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रविवार, 4 सितंबर 2016

परमेश्वर की आराधना और महिमा - भाग 10: आराधना में अवरोध - परमेश्वर को ना जानना (i)

आराधना में अवरोध - परमेश्वर को ना जानना (i):

हम देख चुकें हैं कि परमेश्वर की आराधना का तात्पर्य है परमेश्वर को वह महिमा, आदर, श्रद्धा, समर्पण, बड़ाई, स्तुति, धन्यवाद आदि देना जिसके वह सर्वथा योग्य है (भजन 96:8), और जो उसका हक है। जैसे कि यदि किसी व्यक्ति के बारे में हमारी जानकारी ना हो तो हम उसके गुणों के बारे में ना तो बता सकते हैं, और ना ही औरों के सामने उसकी महिमा या बड़ाई कर सकते हैं; वैसे ही यदि हमें परमेश्वर के गुणों, विशेषताओं, कार्यों, योग्यताओं, हैसियत, सामर्थ, बुद्धिमता आदि के बारे जानकारी ना हो तो हम उसकी महिमा तथा आराधना नहीं कर सकते हैं। जैसे जितना हम किसी व्यक्ति को नज़दीकी से और व्यक्तिगत रीति से जानते हैं, उतना ही बेहतर हम उसका वर्णन करने पाते हैं, वैसे ही जितना नज़दीकी से और व्यक्तिगत रीति से हम परमेश्वर को अनुभव द्वारा जानने पाते हैं, उतना ही बेहतर हम उसकी महिमा और आराधना करने पाते हैं। किसी के बारे में जानना और वास्तव में उसे जानना भिन्न हैं, यद्यपि दोनों ही स्थितियों में हम उसके बारे में कुछ सीमा तक तो बोल और बता सकते हैं। लेकिन सच्चाई से परमेश्वर की आराधना कर पाना तब ही संभव है जब हम उसे वास्तव में व्यक्तिगत रीति से जानने लगें।

बहुत समय पहले मेरे साथ हुई एक घटना मुझे स्मरण आ रही है: मैं अपने एक निकट मित्र के साथ कुछ वार्तालाप कर रहा था, और उस वार्तालाप में उस समय के एक बहुत जाने-माने उच्च-श्रेणी के राष्ट्रीय नेता का ज़िक्र आया। वार्तालाप के प्रवाह को बिना बदले या बाधित किए, बड़ी ही हल्की रीति से उस नेता का नाम लेते हुए मेरा मित्र बोला, "अरे वो! उसे तो मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ"; फिर, उसी साँस में, आंखों में एक नटखट चमक तथा चेहरे पर एक मज़ाकिया मुस्कान लाकर मेरा मित्र आगे बोला, "लेकिन वो मुझे कितना जानता है, यह एक बिलकुल अलग बात है!"

बात की सच्चाई यह है कि मेरा वह मित्र उस नेता के बारे में तो जानता था, लेकिन उस नेता को नज़दीकी तथा व्यक्तिगत रीति से कदापि नहीं जानता था। यद्यपि वह उस नेता के बारे में बहुत कुछ बता सकता था, उसके बारे में वार्तालाप कर सकता था, लेकिन यह इस बात का प्रमाण नहीं था कि मेरा वह मित्र उस नेता को व्यक्तिगत रीति से भली भांति जानता है, उसके साथ निकट संबंध रखता है। ऐसी ही स्थिति हम में से अनेकों के साथ परमेश्वर के साथ हमारे संबंध को लेकर भी है। हम परमेश्वर के बारे में जानते हैं, अपने ज्ञान तथा सामान्य जानकारी के आधार पर हम उसके बारे में बहुत कुछ बता भी सकते हैं, परन्तु केवल एक ही बात है जो महत्वपूर्ण है, वह है कि क्या परमेश्वर के साथ हमारा एक निकट और व्यक्तिगत संबंध है; क्या हमने स्वयं निजी तौर पर उसे अनुभव कर के जाना है? क्या यह सच नहीं है कि सामान्यतः हम केवल उसके बारे में ही जानते हैं, परन्तु अपने निजी अनुभव तथा निकट एवं व्यक्तिगत संबंध द्वारा नहीं? क्या यह सच नहीं है कि सामन्यतः लोगों के लिए परमेश्वर के साथ संबंध रखना एक उत्साह-विहीन रस्म, यन्त्रवत कार्य, बेपरवाही का और ऊपरी, बाहरी दिखावे के लिए पूरी करी जाने वाली ज़िम्मेदारी है जिस के द्वारा कुछ धार्मिक अनुष्ठानों, रीति-रिवाज़ों और प्रथाओं का पालन हो सके?

नया जन्म पाने से परमेश्वर की सन्तान बन जाने वाले लोगों के बारे में भी यदि देखें तो - वे अपने स्वर्गीय परमेश्वर पिता को व्यक्तिगत अनुभव द्वारा और वस्तविकता में कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं? उनके लिए उसकी योजनाओं और उन उम्मीदों को जो परमेश्वर उन से रखता है वे कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं? उनके लिए परमेश्वर की इच्छाएं को तथा जो कार्य वह चाहता है कि उसके बच्चे करें उन कार्यों को वे कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं? उसके वचन को जिसे उसने हमें दिया है कि वह हमारा मार्गदर्शक बने और परमेश्वर पिता के बारे में हमें सिखाए उस वचन को वे कितना जानते हैं तथा जानने का प्रयास करते हैं?


तो फिर इसमें कौन सी असमंजस की बात है कि नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी भी सार्वजनिक तौर पर अपना मुंह खोलकर परमेश्वर की आराधना के लिए कुछ शब्द बोलने में इतना अधिक हिचकिचाते हैं, अपने आप को असमर्थ पाते हैं
(...क्रमश:)

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