आया?" लड़के ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया "आपने ही तो अभी कहा था कि उसे दो और मारता।" अब बाप की हालत देखते ही बनती थी।

वह लड़का मैं था और ऐसे माहौल में पला बड़ा हुआ था जहाँ पर बहुत घमंड करना, मारना-पीटना और गाली देना एक आम बात थी। हमारे घर में मौत का भयानक साया था। मेरे ५ भाई बहन और थे जिनमें से कोई भी नहीं बचा था, जवानी में मैंने कदम रखा ही था कि मेरे पिताजी भी चल बसे।

मुझे खुद भी मालूम नहीं था कि मैं क्यों जी रहा था? किसके लिये जी रहा था? अपनों से मैंने बहुत परायापन पाया था इसलिये मुझे अपने भी अपने नहीं लगते थे। कोई अपना नहीं था और जो एक दो थे वो भी मुझे अपने से नहीं लगते थे। रिशते तो सिर्फ नाम के थे, उन रिश्तों में कोई पहचान नहीं थी और उनमें बड़ा खारापन था। मुझे खुद अपने आप से नफरत होती थी और इसलिये मैं बार-बार मरने की कोशिश करता था। ज़िन्दगी का सफर मुझे ज़्यादा भाता नहीं था। कल की आस में आज के पन्नों को पलटकर और बेबसी की चादर ऒढ़कर कुछ नये सपनों के साथ सो जाता था।

मेरे थके हारे जीवन को,
अब एक नया जीवन चाहिये था
एक नयी ताज़गी चाहिये थी,
एक नयी खुशी चाहिये थी।
धर्म के लेबल लगे इस इन्सान को,
छुटकारा चाहिये था,
हालातों से, लतों से और,
अपनी आदतों से हारे हुए,
इस इन्सान क्मो अब आज़ादी चाहिये थी,
अपने पुराने पन से उक्ताए हुए,
इस इन्सान को अब कुछ नया चाहिये था।

अच्छा बनने की इच्छा तो थी पर बात बन नहीं पाती थी (रोमियों ७:१८)। मैं अपने बारे में यही सोचता था कि मैं सही हूँ और पाप और श्राप को मैं कुछ नहीं समझता था। पर कहीं, किसी की कही एक बात से, बात बन गई - ’पाप’, हाँ तेरे पाप ही सारी बेचैनी का श्राप हैं। पाप का यह श्राप पाप की क्षमा से साफ हो जायेगा, जो क्षमा सिर्फ यीशु ही दे पायेगा। बस इस एक प्रार्थना से बात बन गयी - "हे यीशु, मुझ पापी पर दया कर।" मेरा धर्म तो नहीं बदला, पर सच मानो ज़िन्दगी बदल गयी। वह खुशी मिला जैसी कभी सोची भी नहीं थी।

यूँ तो मेरा बीता कल मेरे काले कारनामों से भरा है। अब भी जब कभी मुझ से पाप हो जाता है तो मैं खुद की नज़रों में बहुत छोटा हो जाता हूँ और मुझे अपने आप से नफरत होने लगती है। जाने क्यों मैं पाप कर जाता हूँ। जानता हूँ कि नहीं करना है, पर पता नहीं फिर भी क्यों कर जाता हूँ। चाहता हूँ नहीं करना, पर यह मेरी बेबसी है। मेरा मन मुझे संभलने नहीं देता। सच तो यह है कि बहुत बार मैंने प्रभु से वायदे किये, पर फिर वही कर बैठता हूँ जो नहीं करना चाहिये। पर आज भी यीशु का लहू मुझे सब पापों से शुद्ध करता है।

आज मेरी देह की हालत खस्ता है और मेरा जिस्म अब खुद मेरी उम्र बयान करता है। अब मेरी सारी डिग्रियाँ अर्थहीन हो गईं हैं और मुझे याद भी नहीं रहता कि मैंने क्या क्या पढ़ा और क्या क्या पाया। बस याद रहता है कि अब यहाँ से चलना है। अब इसी इंतिज़ार में जीता हूँ, की जाने कब दिल का रिश्ता धड़क्न से टूटेगा, जाने कब सब का सब यहीं छूटेगा और मेरे दोस्त एक सफेद चादर में लपेट कर मुझे यहाँ से विदाई दे आएंगे। मुझे मालूम है कि धीरे धीरे मुझे मेरे अपने भी भूल जाएंगे। ऐसे ही यादों में मैं भी कहीं रह जाऊंगा।
एक भीड़ साथ चली थी। आज चलते चलते देखता हूँ कितने ही जो साथ चले थे वे अब नहीं रहे। कुछ थे जो राह से भटक गये, कुछ बदल गये, पर मेरा परमेश्वर नहीं बदला, न ही उसने मुझे कभी छोड़ा। कुछ हैं जो मेरे लिये हाथ उठाकर अपनी प्रार्थनाओं में मुझे फिर से उठा लेते हैं; सिर्फ उन्हीं की संगति में आकर मैं सम्भल जाता हूँ।

