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सोमवार, 2 सितंबर 2019

अय्यूब के दुखों का उद्देश्य



प्रश्न: यद्यपि अय्यूब धर्मी था, फिर भी उसे दुःख क्यों उठाने पड़े?

उत्तर:
हमें अय्यूब की कहानी को नए नियम के दो पदों के संदर्भ में देखना चाहिए: रोमियों 8:28 “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं”; तथा याकूब 5:11 “देखो, हम धीरज धरने वालों को धन्य कहते हैं: तुम ने अय्यूब के धीरज के विषय में तो सुना ही है, और प्रभु की ओर से जो उसका प्रतिफल हुआ उसे भी जान लिया है, जिस से प्रभु की अत्यन्‍त करूणा और दया प्रगट होती है। अय्यूब के लिए याकूब 5:11, रोमियों 8:28 की पुष्टि है शैतान जितने भी दुःख अय्यूब पर लेकर आया, परमेश्वर ने उन सभी को आशीष में परिवर्तित कर दिया, न केवल अय्यूब के लिए वरन उसके मित्रों के लिए भी, जिन्हें अय्यूब में होकर, व्यक्तिगत अविस्मरणीय तथा शिक्षाप्रद अनुभव के द्वारा, परमेश्वर और उसकी धार्मिकता के बारे में सीखने का अवसर मिला।

अय्यूब की पुस्तक के पहले अध्याय को पढ़ते समय, हमें अय्यूब के बारे में दो बहुत महत्वपूर्ण बातों से अवगत करवाया जाता है। पहली यह कि यद्यपि अय्यूब धर्मी व्यक्ति था (अय्यूब 1:1), इस बात को परमेश्वर ने भी कहा (अय्यूब 1:8; 2:3); किन्तु उसकी धार्मिकताकर्मोंकी धार्मिकता थी (अय्यूब 1:5), जैसा कि उसके मित्र एलिपज़ ने भी कहा (अय्यूब 4:6)। और दूसरी यह कि, अय्यूब द्वारा परमेश्वर का भय मानना, अपने आप को तथा अपने परिवार को हानि से बचाए रखने के लिए अधिक था, न कि परमेश्वर की हस्ती को पहचानते हुए उसकी आराधना करने के भाव से (अय्यूब 3:25)। अय्यूब ने इस बात को स्वीकार किया जब वह औरों की भलाई करने के अपने भले कार्यों का वर्णन कर रहा था, “क्योंकि ईश्वर के प्रताप के कारण मैं ऐसा नहीं कर सकता था, क्योंकि उसकी ओर की विपत्ति के कारण मैं भयभीत हो कर थरथराता था” (अय्यूब 31:23)। अपने कर्मों के कारण, अय्यूब अपनी ही दृष्टि में धर्मी था (अय्यूब 32:1; 34:5) – जो कि उसके लिए एक विनाशक संभावना हो सकती थी। परमेश्वर अय्यूब की इस नश्वर कर्मों की धार्मिकता की स्थिति को सुधारना चाहता था, और अय्यूब को सदा काल कि अविनाशीविश्वास की धार्मिकता में लाना चाहता था जो कभी नहीं बिगड़ेगी, कभी नहीं घटेगी, और जिसके विरुद्ध शैतान कभी कुछ नहीं कर सकेगा।

