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मंगलवार, 4 अगस्त 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००१: एक खोज...जीवन के सही अर्थ की

मेरा नाम दीपक जरीवाला है और मेरा जन्म मुम्बई शहर के एक गुजराती परिवार में हुआ। मेरी माँ एक धार्मिक प्रवृत्ति की स्त्री है और वह बड़ी गम्भीरता से बहुत से ईश्वरों की उपासना करती है। मुझे भी उन्होंने यही सिखाया और मैं भी आठवीं कक्षा से ही काफी धार्मिक था। मैं अपने घर के छोटे से उपासना स्थाल में दीया जलाया करता था। जब अपनी आँखें बन्द करके मैं तरह-तरह के ईश्वरों से प्रार्थना करता था, तब मुझे एहसास होता था कि मेरा जीवन परमेश्वर की नज़र में ठीक नहीं है और वह मेरे पापों को जानता है। बाहर से तो मैं एक अच्छा लड़का था पर मैं जानता था कि मेरा हृदय दुष्ट है। मेरे अन्दर एक संघर्ष शुरू हो गया कि किसी तरह मेरा जीवन अन्दर से पवित्र और शुद्ध हो सके। जब मैं चारों तरफ लोगों को देखता जो मन्दिर मस्जिद, गुरुद्वारों और गिरजों से अपने आपको बड़ा धार्मिक दर्शाते हुए निकलते थे, तब मुझे वे मक्कार नज़र आते थे।

मेरा एक घनिष्ट पंजाबी मित्र था जो मुम्बई के सेंट मिकाएल गिरजे में ९ बुद्धवार की सभाओं में जाया करता था। एक बार उसने मुझे भी उन ९ बुद्धवार की सभाओं में आमंत्रित किया। वहाँ जाने पर मुझे समझ में आया कि यह ९ बुद्धवार की सभाएं मरियम की पूजा में समर्पित होती थीं। उन लोगों क यह विश्वास था कि इन सभाओं के दौरान किसी की कोई भी अभिलाशा हो तो वह पूरी हो जाती है। पर मेरी कोई खास अभिलाशा नहीं थी लेकिन धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण मैंने वहाँ जाना शुरू कर दिया। एक शान्त वातावरण, एक भव्य गिरजा और वहाँ सजा सँवरा पादरी खड़ा होकर सन्देश देता, जो कभी-कभी अच्छा भी होता था; यह सब देखकर मैं बड़ा प्रभावित हुआ। जब वे लोग यह प्रार्थना करते कि “माता मरियम तू हमें संसार की दुष्ट, बुरी संगती, गन्दी किताबों और फिल्मों से बचाए रख” तब मैं और भी कायल होता कि मैं वास्तव में एक पापी हूँ। मैंने न केवल ९ बुद्धवार, बल्कि १०४ बुद्धवार तक इन सभाओं में करीब दो साल तक गया। बस एक बार नहीं गया जब मेरी नाक का औपरेशन था - जाना तो मैं तब भी चाहता था पर मेरी माँ ने नहीं जाने दिया। लेकिन वहाँ जाने से भी मेरे मन की हालत में कोई सुधार नहीं आया। मैं पवित्रता के उस स्तर को अनजाने में खोज रहा था जिसे मैं पाने में असमर्थ था। मैं लगातार कई बार सान्ताक्रूज़ के मन्दिर, मस्जिद में भी गया और एक बार साई बाबा का मन्दिर देखने शिरडी भी गया। लेकिन तब भी मैंने कोई खास एहसास या आशीश नहीं पायी। मैं अस्थमा की बीमारी से पीड़ित था। इस बिमारी से छुटकारा पाने के लिए मैं वकोला में एक बाबा के पास गया जो कहता है कि उसने बहुतों को चंगा किया है, परन्तु वह भी मुझे ठीक नहीं कर सका। उसने बड़े बड़े काम किए होंगे पर मेरे लिए वह कुछ नहीं कर सका। करीब दो साल तक मैंने फिल्में और टी०वी० देखना छोड़ दिया यह सोचकर कि यह सब बुराई के स्रोत हैं। मेरे इस व्यवहार से मेरी माँ को बड़ी चिंता हुई कि इस लड़के को क्या हो गया कि इसने फिल्में देखना बन्द कर दिया है। उसने मुझे कुछ धार्मिक पुस्तकें पढ़ने के लिए दीं पर वे भी मुझे संतुष्ट नहीं कर पाईं।