ये मसीह के मासूम लहू से लिखा,
फरमान मेरे लिये था,
देख! मैं सब कुछ नया कर देता हूँ।

जिस आसमान से आग बरसे
अब मुहे वो आसमान नहीं चाहिये,
एक नया आकाश और पृथ्वी चाहिये,
जहाँ प्यार बरसे और जहाँ प्यार बरसे।

मेरे धर्म ने मुझे परमेश्वर से मिलने नहीं दिया,
मुझे ऐसा धर्म नहीं चाहिये,
नहीं चाहियें वे धर्म के लोग,
जो हैवानों की तरह इन्सानों को काटते-कटवाते हैं।

मेरे धर्म ने मेरे लिये कभी खून नहीं बहाया,
हर धर्म ने दूसरों का ही खून बहाया है,
मुझे एक ऐसा परमेश्वर चाहिये,
जिसने मेरे लिये अपना खून बहाया।

इंसान एक मज़ार है,
जिसमें मरी हुई इन्सानियत दफन है,
मरी हुई इन्सानियत को ढोता इन्सान,
अपने कर्म से हैवानियत को भी मात दे गया,
मुझे ऐसा इन्सान नहीं चहिये,
अब मुझे एक नया इन्सान चाहिये।

हर जगह आदमी ही आदमी हैं,
फिर भी आदमी अकेला है,
मन में उसके सन्नाटा चीखता है,
परेशानियाँ खाती हैं और डर सताता है,
इसलिये अब एक नया मन चाहिये।


हर दिन अपने स्वभाव से लड़ना पड़ता है। सालों से इस हार जीत के खेल में हार ज़्यादा और जीत कम हैं। पर एक आशा आज भी सीने में ज़िन्दा है: मेरा प्रभु मुझे ना ही छोड़ेगा और ना ही त्यागेगा। उम्र और वक्त के साथ काफी परेशानियाँ बदलती और बढ़ती रहती हैं। अनेकों चिंताएं भी साथ पलती और पनपती हैं। उम्मीदें लहराती हैं, सोचते हैं अच्छा ही होगा। पर सब कुछ हमारे सोचने जैसा नहीं होता। पर प्रभु का वचन आश्वस्त करता है: "सब बातें मिलकर भलाई ही पैदा करती हैं।" हार में भी भलाई छिपी रहती है। मेरी हार मुझे हमेशा याद दिलाती है कि तू अपनी सामर्थ से एक दिन भी सही से नहीं निकाल सकता। इसलिये प्रभु के सामने हाथ फैलाए रहता हूँ। "जब मैं निर्बल होता हूँ तभी बलवन्त होता हूँ।" प्रभु के वचन से मिल यही एक विश्वास आज भी मेरे जीवन में जीवित है।

मुझे परमेश्वर से कोई गिला शिकवा नहीं, जो भी है वो अपने आप से है। अगर मैं परेशान हूँ तो सिर्फ अपने आप से और अपने स्वभाव से। इसलिये मुझे इन्सान ही समझिएगा, इससे कुछ ज़्यादा समझाने से नुक्सान ही होगा। जो मुझे इससे ज़्यादा समझेगा वह धोखा ही खायेगा। मैं जो करना चाहता हूँ वह आज तक कर नहीं पाया। जैसा जीवन मैं जीना चाहता था वैसा जी नहीं पाया। मुझे परमेश्वर ने बहुत कुछ दिया - आदर दिया, प्यार दिया और आशीषें दीं पर मैं ने उसमें से बहुत ज़्यादा व्यर्थ गवाँ दीं। मुझे अपने ऊपर शर्म आती है और अफसोस सताता है कि हाय! मैं ने ऐसा क्यों किया। मेरे पास अब बस यही दुआ बची है कि प्रभु! मेरे पास जो जीवन बचा है उसे मैं व्यर्थ न गवाँ दूँ।

सारी उम्र पाने की आदत मन में पालता रहा पर अब जाते जाते कुछ देकर जाना चाहता हूँ। चाहता हूँ कि कुछ ऐसा तो देकर जाऊं जो लोगों के दिलों और ज़िन्दगियों में खुशी भर जाये।


