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गुरुवार, 21 मई 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००३: अभी अन्धेरा और भी बाकी है

कहीं किसी ने एक कहानी गढ़ कर कही। एक राजा के पास एक फकीर पहुँचा। राजा कुछ मसती में था, मुस्कुरा कर बोला, “मांगो क्या मांगते हो।” फकीर के हाथ में एक छोटा पर अजीब सा थैला था। फकीर बोला, “महाराज, बस इस थैले में सोने के सिक्के भरकर दे दीजिए।” राजा ने फौरन आज्ञा दी और महामंत्री ने स्वर्ण मुद्राएं उसके छोटे थैले में डालनी शुरू कीं। हज़ारों स्वर्ण मुद्राएं डाली गयीं पर वह छोटा थैला भरने में ही नहीं आ रहा था। अब घबराया सा राजा हार कर बोला, “सन्यासी महाराज, यह छोटा थैला कोई जादूई थैला लगता है।” फकीर ने बड़ी लापरवाही से कहा, “नहीं राजन, यह थैला कोई जादूई थैला नहीं है। यह थैला तो आदमी के दिल से बना है।” मित्र मेरे, आदमी का दिल पैसे से, पद से, ज्ञान से और मान से, कितना ही क्यों न भर लो, पर उसका दिल कभी भर नहीं पाएगा। आदमी के दिल को बनाने वाले ने अपने लिये बनाया है और केवल वही है जो इस दिल के खालीपन को भर सकता है, संतुष्ट कर सकता है। उसके बिना यह दिल खाली ही रहेगा, बेचैन रहेगा और फिर बेचैनी में ही मरेगा।

धर्म खुद में खाली और खोखले हैं, वे आदमी के दिल के खालीपन को क्या भर पाएंगे। हज़ारों धर्म, हज़ारों सालों से, हज़ारों कर्तब और तरीकों से एक मन को भी संतुष्ट नहीं कर पाए। आज तक आदमी का मन उस खालीपन की बेचैनी को भोग रहा है।

५ मई २००३ के “मिड डे” अखबार में एक सर्वेक्षण छपा था, जिसके अनुसार - २०% बच्चे अपना १५वाँ जन्म दिन मनाने से पहले ही सैक्स (व्यभिचार) में फंस चुके होते हैं; ६७% माँ-बाप अपने बच्चों के इस व्यभिचार को जान ही नहीं पाते। अनुमान्तः एक साल में १५ साल से कम उम्र की ८०,००० लड़कियाँ माँ बन चुकी होती हैं। पाप बड़ी तेज़ी से हमारे घरों में पनप रहा है। इस कारण हर घर अनसुलझी परेशानियों से घिरा है। आदमी परिवार से, समाज से, बिमारियों से और बेरो़ज़गारियों से हार गया है। वह ज़िन्दा तो है पर सहमा सा अपने अन्दर शम्शान सह रहा है। कुछ ने तो सोच लिया क्यूँ ऐसी सज़ा सहने के लिए जीएं। उनके मन ने मान लिया है कि अब कुछ नहीं बदलने वाला है। ऐसी मौत माँगती ज़िन्दगियों की कमी नहीं। बेवजह की बातों से, बुरी आदतों से, पाप से घिरा हर घर बिखर जाता है। घर दरवाज़ों और दीवारों से कभी नहीं बनता, पर प्रेम से बनता है, प्रेम से पनपता है और प्रेम से सजता है। परिवार में यदि प्रेम नहीं है तो कुछ नहीं है। परमेश्वर प्रेम है, जब परमेश्वर ही जीवन और घर में नहीं है तो प्रेम कहाँ होगा, हाँ प्रेम का दिखावा ज़रूर हो सकता है।

स्वर्गीय सत्य हमारी शर्मनाक हालत को सबके सामने लाकर रख देता है। हम परिवार में कुछ होते हैं, दोस्तों में कुछ और अपने अधिकारी के सामने कुछ और ही बन जाते हैं। परमेश्वर का वचन हमारी सारी पर्तों को हटा कर हमारा असली चेहरा हमें दिखाता है। आज की ज़िन्दगी एक नाटक से ज़्यादा नाटकीय है।
कहा जाता है कि ज़्यादातर पत्नियाँ बनावटी आँसू और दिखावटी हंसी में माहिर होती हैं, क्योंकि वे सोचती हैं कि इसके बिना तो गाड़ी खिसकती ही नहीं। बाहर भेड़ सी दिखने वाली बीवी, घर में आकर भेड़िये सी भी हो जाती है। ऐसे ही एक परिवार में बेटे ने झल्लाकार कहा, “रोज़ लेट हो जाता हूँ, डैडी कम से कम घड़ी तो रिपेयर करवा दो।” ‘धर्मपत्नि’ पतिदेव की तरफ इशारा करते हुए बीच में बोली, “इस घर में बहुत चीज़ें रिपेयर के लिये पड़ीं हैं, शुरुआत तो इस बुढ्ढे की खोपड़ी से होनी चाहिए।” ऐसी ‘धर्मपत्नियों’ से बोलते समय आपका सुर ज़रा ऊपर नीचे हुआ नहीं कि घर को युद्ध का मैदान बनते देर नहीं लगती। वे बात-बेबात पर लड़ने को बेताब अड़ी खड़ी रहती हैं। अगर किसी ज़िद्द पर अड़ गयीं, तो फिर वो बीवी क्या जो ज़िद्द छोड़ दे और वो ज़िद्द क्या बीवी जो छोड़ दे।

पर कुछ घरों की कहानी इससे उलट होती है। वहाँ कुछ मर्द ऐसे होते हैं जो नीच तरीकों से अपनी मर्दान्गी दिखाते हैं-अपनी बीवी पर हाथ उठाकर, उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित कर के यो दूसरों के सामने ज़लील करके । तमीज़ और शर्म कभी हमारे घरों में कोई चीज़ होती थी। अब बाप अपनी बेटी के सामने पूरे गन्दे और नंगे शब्दों के साथ गाली बकता है। जैसे-जैसे उनका बुढ़ापा बढ़ने लगता है, वे सठियाने, खिसियाने और ज़्यादा ही बतियाना शुरू कर देते हैं। वे इतना मंज चुके होते हैं कि ऐसा कोई मुद्दा नहीं होता जो उनकी पकड़ के बाहर हो। रिटायरमैंट के बाद तो बात ही कुछ और हो जाती है, काम काफी बढ़ जाते हैं; जैसे-पड़ौसियों का ज़बरदस्ती सिर खाना, मौहल्ले की दुकान पर निठल्ले बैठ आने-जाने वालों पर टिप्णीयां करना, सब्ज़ी वालों से झक मारना, पुराने घिसे-पिटे किस्सों को बार-बार दोहराना, अख़बार में छपे हुए हर विज्ञापन से लेकर मण्डी के भाव तक को चाट जाना इत्यादि। आम लोग इनसे इस तरह डरने लगते हैं जैसे पागल कुत्ते का काटा पानी से डरता है। परिवार में औलाद भी पीछे नहीं है। वह भी बाप को बाप तब तक समझती है जब तक बाप की जेब गरम है। बाद में तो बाप बोझ बन जाता है। प्रिय पाठक, आपके परिवार का क्या हाल है?

परिवार से आगे खिसक कर देखें, आज हमारे समाज का क्या हाल है? पहले कहा जाता था, जितने मूँह उतनी बातें; पर आज बात बदल गयी है। मूँह कम हैं बातें ज़्यादा हैं। मूँह खाने के लिए और जीभ कोसने के लिए प्रयोग होती है। खाने के भी कई विकल्प हैं - चाहो तो गाली खा लो, कसम खा लो, हवा खा लो, कान खा लो, किसी का सिर खा लो, घूंसे खा लो, किसी का माल खा लो और हिम्मत हो तो सिर्फ माल ही नहीं पूरा माल गोदाम खा लो। कुछ लोग तो कहने लगे हैं कि ईमान्दार व्यक्ति वह है जिसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिला।

भ्रष्टाचार हमारी परंपराओं में पूरी तरह से खप गया है। इससे अछूता बच निकलना अपने आप में आदमी के बस से बाहर है। कुछ कर्मचारी हैं जिनका नियम है नियम से रोज़ लेट आना, किसी के बनते काम में ज़बरदस्ती टाँग अड़ाना ताकि बन्दा कुछ नज़राना चढ़ाकर जाए। जैसे ही कर्मचारी, तरक्की पा, अधिकारी बन्कर घूमने वाली कुर्सी तक पहुँचता है, उसका दिमाग़ ही घूम जाता है। ग़ुरूर इतना आ जाता है कि खुद को खुदा और दूसरों को गधा समझने लगता है। बिकाऊ माल की तरह, कितने ही अधिकारियों और कर्मचारियों की भी एक कीमत होती है। उस कीमत पर वह आराम से खरीदा जा सकता है। बस इतना हो कि आप उसकी दिखावटी ईमान्दारी पर उंगली न उठाएं। वो जता देते हैं कि आखिर आपको भी तो पानी में ही रहना है, तो ध्यान रखिएगा, कहीं मगरमच्छों से ज़रा सी छेड़-छाड़ बहुत महंगी न पड़ जाए।

