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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

सम्पर्क दिसम्बर २००९: आज उसकी आवाज़

एक बच्चों की कहानी है जो बड़ों को भी बहुत कुछ समझा जाती है। एक राजा का मंत्री था, उसमें एक बात बड़ी अजीब थी: हर बात में एक बात हर बार कहता था, "सब बातें मिलकर भलाई को पैदा करती हैं।" राजा इस इमानदार और सच्चे मंत्री की इस बात को बेवकूफी समझकर हमेशा उसपर हंसता था।

एक दिन राजा अपने सैनिक के साथ तलवार चलाने का अभ्यास कर रहा था, अभ्यास के समय सैनिक की चूक के कारण तलवार राजा के हाथ पर लगी और उसकी उंगली कटकर अलग हो गयी। वहाँ खड़े मंत्री ने हमेशा की तरह कहा, "सब बातें मिलकर भलाई को पैदा करती हैं।" झुँझुलाए हुए राजा ने गुस्से में आदेश दिया, "इस नालायक को बन्दीगृह में डाल दो; अपनी भलाई यह वहीं भोगता रहेगा।" कुछ महीनों उपरान्त राजा शिकार पर निकला और घने जंगलों में अपने साथियों से कहीं अलग भटक गया और एक आदिवासी कबीले में जा फंसा। आदिवासी काफी समय से अपने कुलदेवता को नरबलि चढ़ाने की चाह में थे और अब स्वयं ही उनके हाथ एक बलि योग्य आदमी पड़ गया। उन्होंने देर नहीं की, तुरन्त राजा को नरबलि करने की तैयारी करने लगे। बलि देने के लिये राजा को वेदी पर लाया गया और उसकी बलि चढ़ने ही वाली थी कि एक आदिवासी की नज़र राजा के हाथ और कटी उंगली पर पड़ी। वह तुरन्त चिल्लाया, "रुको, यह संपूर्ण बलि नहीं है, इसका अंग कटा है, कुलदेवता क्रोधित हो जाएंगे।" राजा को उसकी कटी उंगली के कारण छोड़ दिया गया, और वह अपने राज्य की ओर चल पड़ा।

राज्य में वापस पहुँचकर उसने अपने मंत्री को बंदीगृह से बाहर बुलवाया और बोला, "मंत्रीजी, अब मैं मान गया कि सचमुच में सब बातें मिलकर भलाई को उत्पन्न करती हैं। अगर यह उंगली न कटी होती तो गर्दन ही कट गयी होती। पर तुम्हारे बारे में एक बात समझ नहीं आई, इतने दिन तुम बंदीगृह में रहे, उससे तुम्हारा क्या भला हुआ?" मंत्री बोला, "महाराज, प्रभु जो करता है भला ही करता है, क्योंकि वह भला परमेश्वर है। अगर मैं बंदीगृह में न होता तो आपके साथ शिकार पर होता और उन आदिवासियों के हाथों से आप तो बच गये लेकिन मैं अवश्य बलि चढ़ाया जाता! इसलिये सब बातें मिलकर भलाई ही पैदा करतीं हैं।"

शायद आज के बुरे हालात में मुझे कोई भलाई नज़र नहीं आती, लेकिन मैं कल देखूँगा कि हर बात को मेरे प्रभु ने भलाई में बदल डाला।

जॉन बनियन बारह साल इंग्लैंड की जेल में रहा। वह बारह साल जेल से अपने छुटकारे के लिये प्रार्थना करता रहा, पर उन बारह सालों तक उसकी प्रार्थना नहीं सुनी गई। पर परमेश्वर ने जेल को भी उसके लिये भलाई में बदल दिया। उन्हीं बारह सालों में परमेश्वर ने उससे एक किताब लिखवाई - "Pilgrim's Progress" (मसीही मुसाफिर) जिसको बाइबल के बाद सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली किताब कहा जाता है।