मैं अपनी औकात जनता हूँ, जानता हूँ कि आज बिना प्रभु के मेरी कोई कीमत है ही नहीं। बस एक प्रार्थना बची है।

गिरने की गहराइयों को,
नापा है मैंने,
गिरने से डरता हूँ,
इसलिये निवेदन यह करता हूँ,
तब तक थामे रहना,
जब छूटेगा प्राणों से यह तन,
तक लागा रहे,
तुमसे मेरा यह मन।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

सम्पर्क दिसम्बर २००९: सम्पादकीय

"हर बात का एक अवसर और प्रत्येक काम का जो आकाश के नीचे होता है, एक समय है। जन्म का समय और मरने का भी समय; बोने का समय और बोये हुए को उखाड़ने का भी समय है" (सभोपदेशक ३:१,२)।

हर दिन को २४ घंटे जीने के लिये दिये गये हैं और हर साल को १२ महीने। अब इस साल ने अपना समय पूरा कर लिया है और फिर इस साल को हर साल की तरह हमेशा-हमेशा के लिये इतिहास के कब्रिस्तान में दफना दिया जायेगा। ऐसे ही स्वयं इस पृथ्वी का भी एक निश्चित समय है। जैसे ही समय पूरा होगा, पृथ्वी भी नहीं रहेगी। जब यीशु इस पृथ्वी पर था, तो उसे भी एक निश्चित समय दिया गया था। आपके जन्म का भी एक निश्चित समय था और मृत्यु का भी एक निश्चित समय है। मैं और आप भी समय की सीमा में बंधे हैं। अब सवाल यह है कि हम इस समय का कैसे उपयोग करते हैं? क्योंकि समय बहुमूल्य है और कोई इतना अमीर नहीं जो इसे वापस खरीद सके।

कितने ही अपनों को एक सफेद चादर में लपेटकर अंतिम विदाई दे चुके हैं। अभी और हैं जो लाईन में लगे हैं जिनका समय इस साल में पूरा होने वाला है। आते समय में, जैसे होता आया है, संसार भी सुधरेगा नहीं. बदलेगा नहीं पर बिगड़ेगा ज़रूर, चाहे कितना ही नये साल की शुभकामनाएं लेते और देते रहियेगा। सच मानियेगा, अगर हम नहीं बदले तो हमारे हालात भी नहीं बदलेंगे।

ज़्यादतर लोग परमेश्वर को एक बदला लेने वाले परमेश्वर के रूप में मानते हैं जो दुष्टों का नाश करे। पर परमेश्वर तो दया दिखाने वाला परमेश्वर है। अगर परमेश्वर मेरे पापों का हिसाब लेता तो मैं आज यह सब लिखने के लिये यहाँ बचा न होता। बदले का भाव हमें गुस्से से भरता है। जब गुस्सा बढ़ता है तो दिमाग़ पटरी से उतर जाता है और फिर आदमी तर्क और विवेक को उतार कर एक तरफ रख देता है, तथा उसकी असली सूरत सामने आकर खड़ी हो जाती है।

एक सिपाही गली से गुज़र रहा था कि एक नये बनते मकान से एक ईंट उसके ऊपर गिरी। बस यूँ समझिये कि वह बाल-बाल ही बचा। गुस्से में तमतमाया वह लपककर मकान में घुसा, यह ठानकर कि जिसने ईंट गिराई है, उसी के सिर पर दे मारूंगा। तेज़ी से वह सीढ़ी से ऊपर पहुंचा ही था कि तभी चारपाई पर लेटे दारोग़ा ने आवाज़ दी, "अबे यह कौन ऊत का पूत है जो बिना पूछे ही ऊपर चढ़ा आ रहा है?" दारोग़ा को देखते ही सिपाही का सारा गुस्सा हवा हो गया, चेहरे पर दीनता आ गई और घबरा कर बोला, "सर कुछ नहीं, आपकी यह ईंट नीचे गिर गई थी, ऊपर देने आया हूँ।" ऐसे ही हम भी मन से तो दीन नहीं होते, पर जो दीनता दिखाते हैं वह एक मजबूरी होती है।

हमारे स्वभाव में बदले का भाव भरा होता है। बात बात पर मन कहता है कि "एक बार तो उसे सिखा ही दे।" पर भय के कारण क्रोध कमज़ोर पड़ जाता है। हमें ग़लत करने से अगर कोई चीज़ रोकती है तो वह परमेश्वर का डर नहीं बल्कि पुलिस, कानून, सज़ा और समाज का डर है।