हमारे स्वतंत्र देश में सबसे अधिक स्वतंत्रता और सुरक्षा की ज़रूरत अपराधियों को है, जो हमारी पुलिस बड़ी मुस्तैदी से उन्हें मुहैया भी करा देती है, सिर्फ महीना बांधने की ज़रूरत है। पहले एक खेल होता था चोर भाग, सिपाही आया। आज कहते हैं कि सिपाही भाग चोर आया। एक बार एक सिपाही ने एक चोर से पूछा, “मियां धंधा कैसा चल रह है?” चोर बोला, “भाई साहब क्या बताऊं, लाकर और बैंक का ज़माना है। आजकल कुछ खास हाथ नहीं लगता। धंधा बदलने की सोच रहा हूँ। अब चोरी छोड़ नेतागिरी करूंगा।”

हमारी राज व्यवस्था को चलाने हेतु ‘नेताश्री’ लोगों की ज़रूरत होती है। नेतागिरी का बुनियादी उसूल है, दूसरों को आपस में लड़ाओ और खुद नेता बन जाओ। उन्हें लोगों को किसी न किसी बात पर लड़वाना ज़रूरी होता है; जैसे-धर्म पर, ज़ात पर, भाषा पर, शिक्षा पर, इत्यादि। असल में हमारे यहां दो तरह के लोग हैं - एक लड़ने वाले और दूसरे लड़वाने वाले। लड़ाने वाले अक्ल लड़ाते हैं और दूसरों को आपस में भिड़ा देते हैं। पर लड़ने वालों को अक्ल की ज़रूरत ही नहीं होती। उन्हे तो बस थोड़ा सा उक्सा भर दो, फिर तो मुद्दे या परिणाम के बारे में जाने-सोचे बिना, तुरंत, तोड़-फोड़, आगज़नी और मारने-काटने को तत्पर और तैयार हो जाते हैं। हमारे धर्मगुरू भी इसी तरह हमें आपस में भिड़ाने को भड़काते रहते हैं। धर्म के नाम पर हमारे मनों में इतनी नफरत भर दी गई है कि पूरा समाज भिखराव के रास्ते पर खड़ा है। धर्म के उद्देश्य और रास्ते बदल चुके हैं और आदमी के दिमाग़ को धर्म के दीमक ने इस लायक नहीं छोड़ा कि वह कुछ सही सोच सके। मज़हबी बदले की भावना के घने बादलों में घिरा समाज, इस भावना के अंजाम से बेपरवाह, अपने ही विनाश की ओर अग्रसर है।

आत्मिक इलाज करने वाले नामधारी संतों की गिनती का कोई अन्त नहीं। वे हमारे गली छाप डाक्टरों की तरह हर गली में दुकान खोले बैठे हैं। ग़रीब लोगों का उल्लू बना कर, अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। हमारी एक पड़ोसन एक दिन एक डाक्टर से अपना ख़राब दांत निकलवाकर घर लौटी। कुछ देर बाद जब सुन्न करने वाले इंजैकशन का असर ख़त्म हुआ तो दांत में पहले जैसा दर्द फिर शुरू हो गया। जब जांच-पड़ताल की तो पता चला कि ख़राब दांत तो वहीं का वहीं है, उसके बगल वाला अच्छा दांत बाहर कर दिया गया। बेचारी बहुत चीखी-चिल्लाई, पर अब क्या होता? ऐसे ही दमदार कोत्वाल के कारनामे हैं, नत्थूजी चोरी करते हैं पर फत्तूजी को जेल भेज दिया जाता है।

जो एक दूसरे को धोखे बांट रहे हैं, देर-सवेर एक दिन, अचानक वे ख़ुद बड़े धोखे के अखाड़े में आ खड़े होंगे और तब सहने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएंगे। जो कुछ हम बोएंगे, वही हम काटेंगे। अनन्त सत्य यही है।

तन तो सजा है, पर मन का मकान अन्दर से ढह रहा है। बहुत कुछ बदला है पर आदमी अन्दर से कहीं बदला है? हत्या, व्यभिचार, आतंक, रिश्वत, बैर और जलन सब वैसा ही है; सिर्फ कपड़े, रहन सहन और भाषा बदली है। अब पाप के भारी शब्दों को हल्का करके कहने का रिवाज़ है; जैसे ‘रिश्वत’ की कमाई को उपर की कमाई या सुविधा शुल्क कहते हैं; ‘व्यभिचार’ को संबंध कहते हैं; ‘बदला लेने’ को अब इसे ज़रा सिखाना पड़ेगा और ‘ईमान्दार’ आदमी को बेवकूफ कहते हैं। हमारी दुनिया की उम्र उस मंज़िल तक पहुंच गयी है जहां उसे काला तो सफेद दिखता है और सफेद काला। बहिश्त के बाग़ीचे से जब आदम ज्ञान का फल खाकर बाहर आया तब से उसका ज्ञान तो तेज़ी से बढ़ता जा रहा है, साथ ही वह अपनी तबाही की तैयारी भी पूरी करता जा रहा है। उसने अपनी पृथ्वी को भी विनाश के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है। उसने वायु, जल, ज़मीन यानि जीवन के हर साधन को ज़हरीला कर दिया है। हमारी पृथ्वी पर भारी दबाव है और आदमी के विनाश का अध्याय साथ ही जुड़ा है; वास्तव में तो सारी सृष्टी ही कराह रही है।

प्रिय पाठक, आप में से कितने ही अपनी आदतों से परेशान होंगे। आप गाली नहीं देना चाहते पर मूँह से निकल जाती है; आप गुस्सा नहीं करना चाहते पर अपने को रोक नहीं पाते। कई अपनी बुरी लतों जैसे शराब, सिगरेट, व्यभिचार आदि से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं। वे अपना शरीर, परिवार, पैसा सब कुछ धीरे धीरे बरबाद करते जा रहे हैं। आप में अपने आप इन बुराईयों को रोक पाने की सामर्थ नहीं है। कहीं सम्पर्क आप ही के जीवन की अनसुलझी कहानी तो नहीं कह रहा है?
बस दिखावा ही आदमी पर सवार है, सदा यही प्रयास रहता है कि अन्दर का छिपा आदमी कहीं बाहर न दिख जाए। दिखावे का चरित्र जीना, अपने आप से बेईमानी करना है। इन्हीं पापों की वजह से आपके अन्दर का आदमी बेचैन, झुंझलाया और बेबस है। कुछ तो इतने निराश हैं कि अब वे आत्म हत्या पर उतारू हैं। आप अपनी इन बुराईयों से, अपनी ही ताकत से, कभी नहीं छूट पाएंगे और न ही मन में रमीं-जमीं वासनाओं को अपनी सामर्थ से मार पाएंगे। पाप में फंसा आदमी, उसके हल की तलाश में अपने जीवन को घसीटता ही रहेगा। हमारे काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा पक्की स्याही से लिखा जा रहा है। हमारे जीवन के अनखुले और अधखुले हर एक पन्ने को एक दिन खोला जाएगा। कोई ऐसा पन्ना नहीं है जो खुलेगा नहीं। हर पन्ने पर लिखी हर एक बात की एक दिन ठीक-ठीक जांच पड़ताल होगी। कुछ भी ढंपा नहीं रहेगा। अगर आप अपनी आंखें बन्द करके अपने अन्दर देखना शुरू करें तो आपका मन खुद ही बयान देगा कि आप जो बाहर से दूसरों को दिखाते हैं वैसे वास्तव में अन्दर से हैं नहीं। आपका मन आपके अन्दर की वास्त्विक स्थिती, अन्दर दबी हुई बेचैनी और परेशानियों को भी बयान करेगा।

इस मौजूदा ज़िंदगी में ज़्यादतर इन्सान एक घुटन के साथ जी रहे हैं। जीना उनकी मजबूरी है। साथ ही एक तलाश भी ज़ारी है कि कहीं कुछ राहत की सांस मिले। सपनों के सांचे में जीवन ढालने के लिए जी-जान लगा कर भी निराशा ही मिलती है। जिधर आपकी चाह है, उधर आपकी राह नहीं है। जब तक जीवन में पाप रहेगा, तब तक आदमी परेशान और बेचैन रहेगा। कोई भी अपने पाप से अपने आप को छुड़ा नहीं सकता। मौत के बाद भी पाप और उसकी खौफनाक बेचैनी पीछा नहीं छोड़ेगी। हर एक व्यक्ति अपने स्वभाव से ही पापी है। प्रभु यीशु इसी पाप के स्वभाव और पाप को नाश करने आया, पापी को नहीं। प्रभु यीशु नहीं चाहता कि एक भी पापी नाश हो। वह तो हर एक को मन फिराने और पापों की क्षमा माँगने का अवसर देता है, क्योंकि वह पापी से प्यार करता है - हर एक पापी से, और पाप से भरे इस जगत से भी - “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।”- यूहन्ना ३:१६।