यहाँ नहीं वहाँ

कुछ किताबें हैं जो बताती हैं कि इस जीवन में सबसे अच्छा जीवन कैसे मिलेगा; पैसा कैसे मिलेगा; अच्छा पद कैसे मिलेगा; सुखी परिवार कैसे मिलेगा आदि। यदि आप एक मसीही विश्वासी नहीं हैं तो ऐसी कोई किताब किसी बुक स्टॉल से खरीदकर पढ़ लें, शायद कोई तुक्का बैठ जाये।

हम अपने जीवन के बारे में बहुत से सपने संजोकर रखते हैं, पर जैसा हम चाहते हैं वैसा सब कुछ मिलता नहीं। प्रभु यीशु मसीह ऐसा कोई दावा नहीं करता कि इस जीवन में आपको पैसा, पद और सफलता ही मिलेगी। पर वह एक आने वाले सबसे उत्तम जीवन का दावा करता है। एक ऐसा जीवन जिसके बारे में अपके दिमाग़ ने कभी सोचा नहीं, आपकी आँखों ने कभी देखा नहीं और कानों ने जिसके बारे में सुना नहीं, ऐसा भविष्य उसने आपके लिये सजाकर रखा है (१ कुरिन्थियों २:९-१०)।

अंधेरा कमरा और काली बिल्ली

हमें सब कुछ जानने की ज़रूरत नहीं है, पर ज़रूरत है उसे जानने की जो सब कुछ जानता है; और उसे उसके वचन से ही जाना जा सकता है। अगर हम परमेश्वर की खोज अपने ज्ञान से करने की कोशिश करते हैं तो यह ऐसे होगा जैसे,"एक अन्धेरी रात में एक अंधा अन्धेरे कमरे में एक काली बिल्ली को ढूँढ रहा है।" जो अन्धकार में जी रहा है उसे नहीं मालूम कि उसका जीवन कहाँ जा रहा है। वह पैसे में, पद में, परिवार में, मौज-मस्ती में खोया हुआ है। अन्त: जब उसकी आँखें खुलेंगी तो वह अपने आप को वहाँ पाएगा जहाँ वह कभी जाना नहीं चाहता था, पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और लौटने के सारे रास्ते बन्द हो गए होंगे।

संसार का ईश्वर हमें अन्धा कर देता है और संसार के प्रकश की चमक भी अन्धा कर देती है; जैसे पैसे की चमक, पद की चमक, सैक्स की चमक, सम्पत्ति की चमक। पर परमेश्वर का वचन हमारी आँखों को ज्योर्तिमय करता है, ताकि हम अपने आप को साफ-साफ देख सकें। एक दिन यह आकाश पर चमकता सूरज भी काला हो जायेगा और इस संसार का उजाला हमें धोखा दे जाएगा, फिर बहुतों के लिये हमेशा का अन्धकार ही बचेगा।

शब्द शब्द नहीं सामर्थ हैं

प्रभु ने अपने शब्दों में अनूठा प्यार पिरोया है। जब कोई आदमी कहता है, "मत डर यार, मैं हूँ" तो उसके शब्दों से कुछ नहीं होता। पर जब मेरे सामने बाइबल के शब्द आते हैं, "मत डर, मैं हूँ", तो मुझे एक नई सामर्थ मिल जाती है। यह आवाज़ मेरी रूह को छूती है और मुझे मेरी असलियत का एहसास दिलाती है। परमेश्वर के वचन ने हमेशा मुझे हौंसला दिया है। उसने मेरी हर हार को भी जीत में बदल डाला है। मैं गिर कर भी संभल जाता हूँ क्योंकि एक हाथ मेरे साथ है - परमेश्वर का हाथ; और मुझे मालूम है कि मौत भी उसके हाथ से मेरा हाथ नहीं छुड़ा पायेगी।

गज़ब किया

मेरा प्रभु गज़ब का परमेश्वर है। उसकी हर बात गज़ब है। प्यार है तो गज़ब, काम है तो गज़ब, जन्म है तो गज़ब, जीवन है तो गज़ब, और मौत है तो वह भी गज़ब और उसके मौत के बाद की बात भी गज़ब है। उसकी क्षमा को बयान करने के लिये हमारे सारे शब्द भी बहुत कम हैं।