ज़रा मेरे साथ लूका ९:५४-५६ देखियेगा। इस वार्तालाप को मैं अपने शब्दों में कह रहा हूँ: चेलों ने कहा, "प्रभु अगर आप कहें तो आग बरसा कर इन सामरियों को सिखा दें?" लेकिन प्रभु कहता है, "तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो। क्या परमेश्वर का आत्मा किसी का भी नाश करना चाहता है? किसी से भी बदला लेना चाहता है?" शायद हम एक बदला लेने वाले परमेश्वर को मानते हैं, न कि दया दिखाने वाले और क्षमा देने वाले परमेश्वर को। किसी को माफ करना आसान नहीं है। सिर्फ शब्दों की माफी तो काफी नहीं है। माफी तब तक माफी नहीं जब तक दिल से माफ न करें।

क्या आपके मन में किसी के प्रति विरोध भरा है, और आपका मन चाहता है कि ऐसे इन्सान को प्रभु सिखा दे? लेकिन ध्यान कीजिये प्रभु क्या कहता है, उनके लिये जो क्षमा के लायक भी नहीं थे - "हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि यह नहीं जानते कि यह क्या कर रहे हैं" (लूका २३:३४)। प्रभु ने यह उन शत्रुओं के लिये कहा जो उससे माफी माँग भी नहीं रहे थे, तौभी वह क्रूस पर से उनके लिये परमेश्वर से दया माँग रहा था। यह परमेश्वर के आत्मा का काम है।

इब्रानियों १२:२४ में वह कहता है, "...जो हाबिल के लहू से उत्तम बातें कहता है।" हाबिल का लहू क्या कहता है? उत्पत्ति ४:१० में कहता है, "तेरे भाई का लहू भूमि से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दोहाई दे रहा है।" हाबिल का लहू परमेश्वर से दोहाई दे रहा था कि हे प्रभु मेरा पलटा ले। पर सिर्फ यीशु का लहू ही है जो आज भी अपने शत्रुओं के लिये यही पुकरता है "हे पिता इन्हें माफ कर।" वह सज़ा नहीं क्षमा देना चाहता है।

यदि यीशु का आत्मा मुझ में है तो यीशु का स्वभाव मुझमें क्यों नहीं है? अगर बद्ला लेने का स्वभाव नहीं बदला तो मेरा जीना ही व्यर्थ है। कहीं किसी के प्रति कड़वाहट से भरे हैं तो प्रभु को पुकार कर उससे कहें, "हे प्रभु मुझे इससे निकाल।" अगर आप इस कड़वाहट और क्रोध से निकल गये तो वास्तव में यह नया साल ऐसा साल होगा जो आपके लिये सब कुछ नया कर जायेगा।

परमेश्वर ही से नहीं पर आपको उससे भी माफी माँगनी है जिसके लिये आपके मन में कड़वाहट भरी है। पत्नि हो या पति हो, चाहे मण्डली का कोई भाई य बहन हो। बड़ी बात तो तब है जब आप पहल कर के माफी माँग लें। अगर दूसरे ने पहले होकर माफी माँग ली और फिर आप एक औपचारिकता के रूप में ही कहते रह गये कि "चलो मुझे भी माफ कर दो" तो यकीन मनियेगा के बाज़ी तो वही मार ले गया। समय किसी का इन्तिज़ार नहीं करता, आप्भी ’समय’ का इन्तिज़ार न करें, कहीं सोचने में ही समय और साल हाथ से फिसल जायें।

परमेश्वर ने अपको आज़ादी दी है और वह आपकी आज़ादी का आदर भी करता है। इसलिये आज वह हमारे सामने दो बातें रखता है - आशीश और श्राप, और फिर एक प्यार भरी सलाह भी देता है कि तू आशीश को ही चुन ले (व्यवस्थाविवरण ३०:१९)।...पहले जाकर अपने भाई से मेल मिलाप कर (मत्ती ५:२४)। आप आज क्या करने जा रहे हैं? कहीं परमेश्वर की आवाज़ को टालने तो नहीं जा रहे?

आपके प्यार और प्रार्थानाओं से सम्पर्क का यह अंक आप तक लाया जा सका, आशा है कि आगे भी आपका सहयोग हमें मिलता रहेगा ताकि सम्पर्क के माध्यम से हमारा सम्पर्क आपसे बन रहे। सम्पर्क परिवार की ओर से आपको नववर्ष की शुभकमनाएं।
सम्पादक