इस सत्य को जानिएगा और मानिएगा तो जो भी जैसा भी आप से बुरा हो गया हो वह सब सदैव के लिए समाप्त हो सकता है। आप नए सिरे से, एक नए जन्म से शुरू कर सकते हैं। आप अपने बेचैन और परेशान जीवन को आनन्द से भर सकते हैं। पाप से पश्चाताप की सिर्फ एक प्रार्थना के बाद फिर आपको अपने किए पर कोई पछ्तावा नहीं रहेगा। धर्म परिवर्तन की बात सोच कर आप इस सच्चाई को ज़लील करते हैं। संप्रदाय नहीं पर स्वभाव बदलने की ज़रूरत है। धर्म परिवर्तन से किसी के जीवन में कोई परिवर्तन कभी नहीं आता। प्रभु यीशु ने क्रूस पर अपनी जान इस लिए दी कि आपकी जान नरक के विनाश से, जहां की पीड़ा कभी कम नहीं होती, बच जाए। यह शाश्वत सत्य इसाई ‘धर्म’ के अनुयाइयों पर भी ठीक वैसा ही लागू है जैसा किसी और पर; इसाई ‘धर्म’ के अनुयाइयों को भी पश्चाताप करने, मन फिराने और नये जन्म की वैसी ही आवश्यक्ता है जैसी किसी अन्य को - “क्योंकि सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों ३:२३)”। ‘नरक’ के बिना प्रचार बड़ा भला लगता है, पर ‘नरक’ एक सच्चाई है। इसको छिपा कर प्रचार करना लोगों को धोखा देना है। पाप के साथ जीवन जीता हर व्यक्ति, नारकीय बेचैनी को यहीं से भोगना शुरू कर देता है और मृत्यु के बाद उस बेचैनी को पूरी भयानकता के साथ हमेशा के लिए भोगता रहेगा।

हर शरीर से जन्मे हुए पर मौत की मोहर लगी है। अभी तक आदमी ऐसे दरवाज़े नहीं बना सका जो मौत को रोक सकें। एक दिन मैं यहां नहीं रहूंगा, आप यहां नहीं रहेंगे, पर यहां के बाद जहां भी होंगे, वहां हम अपने कर्मों का फल ज़रूर भोगते रहेंगे। हम यहां किये हुए अपने कुकर्मों के इतिहास को किसी कूड़े के ढेर पर फेंक कर नहीं जा पाएंगे, वह इतिहास तो हमारे साथ ही जाएगा और हमारे विरोध में साक्षी भी बनेगा। अपने जीवन के उन आखिरी पलों का ज़रा एहसास करिएगा, जब आप अपने प्राणों को छोड़ने वाले ही होंगे; ये पल कभी न कभी तो निश्चय ही आएंगे। उस समय जब आपके घिनौने और छिपे पाप आपको याद आएंगे और यह कि आप उनके साथ कहां जाएंगे, तो सोचिए कैसा लगेगा? ज़रूरी नहीं कि उस समय आप के पास मन फिरने या पश्चाताप का अव्सर हो या आप पश्चाताप करने की स्थिति में हों। यह अव्सर और सामर्थ तो आज आपके पास है, कल नहीं भी हो सकती है।

मेरे प्यारे पाठक कुछ भी अन्होनी कभी भी हो सकती है। अचानक ऐसी खबर, जिसे आप कभी सुनना न चाहते हों आपको सुननी पड़ सकती है। जो बात आप सहना न चाहें, आपको सहनी पड़ सकती है। मौत का सिर्फ एक झटका, आपको अचानक ही कभी, आंसुओं की दहकती झील में हमेशा के लिए झोंक देगा। मौत आपके पास से हर एक मौका हमेशा के लिए छीन लेगी, फिर बस एक खौफनाक आंधियारे के चीखते सन्नाटों की अनन्तकालीन तड़पन ही आपके साथ रह जाएगी। प्रभु यीशु आपके जीवन में पाप को नाश करेगा, आपको नहीं। धर्म परिवर्तन के भ्रम को जीवन में मत पालिएगा। प्रभु यीशु पाप की क्षमा देने आया, कोई धर्म नहीं। एक ईमान्दारी की प्रार्थना से यीशु को परखें और कहें, “हे प्रभु यीशु मुझ पापी पर दया कर के मेरे पाप क्षमा करें। मैं विश्वास करता हूं कि आपने मेरे पापों के लिए अपना जीवन दिया, ताकि मैं अनन्त आनन्दमय जीवन पाऊं।”

समय तेज़ी से फिसल रहा है। दिन हफतों में, हफते महीनों में और महीने सालों में बदल रहे हैं। कहीं आप खड़े सोचते ही न रह जाएं और समय आपको सलाम मार जाए। हां मेरे मित्र, जो आपने पढ़ा है, कहीं वह आप ही का जीवन तो नहीं है? यदि आपके पाप आप पर प्रगट हुए हैं तो अब आपको अपने बारे में एक फैसला करना ही है-आप प्रभु यीशु की क्षमा के इस आमंत्रण को या तो अपनाएंगे या ठुकराएंगे, निर्णय आपका ही है। वह तो इसी का इंतिज़ार कर रहा है कि कब आप कहें ‘हे प्रभु यीशु मुझ पापी पर दया करके अपनी क्षमा और शांति मुझे दें। हे प्रभु मेरी प्रार्थना की लाज रखें। प्रभु यीशु के नाम में, आमीन।’

शुक्रवार, 15 मई 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००३: सम्पादकीय

घिरे बादलों की वजह से जंगल तो काफी भीग चुका था, और शाम भी जल्दी उतर आयी थी। तीन विश्वासी काफी जल्दी से इस जंगल को पार कर रहे थे, ताकि अंधेरा होने से पहले वे अपने घर पहुंच जाएं। अचानक एक तीखा मोड़ मुड़ते ही सामने एक कंटीली झाड़ी पगडंडी पर पड़ी दिखी। पहले विश्वासी ने एक छोटी दौड़ ली और उस झाड़ी को तेज़ी से टाप गया; दूसरा उसके किनारे से बच कर निकल गया; पर तीसरा उस झाड़ी को रासते से हटाने लगा। पहला कुछ झुंझला कर बोला “यार किस चक्कर में पड़ गया। अंधेरा सिर पर खड़ा है।” तीसरा ने धीरज से जवाब दिया “अंधेरा होने वाला है, इसी लिए हटा रहा हूँ, कि कोई हमारे पीछे आने वाला इस झाड़ी में उलझ न जाये।” तीनों ही विश्वासी थे, पर वास्तविक व्यवाहरिक विश्वास का जीवन सिर्फ एक में ही था। हाँ मेरे प्यारे पाठक, आप क्या अपने लिये ही जीते हो, और क्या अपने लिये ही सोचते हो?

स्वार्थ हमारे बचपन का साथी है। हमें बस अपने मतलब से ही मतलब रहता है। स्कूल से सवेरे ही वापस लौटता लड़का बड़ा ही खुश था; माँ को बतलाया “ममी छुट्टी हो गयी।” माँ ने खुशी से कूदते बच्चे से पूछा, “बेटा छुट्टी क्यों हो गयी?” बेटा बोला, “ममी, हमारी मैडम की ममी मर गयी।” माँ ने अपना सिर पकड़ लिया। बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर हिलाते हुए पूछा, “ममी-ममी क्या हमारी मैडम के डैडी अभी ज़िंदा हैं?” उसे एक और छुट्टी का इन्तज़ार था। इसी तरह से हम भी अपने मतलब के बारे में ही सोचते हैं। आज कितने सीना ठोक के गवाही देते हैं कि जीवन बदल गया, पर उनके सोच और स्वभाव में वही पुराना स्वार्थ सजा है। सच मानिए, अनपढ़ लोग भी ऐसों की ज़िन्दगी को आसानी से पढ़ लेते हैं। आप अपने बारे में कुछ भी कहते सोचते रहें, लोग आपके बारे में क्या कहते सोचते हैं? आपका दूसरों को बताते रहना कि मैंने यह किया या वह किया, सब आपका घमंड है जो आप में से बह रहा है; लोग तो आपके जीवन को पढ़ते हैं।