शब्दों के वार पत्थर के टुकड़ो से कहीं ज़्यादा लम्बे समय तक दर्द देते हैं। बहुत से लोग अक्सर ऐसे शब्दों के पत्थर बिना सोचे समझे दूसरों पर फेंकते हैं जिनका दर्द दूसरे लोग ज़िन्दगी भर सहते हैं।

यूहन्ना ८ में फरीसी लोग एक स्त्री के लिये पत्थर लाए थे। इसी अध्याय के अन्त में उन्होंने प्रभु के लिए पत्थर उठाये। लेकिन जिनके हाथ में प्रभु के लिए पत्थर थे, प्रभु के पास उनके लिए भी प्यार था और क्षमा थी। आज भी जिनके हाथ में उसके लिए पत्थर हैं, प्रभु के पास उनके लिए भी क्षमा और प्यार है।

जो आपसे नहीं हो सकता, वह सब परमेश्वर आपके लिए कर सकता है। वह आपकी हर हार को जीत में बदल सकता है। बस उसके वायदों और वचन पर विश्वास कीजिए। अगर कहीं शंका है तो उसे परख कर देखिये (भजन ३४:८)।

अजब रहा सिल्सिला,
ज़िन्दगी का,
गज़ब रहा सिल्सिला,
ज़िन्दगी का,
कहाँ कहाँ पर गिराया मैंने,
कहाँ कहाँ पर उठाया उसने,
सिल्सिला मेरी ज़िन्दगी का।


अजब किया

पिछले ४००० वर्षों से परमेशवर के वचन को मिटाने की पूरी कोशिश की गयी, पर फिर भी दुनिया में यह इकलौती किताब है जो सैंकड़ों सालों से सब से ज़्यादा पढ़ी जाती रही है।

शैतान इस किताब से नफरत करता है। इसलिये जितने हमले इस किताब पर किये गये, उतने संसार की किसी भी और किताब पर नहीं किये गये। कितने ही लोगों ने इसे मिटाने की भरपूर कोशिश की, यहाँ तक कि पोप ने १६वीं सदी तक इसे छिपाये रखा, लेकिन इसे नष्ट करना तो दूर, दबा कर भी नहीं रखा जा सका। शैतान आज भी कितने लोगों को उभारता है कि इसमें मिलावट करके इसकी पवित्रता को बिगाड़ दे। कितने ही लोग तो इसके वचनों का ग़लत अर्थ निकालकर लोगों को सिखाते हैं कि इसकी शिक्षाओं का प्रभाव उलट या ग़लत हो, लेकिन तौभी इस जीवित वचन के द्वारा आज भी प्रतिदिन अनेकों जीवन बदले जाते हैं।

परमेश्वर का वचन एक ग़ैरमज़हबी किताब है, क्योंकि यह किसी मज़हब के बारे में नहीं बताती। इस ज़िन्दा किताब में परमेश्वर चलता, फिरता और बोलता हुआ दिखाई देता है। इस किताब में परमेश्वर ने प्यार ही प्यार पिरोया है; अगर इस किताब में से प्यार निकाल दो तो इस किताब की जान ही चली जायेगी।

अधिकतर विश्वासियों को यह शक सताता है कि हमारा उद्धार हुआ है या नहीं, खास कर नये विश्वासियों को। सालों तक मेरे अन्दर भी यह शक बन रहा। शैतान शक से डराता है कि तेरे पाप क्षमा नहीं हुए। यह इसलिये होता है कि हम परमेश्वर के वचन को समझ नहीं पाते।

पाप की माफी के लिये उसका क्रूस पर दिया गया बलिदान ही काफी है। हमें वह ऐसा बना देता जैसा हम अपने बारे में सोच भी नहीं सकते। परमेश्वर के प्रेम को ठुकराकर हम परमेश्वर का कोई नुकसान नहीं करते, इससे जो भी नुकसान होता है वह हमारा ही होता है।

"यदि आज उसके शब्द सुनो तो अपने मन को कठोर न करो" (इब्रानियों ४:७)।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