परमेश्वर ने यह सुधार शैतान द्वारा अय्यूब की भक्ति और निष्ठा की परिक्षा करने की इच्छा को प्रयोग करने के द्वारा किया। शैतान के माध्यम से, तथा उसके मित्रों द्वारा उस पर किए जाने वाले दोषारोपण से, परमेश्वर ने होने दिया कि अय्यूब अपने सारे भौतिक संसाधनों, सारी बुद्धिमत्ता, सभी योग्यताओं, और समस्त सांसारिक स्तर से, अर्थात जिन बातों में वह घमण्ड कर सकता था, बिलकुल खाली हो जाए। एक बार जब ऐसा हो गया, तब परमेश्वर ने अय्यूब द्वारा उठाए किसी भी प्रश्न का कोई उत्तर देने, या अपने आप को सही ठहराने, या शैतान को उसे दुःख देने की अनुमति प्रदान करने को सही ठहराने का प्रयास करने की बजाए, परमेश्वर ने अय्यूब को अपनी भव्यता, अपनी अद्भुत सृजनात्मक शक्ति, अपनी अथाह बुद्धिमत्ता और कार्य कुशलाताओं तथा योग्यताओं से, जिनमें होकर वह सारी सृष्टि का नियंत्रण करता है, उसे संचालित करता है, और उस में की प्रत्येक वस्तु और बात की जानकारी रखता और देखभाल करता है अय्यूब को अवगत करवाया। और इस प्रकार से परमेश्वर ने अय्यूब को यह एहसास करवाया कि वास्तविकता में अय्यूब सृष्टि में कितना महत्वहीन है, किन्तु फिर भी परमेश्वर उसे जानता है और उसका ध्यान रखता है, और साथ ही उसे यह एहसास भी करवाया कि अपनी जिस स्व-धार्मिकता में वह गर्व अनुभव कर रहा था और परमेश्वर को प्रसन्न करने के अपने गढ़े हुए प्रयासों के द्वारा जिस स्व-धार्मिकता को बनाए रखने के प्रयासों में वह लगा रहता था, वह कितनी महत्वहीन थी और ऐसा करने के द्वारा, एक प्रकार से, अय्यूब परमेश्वर का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए कर रहा था।

अब, परमेश्वर की अति-महान हस्ती, उसकी अचूक बुद्धिमत्ता और योग्यताओं के सम्मुख आने पर, तुरंत ही अय्यूब को यह एहसास हो गया कि वह कितना मूर्ख था कि परमेश्वर के सम्मुख अपने कर्मों से धर्मी होने और बने रहने के दावे कर रहा था और इसके लिए परमेश्वर का उपयोग करने के प्रयास कर रहा था। इसलिए तुरंत ही अय्यूब अपने तुच्छ होने को स्वीकार कर लेता है (अय्यूब 40:4-5)। और परमेश्वर जब आगे उससे उत्तर माँगता है तो अय्यूब अपनी मूर्खता को स्वीकार करके पश्चाताप करता है (अय्यूब 42:1-6) – उसे प्रतिफल देने के लिए परमेश्वर उससे यही चाहता था (याकूब 5:11) तथा इसी बात की ओर उसे हांक रहा था। जब अय्यूब ने परमेश्वर के सम्मुख अपनी वास्तविकता को स्वीकार कर लिया, तो परमेश्वर ने उसे क्षमा कर दिया (1 यूहन्ना 1:9), और न केवल अय्यूब की हानि को पूरा कर दिया, वरन उसे पहले से दुगना दे दिया (अय्यूब 42:10) – अय्यूब के लिए रोमियों 8:28 की पूर्ति हुई; साथ ही अय्यूब में होकर अय्यूब के मित्रों को भी धार्मिकता का पाठ सीखने को मिला (अय्यूब 42:7-8)

इसलिए, वास्तव में अय्यूब के दुःख, दुःख नहीं थे, वरन वह प्रधान सर्वोत्तम शिल्पकार प्रभु परमेश्वर, शैतान की योजनाओं के द्वारा, अय्यूब के जीवन के अनुपयोगी भागों को तराश कर हटा रहा था, उसके जीवन के पैने और खुरदरे भागों को घिस कर सपाट कर रहा था, और उसे रगड़ कर अपनी एक उत्कृष्ठ कलाकृति को एक ऐसी दिव्य चमक प्रदान कर रहा था, जिससे अय्यूब को एक ऐसा स्वरूप, स्तर, और सुन्दरता मिले जो सदैव सुरक्षित बनी रहेगी और शैतान अय्यूब के विरुद्ध चाहे जो भी योजना बनाए, वह चमक कभी धूमिल नहीं होगी, तथा साथ ही आने वाले समयों में लोगों को इससे परमेश्वर की धार्मिकता से संबंधित बहुमूल्य आत्मिक पाठ सीखने को मिलेंगे।

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