कहा जाता है कि सिकन्दर जब हिन्दुस्तान को जीतने के लिए चला तो पहले वह एक डायोजनीज़ नामक यूनानी फकीर से मुलाकात के लिए गया। फकीर वास्तव में फकीरी की हालत में जीता था। सेहत से तो बिल्कुल चिल्गोज़े की औलाद सा दिखता था पर बात सटीक और कड़क करता था। सिकन्दर ने उसके पास पहुँच कर उसे अपना परिचय दिया, “क्या तुम जानते हो मैं सिकन्दर महान हूँ?” फकीर बोला, “जो अपने आप को महान सोचता है, वह व्यक्ति कभी महान हो ही नहीं सकता।” ऐसे सीधे और साफ शब्द सिकन्दर नें कभी नहीं सुने थे; बल्कि किसी की हिम्मत ही नहीं थी जो सिकन्दर को ऐसा जवाब दे सके। वह तो चापलुसों और खुशामद करने वालों से घिरा रहता था। उसे लगा यह पहला ऐसा आदमी है जो ऐसा साफ सच कहने की हिम्मत रखता है और अपनी बात बिना मिलावट के कह भी देता है। उस समय वह फकीर ज़मीन पर पड़ा धूप सेक रहा था। सिकन्दर ने फकीर से कहा, “डायोजनीज़, कहो मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? तुम बूढ़े हो रहे हो, क्या एक घर बनवाकर तुम्हारी सेवा के लिए नौकर रखवा दूँ?” डायोजनीज़ बोला, “ अगर कुछ करना चाहते हो तो मेरे लिए इतना करो कि ज़रा हट कर खड़े हो जाओ। मेरी धूप मुझ से न छीनो। तुम खतरनाक आदमी मालूम पड़ते हो। तुम बहुतों का बहुत कुछ छीनने निकले हो और बहुतों के जीवन छीन लोगे। संसार को जीत लोगे पर शान्ति से कभी न जी पाओगे।” सिकन्दर दिल सख़्त करके यह दिल को छूती हुई बात सुनकर भी उसे टाल गया और उसके पास से चला गया। हिन्दुस्तान से सिकन्दर की लाश लौटी, उसकी जीत एक तरफ रह गयी। वास्त्विक विश्वास हमें नम्र बनाता है, घमंडी नहीं - आपका अपने बारे में क्या विचार है? “मन फिराओ, क्योंकि परमेश्वर का राज्य निकट है।”

इन बुरे दिनों में सबसे बुरी बात यह है कि ज़्यादतर विश्वासी विश्वास योग्य और ईमान्दार नहीं हैं। खरे कम, खोटे ज़्यादा हैं। कुछ तो मण्डली पर कलंक बन कर रहते हैं और मण्डली पर बोझ बन कर जीते हैं। वे विरोध और जलन से भरे रहते हैं, जबकि एक वास्त्विक विश्वासी अपने शत्रुओं का भी बुरा नहीं सोच सकता क्योंकि बाईबल उससे कहती है कि शत्रुओं का भी भला कर, बुराई को भलाई से जीत ले। परमेश्वर का वचन हमें विरोध और जलन की जगह ही नहीं देता है। आप अच्छी तरह से जानते हैं कि आपके मन में किन-किन के प्रति विरोध और जलन भरी है, और कितनों का बुरा देखने का आप इंतिज़ार कर रहे हैं। आपके सीने में ऐसे संपोले हैं जिन्हें आपने यदि अभी नहीं निकाला तो एक दिन वे आपको भयानक ताड़ना में झोंक देंगे। शैतान शुरू से ही ऐसे संपोले भाईयों के जीवन में बोता आया है। बाईबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति में ही देख लें, उसने हाबिल और कैन में, इसहाक और इशमाएल में, याकूब और एसाव में, याकूब और उसके भाइयों में कैसा बैर बोया। यूसुफ के भाईयों ने उसे बेच डाला और मुसीबतों में ढकेल दिया। अन्ततः जब वह मिस्र का प्रधान मंत्री बना तो उसके पास अपने उन भाईयों से सब बातों बदला लेने की पूरी सामर्थ थी, मौका था और कारण था। अगर नहीं था तो बस बदला लेने का स्वभाव नहीं था। यूसुफ ने ऐसे भाईयों को जो माफी के लायक ही नहीं थे, न सिर्फ माफ किया वरन उसने सदा उनका भला ही किया। उसने बुराई को भलाई से जीत लिया।

मेरे प्यारे पाठक, क्या आपके पास ऐसा दिल है कि आप उन्हें माफ कर सकें जिन्होंने आपके साथ बहुत बुरा किया या कहा हो? यदि ऐसा करने की क्षमता नहीं है तो प्रभु से माँगिए और कहिए “हे प्रभु मुझे ऐसा दिल दें कि मैं उन्हें माफ कर सकूं और ऐसा मौका दें कि मैं इनकी कोई भलाई कर सकूं ।” ऐसा करने के अलावा एक सच्चे विश्वासी के पास कोई दूसरा रासता है ही नहीं। जो क्षमा दे नहीं सकते उन्हें परमेश्वर से क्षमा पाने का भी कोई हक नहीं है। क्रूस पर से की गयी प्रभु की पहली प्रार्थना उन्हें क्षमा देने की थी जो क्षमा करने के लायक कतई न थे और न ही क्षमा माँग रहे थे, वरन भयानक पीड़ा उठा रहे निर्दोश प्रभु का ठठा कर रहे थे। उनके लिए प्रभु के शब्द थे, “ऐ बाप इन्हें क्षमा कर।”

“झटपट मेल-मिलाप कर लें कहीं ऐसा न हो... (मत्ती ५:२९)।” कहीं कुछ ऐसा न हो जाए जो आपके सहने की सीमा से बाहर हो और मौका निकल जाए। “बिना मेल-मिलाप के और बिना पवित्रता के परमेश्वर को कदापि देख नहीं सकते...(इब्रानियों १२:१४)।” “धन्य हैं वे जो मेल करवाने वाले हैं, क्योंकि वो परमेश्वर के पुत्र कहलाएंगे (मत्ती ५:९)।” “हमें मेल-मिलाप की सेवा सौंप दी है। (२ कुरिन्थियों ५:१८)”

ये जगत परमेश्वर का शत्रु है “सारा जगत शैतान के चंगुल में है (१ युहन्ना ५:१९)” लेकिन “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि अपना इकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वो नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए। (युहन्ना ३:१६)”

आखिर घटियापन की भी कोई हद होती है। कितने विश्वासी विरोध से, बैर से भरे पड़े हैं, पर प्रचार बड़े ज़ोर से करते हैं। आप परमेश्वर की आवाज़ सुन कर भी नहीं मानते तो तैयार रहिए, परमेश्वर का कुल्हाड़ा बस जड़ पर रखा है “मन न फिराएंगे तो मैं उन्हें बड़े क्लेश में डालूंगा (प्रकाशितवाक्य २:२२)”। जब ऐसा होगा तो उनका क्या होगा जो ढिटाई की आत्मा से बंधे हैं, ऐसे लोगों के लिए तगड़ी ताड़नाएं तैयार हैं।

एक विश्वासी ने प्रार्थना में प्रभु से अपना दुखः बयान किया कि “हे प्रभु लोग मुझे मण्डली में ग्रहण नहीं करते, और अब तो उन्होंने मुझे मण्डली से बाहर भी निकाल दिया है।” प्रभु ने कहा, “तेरे साथ तो यह आज किया गया है, मैं तो १० साल से उस मण्डली में जाने का प्रयास कर रहा हूँ, पर वे मुझे आने ही नहीं देते”! यह शायद आपको मज़ाक लगे, पर यह बात वचन के अनुसार सच है। लौदीकिया की मण्डली ने प्रभु को बाहर निकाल दिया था और वह अन्दर आने के लिए द्वार खटखटा रहा था (प्रकाशित्वाक्य ३:२०)। यह प्रभु की दया ही है कि वो छोड़कर चला नहीं गया। वह अब भी लोगों के दिलों पर खटखटा रहा है, इस इन्तज़ार में कि कोई तो होगा जो उसकी आवाज़ सुनकर अपने दिल का द्वार उसके लिए खोलेगा।

प्यारे पाठक, क्या आप आज उसकी आवाज़ सुनकर उसके वचन के लिए अपना दिल खोलेंगे? सच मानिएगा ऐसा करने से आपकी सारी हार एक नई जीत में बदल जाएगी। परमेश्वर ने आपके लिए एक बड़ी भलाई सजाकर रखी है, बस आप अपनी बुराई से फिरने को तैयार हों। परमेश्वर ने आपको आपकी हालत दिखाकर आपकी आँखें तो खोल दी हैं, बस अब प्रार्थना के लिए आप अपना मूँह खोल दीजिएगा।

अब प्रभु से दूरी न बनाए रखिएगा। ख़तरे काफी करीब हैं, बस मन की दूरी को आज दूर कर डालें। पाप का पिता, शैतान, बहुत पास ही खड़ा है। वह कभी नहीं चाहता कि आप मेल-मिलाप कर लें। यह तो सच है कि अपमान को पी कर क्षमा देना सहज नहीं। हमारा अहंकार हमें माफी देने और माफी मांगने से हमेशा रोकता है। किंतु प्रभु की सामर्थ से यह संभव है। प्रभु हमें कुछ ऐसा करने को नहीं कहता जो उसने स्वयं ना किया हो और जिसकी सामर्थ वह हमें ना देता हो। बस वही उसके हैं जो उसका वचन सुनते और मानते हैं (लूका ८:२१)। जो उसका वचन सुनकर मानते नहीं, उनका प्रभु से कोई रिशता नहीं है, प्रभु कहता है “जब तुम मेरी बात नहीं मानते तो तुम मुझे हे प्रभु हे, प्रभु क्यों कहते हो? (लूका ६:४६)” आप, हाँ आप ही, आज उसकी आवाज़ को सुनकर मानेंगे या टालेंगे?