सम्पर्क दिसम्बर २००९: कहाँ से कहाँ तक

मेरा जन्म सहारनपुर (यू.पी.) में एक इसाई परिवार में हुआ। मेरे दादा के पास काफी ज़मीन जायदाद थी, उनके पांच बेटों में सबसे बड़े मेरे पिताजी थे। दादाजी के मरणोप्रांत मेरे चारों चाचाओं ने जायदाद के बंटवारे की मांग की। मेरे पिताजी इस बंटवारे के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्हें इस मांग के आगे झुकना पड़ा और जायदाद को भाइयों में बांटना पड़ा। इस कारण हमारा बड़ा घर एक छोटी जगह में सिमट गया। भाईयों के अलग होने से दुखी होकर मेरे पिताजी बहुत शराब पीने लगे, जिसके चलते उन्होंने घर, ज़मीन के काम, खेतीबाड़ी और यहाँ तक तक कि हमें भी नज़रांदाज़ करना शुरू कर दिया। परिणमस्वरूप जिन लोगों को हमारी ज़मीन पर काम के लिये लगाया गया था, उन्होंने धोखे से हमारी सारी ज़मीन हड़प ली। इससे हमारी माली हालत भी बहुत सकते में आ गई, जो बचत का कुछ पैसा था वह सब पिताजी की नशे की आदत के कारण खत्म हो गया।

इन सब परिस्थितियों के बावजूद भी हम लगातार चर्च जाते थे और मैं चर्च की गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थी। मैं रोज़ बाइबल पढ़ती और सन्डे स्कूल क्लास में जाती थी। अगर कोई मुझसे किसी धार्मिक काम करने के विष्य में कहता तो मैं उसे बड़े उत्साह से करती थी।

अगर कहीं कोई विशेष सभा होती थी तो मैं वहाँ भी अपनी माँ के साथ जाती थी। पर यह सब करके भी मेरे अन्दर कोई खुशी या परमेश्वर के उद्धार का आनन्द नहीं था। इन सब बातों को मैं एक धर्म के रीति-रिवाज़ की तरह ही पूरा करती थी, जिसने मुझे एक तरह के बन्धन में बाँध दिया था। मेरा जीवन इसी तरह चल रहा था।

ये सब कैसे हुआ

एक दिन परमेश्वर के घर से आते समय मेरी एक विश्वासी मित्र मुझे मिली और उसने मुझसे एक सवाल पूछा, "क्या तुम मानती हो कि तुम एक पापी हो?" उसके इस सवाल से मैं बड़ी हैरान हुई और मैंने बड़े घमंड से उत्तर दिया, "नहीं, मैं पापी नहीं हूँ; मैं कैसे पापी हो सकती हूँ जबकि मैं बराबर चर्च जाती और बाइबल पढ़ती हूँ और मैंने कभी कोई गलत काम नहीं किया है? मैं विश्वास करती हूँ कि मैं एक अच्छी लड़की हूँ और स्वर्ग में मेरा एक स्थाई घर है।" तब मेरी मित्र ने मुझे बाइबल में से एक आयत दिखाई - रोमियों ३:२३, जहाँ लिखा था "सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।" फिर उसने मुझे परमेश्वर के वचन में से १५-२० आयतें और भी दिखाईं। मैं बाइबल को बहुत लम्बे समय से पढ़ती आ रही थी, लेकिन उस दिन वह सारे वचन मेरे पास एक नई रीति से आये। मैंने हर एक वचन को बड़े ध्यान से सुना और परमेश्वर के आत्मा ने मेरे दिल से बातें कीं। तब मेरे मित्र ने मुझसे पूछा, "क्या तुम प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता करके ग्रहण करना चाहती हो? यदि हाँ तो मेरे पीछे-पीछे प्रार्थना को दोहरा सकती हो।" मैंने कहा "हाँ मैं तैयार हूँ।" जब मैं अपने पापों से पश्चाताप की प्रार्थना कर रही थी तो मैंने अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी। जैसे ही मैंने प्रार्थना को अन्त किया तो मैंने एहसास किया कि एक बड़ा बोझ मेरे हृदय से हट गया है और बयान से बाहर एक अदभुत खुशी ने मुझे घेर लिया है; तब मुझे वास्तविक उद्धार का निश्चय हुआ। उस दिन मैं बहुत खुशी से भरी और बदली हुई अपने घर पहुँची। उस दिन के बाद से मैं प्रभु में बढ़ती गई। अब परमेश्वर के वचन को पढ़ने के मायने मेरे लिये बिल्कुल अलग हो गये।