मेहरबानी से प्रार्थना कीजिए कि हम सम्पर्क को सही समय पर आपके पास पहुंचा सकें। हमें आपके सुझाव और सुधार से भरे पत्रों का इन्तज़ार रहेगा।

बुधवार, 13 मई 2009

सम्पर्क दिसंबर २००६: कहानी कहती है

एक नास्तिक बड़ा धुँआधर भाषण दे रहा था। वह यह साबित करने में लगा हुआ था कि परमेश्वर, आत्मा-सात्मा यह सब बातें बक्वास हैं; “परमेश्वर” आदमी के डर की उपज है। उसने मेज़ पर हाथ मार कर पूछा, ‘यह क्या है?’ लोगों ने कहा ‘मेज़’। उसने कहा, ‘मेज़ इसलिए दिखाई दे रही है, क्योंकि यहाँ मेज़ है; अगर नहीं होती तो नहीं दिखती। हर वस्तु इसलिए दिखाई दे रही है, क्योंकि वह है। अगर परमेश्वर होता तो दिखता; क्योंकि नहीं है इसलिए दिखता नहीं है। आत्मा होती तो दिखती।’ तभी एक साधारण सा व्यक्ति उसकी बगल में आ खड़ा हुआ, और लोगों से बोला, ‘इन नास्तिक महाशय का सिर आपको दिखाई दे रहा है?’ लोगों ने कहा ‘हाँ।’ उसने कहा, ‘यह इसलिए दिखाई दे रहा है क्योंकि इन महाश्य के पास सिर है। अब इस सिर में आपको इनकी बुद्धी दिखाई दे रही है?’ लोगों ने कहा ‘नहीं।’ उसने कहा अगर होती तो दिखाई देती।’

यह कहानी इस बात को कहती है कि बहुत सी चीज़ें होती हैं पर दिखती नहीं। हवा होती है पर दिखती नहीं। हमें उसके काम और सामर्थ दिखाई देती है। प्रेम होता है पर दिखता नहीं; लेकिन हमें उसका काम दिखते हैं और अनुभव होता है। परमेश्वर है, पर दिखता नहीं; पर उसक प्यार और सामर्थ हर जगह दिखती है। परमेश्वर प्रेम है, उसमें दया है, क्षमा है और सामर्थ है।

स्वदेशी परमेश्वर, विदेशी परमेश्वर
अंग्रेज़ों की बनाई तसवीर में परमेश्वर अंग्रेज़ सा दिखाई देता है। चीनी लोगों की बनाई तसवीर में परमेश्वर चीनी सा दिखाई देता है। भार्तीय चित्रों में परमेश्वर हिन्दुस्तानी दिखता है। तो वास्तव में परमेश्वर का कौन सा रूप है? सच मानिए, न तो परमेश्वर स्वदेशी है, और न ही विदेशी। हम परमेश्वर को किसी भी जाति या धर्म के दायरे में नहीं बांध सकते। वह किसी विशेष धर्म का नहीं है और न ही उसका कोई विशेष धर्म है। परमेश्वर संसार के धर्मों से कहीं विशाल है।

सच तो यह है कि हम धर्म को पूजते हैं। धर्म और धर्मगुरू हमारा उपयोग मन माने ढंग से करते हैं। हर धर्म दूसरे धर्म को तुच्छ जानता है। पर परमेश्वर का वचन कहता है, “...परमेश्वर किसी को भी तुच्छ नहीं जानता (अय्युब ३६:५)।” परमेश्वर ने हमें इस पृथ्वी पर इन्सान बनाकर भेजा; पर हमने इन्सान को हिन्दू, मुस्लमान, सिख और इसाई बना डाला। अब आदमी कभी यह नहीं सोचता कि मैं एक इन्सान हूँ। बल्कि वह सोचता है कि मैं इसाई हूँ, हिन्दू हूँ, मुस्लमान हूँ, सिख हूँ। आज के इन्सान के इस स्वरूप ने सारी इन्सानियत को ही बरबाद कर डाला।

हमारे धर्मों का स्वभाव है कि वह हमारे मनों में दूसरे धर्मों के प्रति नफरत के बीज बोते हैं। इन्ही नफरत के बीजों का फल विश्व का हर देश उग्रवाद और आतंक्वाद के रूप में काट रहा है। धर्म तो एक से हैं, हाँ बिमारी तो एक ही है; बस नाम अलग अलग हैं।

कुछ वर्षों पहले की बात है, दो धर्मों के अनुयायियों के बीच मार-काट मची हुई थी। एक मुहल्ले में एक धर्म के लोगों ने दूसरे धर्म के मानने वाले परिवार को चारों ओर से घेर कर सुलगती आग में डाल दिया। सुलगते लोग, चीखते चिल्लाते, हाथ पैर मारते, ज़मीन को पीटते हुए जल रहे थे। चारों ओर दूसरे धर्म के लोग खड़े हुए देश्भक्ति और धर्मभक्ति के नारे लगा रहे थे। तभी उन्में से एक झुल्सा हुआ बच्चा आग से निकल्कर बाहर भागा। तुरन्त कुछ लोग उसके पीछे भागे और पकड़ कर फिर उसी आग में धकेल दिया। ज़रा सोचिए तो सही, ये कैसी भक्ति है? क्या परमेश्वर ऐसे भक्तों से और ऐसी भक्ति से प्रसन्न होगा? या फिर यह सब देखकर दु:खी होता होगा?
ज़ंज़ीरें भी ज़ेवर दिखती हैं
हमारे धर्म हमें आज़ादी का पैग़ाम देकर हमें ग़ुलाम बना लेते हैं। धर्मों के ये पिंजरे बड़ी होशियारी से बनाए जाते हैं। रीति रस्मों की ज़ंज़ीरों में बन्धे हम ज़िंदगी भर धर्म की बंधुआई में जीते हैं। हम इन रीति रस्मों की ज़ंज़ीरों को ज़ेवरों की तरह पहनते हैं, और कतई उतारना नहीं चाहते। जन्म से ही हम धर्म की कैद में जीते हैं। कैद की दीवारें चाहे ईंट पत्थर की हों या संगमरमर की, कैद तो कैद ही है। हथकड़ी लोहे की हो या सोने की, है तो हथकड़ी ही। ये द्वार नहीं, दीवारें हैं कैद की। आदमी धर्म की ऐसी ज़ंज़ीरों की गुलमी में जीवन की आज़ादी का आनन्द कभी न लेने पाएगा। हमारे आज के धर्मों का यही स्वभाव हमारी सद्-बुद्धी को अंधा कर डालता है।

एक धर्म और दूसरे धर्म के बीच जो फासले हैं, मनुष्य और दूसरे मनुष्य के मनों के बीच जो दूरियाँ हैं, प्रभु यीशु उन्हें दूर करने आया। वह हमें कोई नया धर्म देने नहीं आया पर एक नया जीवन देने आया। बहुतायत और आनन्द से भरपूरी का जीवन देने आया। पर जब भी यह मसीही जीवन, मसीही धर्म में बदल जाता है, तब यह भी और धर्मों की तरह ही हो जाता है।

इतनी बढ़िया एक्टिंग
आज की राजनीति में कोई काम कभी भी बिना लाभ के नहीं किया जाता। हर राजनीति की दुकान पर अलग-अलग सामान सजा कर रखा गया है। जैसे- दलित उत्थान, आरक्षण, मन्दिर-मसजिद, धर्म परिवर्तन, म़ज़दूर आंदोलन इत्यादि। ये सब सामान बेचकर वोट कमाए जाते हैं। इन्हीं वोटों से उन नेताओं पर नोटों की बारिश होती है। हमारे नेता, अभिनेताओं से भी ऊँचे कलाकार होते हैं। एक बार एक मश्हूर फिल्म अभिनेता से एक पत्रकार ने पूछा, ‘आप अभिनेता से नेता क्यों नहीं बन जाते?’ अभिनेता का जवाब था, ‘मैं इतनी बढ़िया एक्टिंग नहीं कर सकता जो नेता बन पाऊँ।’

देश के ये अगुवे देश पर किसी भी ऐसी आफत के आने का इन्तज़ार करते रहते हैं, जहाँ उन्हें पैसा कमाने और विरोधी दल पर दोष लगाने का मौका हाथ लगे। अगर वे किसी पर दया भी दिखाते हैं तो सिर्फ नाम कमाने के लिए। वे राजनीति तो पद, प्रतिष्ठा और पैसा पाने के लिए ही करते हैं। दोष लगाने के लिए दोष ढूँढते हैं। उन्हें स्वयं ऊँचा उठने के लिए, दूसरों को नीचा दिखाना ज़रूरी होता है। देश के जब ऐसे दोस्त हों तो फिर दुशमनों कि क्या ज़रूरत है!