लेकिन यह सब मेरे परिवार को, विशेषकर मेरे पिताजी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। जब मैंने परमेश्वर के घर में विश्वासियों की मण्डली में जाना शुरू किया तो मेरे पिताजी इसका विरोध करने लगे। वे कहते थे कि हम तो पुराने इसाई हैं तो फिर तुम्हें यह सब करने की क्या ज़रूरत है? फिर मेरे निर्णय को बदलने के लिये सबसे छोटे चाचा को फरीदाबाद से बुलवाया गया। लेकिन प्रभु की दया से मैं अपने निर्णय पर दृढ़ रही। जब वे मुझे समझाने में असफल रहे तो वे ज़बरदस्ती मुझे रोकने की कोशिश करने लगे। इस मुशकिल स्थिती पर विजय पाने के लिये मैं प्रार्थना-उपवास करती थी। जैसे ही प्रार्थना और अराधना सभा का समय नज़दीक आता था, मैं अपने पिताजी से रो रो कर गिड़गिड़ाती थी कि मुझे जाने दीजिये। मेरे आँसुओं को देखकर वह मान जाते, परन्तु यह कहकर कि बस! यह आखिरी बार है। मण्डली की बहिनें हमेशा मेरी इन मुशकिलों में मेरे साथ खड़ी रहीं। वे कई बार हमारे घर आतीं और मेरे पिताजी को मनवाकर मुझे अपने साथ परमेश्वर के घर लेकर जाती थीं।

१९९० में मुझे बोर्ड की परिक्षाओं में बैठना था लेकिन परिक्षाओं की तारीखें देहरादून में आयोजित होने वाली एक विशेष सभा के दिन के साथ अड़चन डाल रहीं थीं। लेकिन प्रभु की दया से मैंने प्रभु और उसकी आज्ञाओं को पहला स्थान दिया, देहरादून जाकर मैंने सभा में भाग भी लिया और अगले दिन अपनी परिक्षा भी दी। प्रभु उनको कभी निराश नहीं करता जो उसपर भरोसा रखते और उससे प्रेम रखते हैं। प्रभु ने मुझे मेरी परिक्षाओं में बहुत अच्छे अंक दिये। इस तरह मेरा जीवन प्रभु यीशु के प्रेम में और अधिक बढ़ता गया।

मुझे उसने क्या दिया

मेरे विश्वास की वास्तविक परख मण्डली की एक विश्वासी बहन के विवाह के बाद हुई क्योंकि उसके विवाह के बाद मण्डली के ज़िम्मेदार भाई और बहन मेरे विवाह के लिये भी बात करने लगे। लेकिन मुझे इस विष्य में कोई ज़्यादा रुचि नहीं थी क्योंकि मैं अपने घर की हालत जानती थी। मैं नहीं चाहती थी कि कोई भी मेरे लिये इस तरह का खतरा मोल लेकर मेरी चिन्ता करे। इसके विपरीत मैं यह सोचती थी कि मेरे घर की हालत देखकर मुझसे विवाह कौन करेगा? पर मुझे मालूम पड़ गया था कि मण्डली के ज़िम्मेदार भाई और अन्य बड़ी बहिनें मेरे विवाह की बात सोच रहे हैं। इसीलिये मुझे एक दिन घर से बुलाया गया, मुझे मालूम था कि मुझे क्यों बुलाया है। सो मैंने पहले से ही तय कर लिया था कि जब वो मुझसे पूछेंगे तो मेरा जवाब ’ना’ ही होगा। परन्तु प्रभु ने मुझसे इफिसियों ६:५ से बात की, "अपने प्रचीनों के आधीन रहो।" इस तरह से मैंने अश्विनी से विवाह करने के बारे में अपनी सहमति दे दी और मुझे इस विष्य में प्रार्थना करने को कहा गया।

मैं प्रार्थना करने को तो राज़ी थी पर यह सोचकर डर रही थी कि अगर मेरे माँ-बाप को इसका पता चलेगा तो क्या होगा? इस विष्य पर प्रार्थना करने के दौरान, प्रभु ने मुझे यर्मियाह ३१:२१ और भजन ४५ से प्रतिज्ञा दी और इससे मुझे यह स्पष्ट हो गया कि यह परमेश्वर की ओर से है। तब मैंने विवाह के इस प्रस्ताव को बिना किसी शक के ग्रहण कर लिया। मैंने देखा कि प्रभु अपने बच्चों को कभी भी किसी उलझन में नहीं रखता। इसलिये उसने पहले मेरी होने वाली सास को फिर मेरे होने वाले पति को भी इस विवाह के लिये अपने वचन से शान्ति दी। प्रभु का धन्यवाद हो कि जनवरी ६, १९९४ को अश्वनी से मेरा विवाह हो गया।

मेरी सास मेरे लिये बहुत ही हिम्मत का कारण थी। जब भी मुझे पढ़ाई में अच्छे अंक मिलते थे तो मुझ से ज़्यादा वह खुश होती थी, और वह मुझे और अधिक उत्साहित करती थी। उसने मुझे बहुत सी आत्मिक बातें सिखाईं। वह एक बहुत अच्छी प्रभु की भक्त थीं और लगातार, अन्त तक प्रभु की सेवा में बिना किसी समझौते के लगीं रहीं। अपने आखिरी दिनों में, मैं उनके साथ डॉक्टर के पास गयी थी, तो उन्होंने मुझसे कहा, "बेटी प्रभु ने जैसे हम से प्रेम किया है वैसे ही तुम उससे पूरे हृदय से प्रेम करना।" यह बात सीधे मेरे दिल में उतर गई। इसके दो दिन बाद एक सड़क दुर्घटना के कारण वे प्रभु के पास चली गईं। अब मैं प्रभु की उस सेवकाई में लगी हूँ जो मेरी सास करती थीं। यह एक बड़ा आनन्द है जो प्रभु की सेवा से मिलता है।

मैं आपको प्रभु की महिमा के लिये बताना चाहती हूँ कि मेरा वैवाहिक जीवन बहुत अद्‍भुत है। पिछले १५ सालों में हमारे परिवार में प्रभु की दया से किसी एक समय भी कोई झगड़ा नहीं हुआ। यदि कोई समस्या होती भी है तो हम उसे खाने की मेज़ पर सुलझाकर एक दूसरे की तरफ देखकर हंसते हुए खुशी से खाने का आनन्द लेते हैं। मेरे पति एक आदर्श पति, पिता और पुत्र हैं। सरकार में एक बड़े पद पर काम करने के बावजूद, प्रभु की दया से उनमें दीनता है। वह प्रभु की सेवा भी करते हैं और हमारे साथ समय भी बिताते हैं, और हमारे तीनों बेटों को प्रभु के भय में बढ़ना सिखाते हैं।

मैं परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ कि उसने मुझे परमेश्वर का भय मानने वाला परिवार दिया है। मैं प्रभु के उन सब लोगों का धन्यवाद करती हूँ जो मुझे और मेरे परिवार को अपनी प्रार्थनाओं में याद करते हैं। परमेश्वर मेरे जीवन की छोटी-बड़ी सब बातों में विश्वासयोग्य रहा है और आगे भी अन्त तक रहेगा। परमेश्वर उनके लिये भला है जो उसपर भरोसा रखते हैं। प्रभु की स्तुति हो!

- विनीता ए. मसीह, नजफगढ़, नई दिल्ली