धर्म और राजनीति में ही नहीं, पर हमारे परिवारों में भी एक बड़ा बुरा बिखराव पनप रहा है। एक दार्शनिक से एक पत्रकार ने पूछा, ‘आजकल पति-पत्नियों में अधिकांश्तः अच्छे संबन्ध नहीं देखे जाते। तलाकों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ती जा रही है। इसका मुख्य काराण क्या है? दारश्निक ने बड़े नाटकिय ढंग से उत्तर दिया, ‘तलाक का मुझे एक ही कारण नज़र आता है, और वह है शादी। न शादी होगी, न तलाक होगा। न बांस होगा न बांसुरी बजेगी।’ लेकिन वास्तव में इस सम्स्या का मुख्य कारण तो हमारा बुरा स्वभाव, अहंकार, लालच और हमारा व्यभिचार है। सच्चाई तो यह है कि तलाक भी दो तरह के होते हैं। एक कानूनी तौर पर और दूसरा मन से - अर्थात पति-पत्नि साथ तो रहते हैं, पर मन से उन दोनों का तलाक हो चुका होता है। साथ तो इसलिए रहते हैं क्योंकि उनके पास बच्चे हैं। बच्चों का क्या होगा? समाज क्या कहेगा? या फिर कुछ आर्थिक या अन्य कारण हो सकते हैं। ऐसे परिवार बड़े तनाव में जीते हैं। इनमें से ७० प्रतिशत में झगड़े उनके आपसी अहंकार के कारण होते हैं, क्योंकि वे आपस में एक दूसरे से माफी मांगने और देने को तैयार नहीं होते। ३० प्रतिशत में व्यभिचार और अन्य कारण हो सकते हैं। हमारे इन्हीं पापों ने हमारे घरों को नर्क समान बना रखा है।

सास मरे तो साँस आए
एक जवान स्त्री घबराई और सहमी सी अपनी सहेली के पास आई, लम्बी सी साँसों से कहने लगी, ‘बहन क्या बताऊँ, आज एक ऐसी कहानी पढ़ी कि डर और दहशत से दिल अभी तक तेज़ धड़क रहा है। सच मान बहन कोई और यह कहानी पढ़ लेता तो उसका तो कब का हार्ट फेल हो गया होता।’ सहेली उसे शब्दों से सहलाती हुई बोली, ‘बहन घबरा मत, मैं तेरे लिए चाए बनाकर लाती हूँ, तब तक तू यह कहनी मेरी सास को सुना दे।’ बहु सोचती है कि जब उसकी सास मर जाएगी तो उसके घर में शान्ति आ जाएगी। वह इस शान्ति के इंतिज़ार में अशान्त जीती है। पर यही बहु खुद कुछ सालों में सास बन जाएगी और सिलसिला यूँ ही ज़ारी रहेगा। सास के मरने से शान्ति नहीं आ पाती, जब तक वह पुराना स्वभाव न मरे।

मुस्कुराहट या मक्कारी
परमेश्वर का वचन आपकी ही नहीं, मेरी भी छिपी हालात को प्रकट करता है। मैं एक घिसा-पिटा अड़तीस साल पुराना प्रचारक हूँ; इस प्रचारक के पास एक एकलौती और पुरानी पत्नि भी है। कभी कभी हम दोनों में काफी गहमा-गहमी हो जाती है। हाँ यह बात है कि प्रभु की दया से बात गाली-गलौज या मार-पीट तक कभी नहीं पहुँचती, बस आपसी बोल-चाल बन्द हो जाती है। लेकिन मन फिर भी पलटा देने और बदला लेने की युक्ति सुझाता रहता है कि इसे मैं कैसे सबक सिखा दूँ। ऊपर से तो सब शान्त दिखता है पर अन्दर मन में धक्का-मुक्की चलती रहती है। ऐसे समय में यदि कोई मेहमान हमारे घर आ जाए तो हमारे बदले रंग देखते ही बनते हैं। अचानक हम दोनों मूँह पर बड़ी मधुर मुस्कान लिए आपस में प्यार से बातें करने लगते हैं और प्यार भरे शब्दों से माहौल को महकाने लगते हैं। आए हुए मेहमान का बड़ी गर्मजोशी से स्वागत होता है, हाल चाल पूछे जाते हैं। जब मेहमान हमसे हमारा हाल और खैरियत पूछते हैं तो हम मुस्कुराते हुए कहते हैं, “हाँ भाई, प्रभु की दया से सब ठीक है।” पर अन्दर की सच्चाई तो कुछ और ही है, सब ठीक कहाँ है। वास्तव में हमारी मुस्कुराहट मक्कारी होती है। यह हमारे जीवन की सच्चाई है, पर हम इस मक्कारी को मक्कारी नहीं कहते। सच तो यह है कि हमारे स्वभाव में ही मक्कारी है। हमारे अन्दर के विचार और बाहर के व्यवहार में बहुत अन्तर होता है। परमेश्वर का वचन कहता है कि हम स्वभाव से ही पापी हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता, हम किसी भी धर्म के हो सकते हैं, किसी भी पद और परिवार के हो सकते हैं, पर हम सब स्वभाव से पापी हैं।

बंदे का धंधा मन्दा चल रहा है
आदमी राजा हो या रंक, पर घमंड हमारे स्वभाव का एक स्थाई तत्व है। कहीं किसी ने यह कहनी कही- दो भिखारी आपस में बतिया रहे थे। एक भिखारी ने अपना रोना रोया, “भाई जी, बस क्या बताऊँ, धंधा तो मंदा चल रहा है। लोगों के सामने हाथ फैलते ही वो अपनी आंखें फैला लेते हैं। पैसे देते नहीं, उपदेश देने लगते हैं। न दान, न दया और न प्यार रहा है। पैसे पर ऐसी पकड़ आ गयी है कि कोई किसी को दान देने को तैयार ही नहीं। हमारी तो कोई इज्ज़त ही नहीं बची। पुलिस तो ऐसा व्यवहार करती है कि जैसे हमारे ही लिए रखी गई हो।” दूसरा भिखारी बोला, “तो धंधा क्यूँ नहीं बदल लेते?” पहला बोला, “ अबे यार, मैं इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं हूँ।” कितना अहंकार था इस भिखारी बंदे को अपने धंधे पर। अहंकार किसी को भी अछूता नहीं छोड़ता। हर आदमी सोचता है कि वो कुछ खास है, भले ही कुछ खासियत हो या न हो। हर कोई चाहता है कि उसकी बात को वज़न दिया जाए, उसे महत्व दिया जाए। आप अपने आप को खास आदमी समझते रहिये, पर इससे आप खास आदमी नहीं बन पाएंगे। हमें अपनी असलियत अवश्य समझ लेनी चाहिए। परमेश्वर का वचन कहता है, “...और सुन तो ले तेरा जीवन है ही क्या (याकूब ४:१४)।”

अत्याधुनिक विज्ञान आपका रंग, नाक, कान, और आँख बिल्कुल बदल सकता है, पर आपका स्वाभाव कभी नहीं बदल पाएगा। जलन, क्रोध, लोभ और व्यभिचार का पागलपन, जो अन्दर छिपा है, उससे कभी छुटकारा नहीं दिला पाएगा।

अन्दर का गणित
हम सबके अन्दर का गणित एक सा ही होता है। अन्दर से हम सब लालची, व्यभिचारी, क्रोधी, घमंडी और बदला लेने के भाव से भरे होते हैं। ये ही सब पाप हमारे जीवन की हर खुशी हम से छीन लेते हैं। इसलिए हर आदमी बेचैन और परेशान है। सारा संसार शान्ति लाने के प्रयास में जुटा है। शान्ति सभाएं, शान्ति के नारे, शान्ति की योजनाएं, शान्ति वार्ताएं और शान्ति संगठन। हर देश का हर एक नेता शान्ति लाने की बात करता है। सरकारें प्रयास करती हैं। धर्म और धर्म गुरू शान्ति देने के दावे करते हैं। पिछले छह हज़ार वर्षों में शान्ति लाने का हर प्रयास न केवल असफल ही हुआ है, वरन, सारे संसार में अशान्ति महामारी की तरह बड़े विकराल रूप से हर आदमी को बेचैन किये खड़ी है। इस बीमारी के बाहरी इलाज तो बहुत किये गये हैं, पर बेचैनी तो आदमी के मन की उपज है, इसलिए इलाज तो मन का होना चाहिए। अगर मन परिवर्तन नहीं हुआ तो कुछ भी परिवर्तन नहीं होने वाला।

हमारे समाज के हर हिस्से में बुराई भरी पड़ी है। कोई घर, कोई शहर, कोई प्रदेश या कोई देश ऐसा नहीं जो इससे ग्रसित न हो। वास्तव में बुराई हमारी व्यवस्था में नहीं, हमारे मन में है। परमेश्वर का वचन कहता है, बुराई तो मनुष्य के मन से निकलती है (मरकुस ७:२१-२३)। यह असाध्य रोग मन में ही है (यर्मियाह १७:९)। हर बुराई मानवीय मन के गर्भ में ही जन्म लेती है। इसलिए ज़रूरत मन मरम्मत की नहीं, मन परिवर्तन की है। इसीलिए परमेश्वर मन परिवर्तन की बात करता है, धर्म परिवर्तन की नहीं। क्योंकि मानव को धर्म की नहीं, मन परिवर्तन की ही आवश्यक्ता है। इसीलिए प्रभु कहता है, मैं तुम्हें एक नया मन दूँगा (यहेजकल ३६:२६)। ऐसा मन जो प्यार कर सकता है, दया कर सकता है और जो क्षमा कर सकता है। जो शान्त रह भी सकता है और शान्ति दे भी सकता है।

अंधकार के पास यह अधिकार है कि वह आदमी को अंधा कर डालता है, आंखों वालों को भी! पाप का अंधकार तो उन्हे ऐसा अंधा कर डालता है कि उन्हें पाप करते हुए एहसास ही नहीं होता कि वे पाप कर रहे हैं। अगर आपको क्रोध बहुत जलदी आता है, तो आप एक अहंकारी व्यक्ति हैं और आप में सहनशीलता नहीं है। आप में बदला लेने का भाव बहुत तीव्र है। इसी तरह आदमी लालच से, क्रोध से और व्यभिचार से भरा पड़ा है। उसे गाली देते हुए, व्यभिचार करते हुए और रिशवत लेते-देते हुए एहसास ही नहीं होता कि उसने कुछ ग़लत किया है या पाप किया है। हमें अपनी हर बुराई में कोई बुराई दिखाई नहीं देती। पाप के अंधेरे ने आदमी को ऐसा अंधा किया कि उसका सारा जीवन ही अंधेरा हो गया। सारा संसार ऐसे अंधेरों से भरा पड़ा है और अंधेरे से भरे संसार में अंधेर्गर्दी फैली पड़ी है। अब जो मनुष्य अंधेरे में जीता है, वह अंधेरे में मर कर हमेशा के अंधेरे में चला जाएगा।

शब्दों की आड़ में...
आज के इन्सान ने इन्सानियत को पैरों से कुचल डाला है। हैवानियत को पहन कर अपनी ही बरबादी के लिए तैयार खड़ा है। अब संसार अपने आखिरी सालों में जी रहा है। संसार के साथ वह कुछ होने जा रहा है जो समझने और सहने से बाहर होगा। सम्पर्क तो आपको जगाने और जताने के लिए लाया गया है कि आप परमेश्वर की बर्दाश्त को तुच्छ न जानो। सच मानिए, परमेश्वर साक्षी है, हम शब्दों की आड़ में छिप कर किसी धर्म का प्रचार कतई नहीं करते। एक ऐसे सत्य का प्रचार कर रहे हैं कि पापों की क्षमा पाने के लिए आपको कोई धर्म बदलने की कतई आवश्यक्ता नहीं है। धर्म की बाहरी पर्तों से आदमी के अंदर का आदमी कभी परिवर्तित नहीं होता। आप एक के बाद एक धर्म परिवर्तन करते जाएं, पर जीवन में एक भी परिवर्तन नहीं पाएंगे - भले ही आप जयिकशन से जैक्सन क्यों न बन जाएं।

गधों को माई बाप बोलो...
एक बुरी खुशी होती है जो बुराई करने से मिलती है, दूसरों को नुकसान पहुँचाने से मिलती है, दूसरों को बेवकूफ बनाने में मिलती है, दूसरों से अपनी झूठी प्रशंसा सुनने में मिलती है। गधे का अर्थ हमेशा गधा नहीं होता। कई बार कई आदमी भी गधे होते हैं। वे किताबों के सहारे बहुत सारा ज्ञान तो बटोर लेते हैं, भाषा को सुंदर शब्दों से संजो भी लेते हैं; परन्तु ऐसे ज्ञानवान लोग भी कई बार बड़ी नासमझी कर जाते हैं। एक अनपढ़ आदमी बहुत समझदार हो सकता है और एक पढ़ा-लिखा बहुत नासमझ; क्योंकि समझ और ज्ञान में अन्तर है। जब पढ़े लिखे गधों को बड़े पदों के साथ बड़ी प्रशंसा दी जाती है तो ऐसी प्रशंसा उनके अहंकार को बहुत भाती है। अगर ऐसा न होता तो मक्खन लगाना, यानि खुशामद करना इस संसार से कब का समाप्त हो जाता। प्रशंसा चाहे झूठी हो या सच्ची, हमारे अहंकार को उससे बड़ी खुशी मिलती है, लेकिन यह खुशी बुरी है। लोग जानते हैं कि मौका बार-बार हाथ नहीं लगता। इसलिए, जितना लग सके मक्खन लगा दो, गधों को माई-बाप बोलो और काम निकालो-क्या फर्क पड़ता है? इसी तरह कुछ लोग पद, पैसा, यश और कीर्ति कमाने के लिए सारा जीवन लगा देते हैं। “और दुष्ट, और बहकाने वाले धोखा देते हुए, और धोखा खाते हुए बिगड़ते चले जाएंगे (२ तिमुथियुस ३:१३)।”

अक्सर एक बड़ी भीड़ यीशु को घेरे खड़ी रहती थी। एक भ्रष्ट आयकर अधिकारी प्रभु यीशु को देखना चाहता था, पर भीड़ के कारण यीशु को देख नहीं पा रहा था। परमेश्वर का वचन इन शब्दों के सहारे एक सच्चाई को हमारे सामने रखता है। धर्म की बड़ी भीड़ ने प्रभु यीशु की सच्चाई को छिपा रखा है। लोग उस भीड़ को तो देख पाते हैं पर यीशु को नहीं - धर्म और धर्म के अनुयायियों को देख पाते हैं, पर सच्चाई को नहीं। सच तो यह है कि प्रभु यीशु पापियों के लिए आया, किसी विशेष धर्म के लोगों के लिए नहीं। न ही उसने किसी धर्म विशेष के लोगों से प्रेम किया, पर जगत से ऐसा प्रेम किया। वह हर एक धर्म के हर एक व्यक्ति को प्यार करता है क्योंकि वह किसी विशेष धर्म से बंधा नहीं है।

कहा जाता है कि अगला विश्व्युद्ध धर्म के नम पर ही लड़ा जाएगा। बदला लेने का यह भाव ही आतंक्वाद है। हमारे इन्हीं मानवीय पापों ने ही विश्व को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया है। परमेश्वर का वचन कहता है कि “यदि मन न फिराओगे तो इसी तरह नाश हो जाओगे” (लूका १३:५)। मन फिराने का अर्थ है पाप से क्षमा मांगना और विश्वास करना कि प्रभु यीशु पापों की क्षमा देता है। इसलिए ही उसने क्रूस पर अपनी जान दी फिर तीसरे दिन जी उठा, और उसका लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।

अजीब जूता
आम आदमी सत्य से ज़्यादा जादू-टोने और गंडे-तावीज़ों इत्यादि पर अधिक विश्वास करता है। मैं एक घटना आपको अपने शब्दों में बताना चाहता हूँ। मैंने अकसर ट्रकों के आगे और पीछे पुराने जूते टंगे देखे हैं। पुराने जूतों को आगे-पीछे टांगने के पीछे के रहस्य को जानने के लिए मैंने एक ट्रक ड्राइवर से पूछा, ‘ड्राइवर साहब इस तरह ट्रकों पर पुराना जूता लटकाने का क्या मतलब है?’ ड्राईवर ने जवाब दिया, ‘जनाब, जूता लटकाने से एक्सीडैंटों से सुरक्षा मिलती है।’ मैंने कहा, जब एक्सीडैंट होता है, हर ड्राईवर जूता पहने होता है, हर ट्रक से टकराता व्यक्ति भी जूता पहिने होता है; फिर भी रोज़ एक्सीडैंट होते हैं?’ तब ड्राइवर साहब का बड़ा ही मज़ेदार जवाब था-‘जनाब, जूता पहनने से नहीं, लटकाने से उसकी तासीर बदल जाती है।’ बड़ा ही अजीब विश्वास है; रोज़ जूता टंगे ट्रकों का एक्सीडैंट देखता है, फिर भी सुरक्षा के विश्वास से जूता लटकाए फिरता है!

गालियाँ घोल कर पिलाईं...?
जब हम कहते हैं कि मुझे क्रोध आ गया, तो यह हमारी भाषा की गड़बड़ है। क्रोध बाहर से नहीं आता, क्रोध तो अन्दर से निकलता है। जब हालात बनते हैं, क्रोध बाहर निकल आता है। जैसे देखा गया है कि शराबी आदमी विपरीत हालात में गालियाँ बकने लगता है। क्या उस शराबी को शराब में गालियाँ घोल कर पिलाई गयी थीं? ऐसा नहीं था, गालियाँ तो उसके मन में पहले से ही बसीं थीं। शराब ने तो उन्हे केवल सहारा दिया और वह बाहर बह निकलीं। इसी रीति से जलन, द्वेश, घमंड और व्यभिचार आदि सब मन में ही भरा रहता है, बस मौका मिलने पर अन्दर से बाहर आ जाता है। पेट की गड़बड़ी तो डॉक्टर ठीक कर सकता है, पर मन की गड़बड़ी का कोई इलाज नहीं। आदमी को अच्छा बनाने के लिए हमारे धर्मों, शिक्षा और सरकार ने सारे जुगत और जुगाड़ किये हैं। संसार कितना ही विकसित क्यों न हो जाए और संसार के सारे शहर क्यों न सुधार दिये जाएं, पर आदमी और उसका मन कभी नहीं सुधरेगा। मन सुधारने की सामर्थ न तो किसी सरकार में है न किसी कानून में। आप जो यह मेरा लिखा हुआ पढ़ रहे हैं, आपको बहुत अच्छा लग सकता है, पर यह आपको अच्छा बना नहीं सकता। यह प्रचारक कोई उपचारक तो नहीं है।

हम यदि आप से कहें कि आप क्रोध, ईर्ष्या, द्वेश और लालच छोड़ दें, तो यह उसी तरह होगा जैसे किसी कैंसर के मरीज़ से कह जाए कि वह अपना कैंसर छोड़ दे। यदि वह छोड़ सकता होता, तो कभी का कैंसर को छोड़ चुका होता। स्वर्ग और पृथ्वी में एक ही नाम है जो सब कुछ सुधार सकता है, जो आपके जीवन को सँवार सकता है - यीशु नाम; “क्योंकि पृथ्वी के ऊपर और स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में केवल एक नाम दिया गया है जिसके द्वारा उद्धार है” (प्रेरितों ४:१२)। सिर्फ एक प्रार्थना सब कुछ बदल देगी। परख कर तो देखिए, कह कर तो देखिए - ‘हे यीशु मुझ पापी पर दया करें; मेरे पाप यीशु नाम में क्षमा करें।’

ये ही पाप हैं जिन्होंने हमारे जीवन को, परिवारों को, समाज को, और संसार को नरक बना दिया है। ये ही पाप एक दिन हमें अनन्त नरक में भी धकेल देंगे। अनन्त का अर्थ है जिसका अन्त न हो, अनन्त में समय का अन्त होता है, स्थिति का नहीं; स्थिति सर्वदा बनी रहती है। लाखों लोग अपने परिवारों में अनचाही बेचैनी भोग रहे हैं। उनके मन में अब कोई उम्मीद नहीं बची और न ही उनको जीने की कोई इच्छा है। जीना उनके लिए एक मजबूरी है। मौत माँगती हुई ऐसी ज़िन्दगियों की यहाँ कोई कमी नहीं।

कुछ अपने स्वभाव से और अपनी आदतों से बहुत मजबूर हैं। जो नहीं देखना चाहिए उसे देख लेते हैं, जो नहीं बोलना चाहिए उसे बोल जाते हैं, जो नहीं सोचना चाहिए उसे सोचते हैं, जो नहीं करना चाहिए उसे कर जाते हैं; पर जो करना चाहिए, उसे टाल जाते हैं। वे अपने आप को कोसते हैं और आत्म ग्लानि की पीड़ा से भरा जीवन जीते है। उनको अपने भी अपने नहीं लगते। उनका मन सोचता है कि मैं किसी काम का नहीं और परिवार में कोइ मुझे प्यार नहीं करता, फिर मैं क्यों जी रहा हूँ? एक मुशकिल जाती नहीं कि दूसरी तैयार खड़ी होती है। शायद आप भी ऐसी ही परेशानियों के बोझ से थक चुके हों। इन बोझों ने आपकी सारी हंसी और खुशी को दबा दिया हो। ऐसे लोगों को प्रभु प्यार से बुलाता है और कहता है, “हे सब बोझ से दबे और थके लोगों मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा” (मत्ती ११:२८)। आप के पाप का उपचार यीशु के पास है; जहाँ पाप हटा कि बेचैनी भी हट जाएगी। परख कर देख लीजिए। यह लेख अब अपनी आखिरी पंकतियों में आ पहुँचा है। शायद कुछ देर में आप इसे भूल जाएंगे, और फिर दूसरा मौका आपके हाथ न आए। इसलिए पाप से माफी माँगने का यही एक सही मौका है। सच्चे दिल से की गयी एक प्रार्थना, बस इतना भर कहना, “हे यीशु मुझ पापी पर दया करें, मेरे पाप क्षमा करें” सब कुछ बदल देने के लिए काफी है।

कुछ लोग जो यह सम्पर्क पढ़ रहे हैं, उन्हें पाप की क्षमा से कुछ लेना-देना नहीं है। ये वे लोग हैं जो अपने अन्त की चिंता किए बगैर, खाते-पीते, मौज मनाते, पास खड़ी मौत के अन्जाम से बेखबर जी रहे हैं। पाप में तो उन्हे मज़ा आता है। कुछ के लिए पाप तो कमाई का साधन है, इसके बिना काम कैसे चलेगा?

मैं मर रहा हूँ
एक कैंसर से मरते मरीज़ ने संसार से विदाई लेते समय कुछ इस तरह कहा... “यहाँ से जाते समय, जिसके लिए ज़िंदगी लगा दी, वही सब पराया लगने लगा है। अब एहसास होता है कि अगर मैं एक मिनिट आँखें बन्द कर लेता हूँ तो उजाले के साठ सैकेंड मैंने खो दिए। इन्हीं आखिरी पलों में हर पल कीमती लगने लगा है। ईश्वर ने थोड़ा सा जीवन दिया, उसका हर पल कीमती है, पर सच तो यह है कि इन आखिरी पलों में - जैसे जैसे दिल की धड़कन धीमी होने लगती है, आँखें मुंदने लगती हैं, साँस के लिए भी सहारे की ज़रूरत महसूस होने लगती है, अपनों को आखिरी बार देखने के लिए भी पूरी ताकत लगा कर पलकों को खोलना पड़ता है, तब ही इन पलों की कीमत का एहसास होता है। मौत उम्र के साथ नहीं आती, यह तब जाना जब जाने का वक्त आ पहुँचा। एक ताबूत में रखकर कब्र में उतारने के अलावा अब कोई इन्सान इससे ज़्यादा मेरी मदद नहीं कर सकता। मैं मर रहा हूँ, सब मजबूर खड़े देख रहे हैं।” ऐसे पल मेरे और आपके जीवन में कभी भी आ सकते हैं। एक बार जो ज़िंदगी हाथ से फिसली, तो फिर कभी हाथ नहीं आएगी।

आखिरी मौका... कहीं खो न जाए
जब से यह सम्पर्क आपके हाथ में है, तब से परमेश्वर की आँख आप पर लगी है। सच मानिए यह संदेश आप ही के लिए है। परमेश्वर का वचन हमारे सारे पापों को हमें दिखा देता है, परन्तु हम उसी परमेश्वर से अपने पापों को छिपाने की कोशिश करते हैं जो पापों को ही नहीं पर हमारे विचारों के इशारों को भी दूर से समझ लेता है (भजन १३९:२)। कितने सोचते हैं कि हमारे वो पाप जो कभी किसी ने नहीं देखे, अब हमारे सीने में हमेशा के लिए दफन हो चुके हैं। पर सच तो यह है कि आपके मरते ही आपके पाप फिर जी उठेंगे, आपके पाप आपका पीछा नहीं छोड़ेंगे (गिनती ३२:२३)। हम तो आपके पास परमेश्वर के मन की अभिलाषा को पहुँचा रहे हैं। क्योंकि वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, पर चाहता है कि आपको पापों की क्षमा का मौका मिले। कुछ ही देर में ये शब्द कितनी आवाज़ों और विचारों में खो जाएंगे। आपकी एक प्रार्थना आपको सारे अपराधों और पापों से हमेशा के लिए छुटकारा दे सकती है। जी हाँ यही प्रार्थना ‘हे यीशु मुझ पापी पर दया करें’। पापों की क्षमा या सज़ा - इन्में से एक आप को लेना ही है, इसमें कोई अन्य मार्ग नहीं है। अब यह प्रार्थना करना, न करना, यह फैसला आपके हाथ में है।