बारहवीं कक्षा पास करने के बाद मैं आई० आई० टी० (इन्जीनियरिंग) में नहीं जा सका। तब मैंने मजबूरी में फैसला लिया कि मैं रूड़की विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रोनिक इन्जीनियरिंग के लिए जाऊँगा और मैंने रूड़की विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। दाखिले के तुरन्त बाद, रैगिंग के दौरान सीनियर लड़कों ने मेरे साथ अनौपचारिक व्यवहार किया जो मेरे लिए बहुत कठिन था। मैं चाहता था कि मेरा धार्मिक जीवन फिर शुरू हो जाए और मैंने एक उपासना स्थल भी देख लिया था जहाँ मैं जा सकूँ। विश्वविद्यालय के अन्दर एक गिरजा घर भी था जहाँ छात्रों की रविवारिय सभा होती थी और मौका मिलते ही मैं वहाँ भी गया। उस सभा में जाकर एक विचित्र बात मैंने पहली बार देखी कि वहाँ न कोई तस्वीर थी जिसकी वे आराधाना करते और न कोई सफेद चोगे वाला पादरी। मैंने उनसे निवेदन किया कि मुझे एक बाईबल चाहिए, क्योंकि यह मेरी हमेशा की इच्छा थी कि मैं बाईबल पढ़ूं। उन्होंने मुझे अगली बार आने का निमंत्रण दिया और जब मैं दोबारा गया तो मेरे लिए एक बाईबल का प्रबंध भी किया हुआ था।

विश्वविद्यालय के होस्टल में एक छात्र के कमरे मेंबाईबल के अद्धयन की सभा में मैं जाने लगा। इन सभाओं में जाने के द्वारा मैं एहसास करने लगा कि बाईबल का परमेश्वर पवित्र है। उसकी नज़रों में एक बुरा विचार भी पाप के बराबर है। और तब मुझे एहसास हुआ कि यही वास्तविक परमेश्वर की पवित्रता हो सकती है। परमेश्वर का वचन बाईबल मुझसे बात करने लगा। याद रखिए कि किसी ने मुझे गिरजा जाने या बाईबल पढ़ने के लिए दबाव नहीं डाला। मुम्बई में मैं कभी भी नामधारी इसाईयों के जीने के ढंग और तौर-तरीकों को पसन्द नहीं करता था। जब मैं विश्वविद्यालय की बाईबल अद्धयन सभा में जाता था तो बहुत कुछ था जो मुझे समझ नहीं आता था, परन्तु एक बात थी जो मेरा ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचती थी, वह थी ‘बच-जाना’ ‘उद्धार पाना’ ‘जो बच गए’ ‘जो उद्धार पा गये’ का प्रयोग। मैं बड़ा अचम्भित था कि किससे बचना, उद्धार पाना तो किससे पाना यह बात मुझे बहुत बेचैन करती थी।

२४ सितम्बर १९८६ रात ८:०० बजे की शाम मेरे जीवन की सबसे अदभुत शाम बन गयी जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। उस शाम मैंने बाईबल अद्धयन के बाद एक भाई से पूछा कि ‘बच जाने या उद्धार पाने का का क्या अर्थ है?’ उसने मुझे समझाया, ‘यदि तुम परमेश्वर के सामने मन से मान लो कि तुम एक पापी हो और प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करो कि वह तुम्हारे लिए मरा और तीसरे दिन जी उठा; उसने तुम्हें शुद्ध करने के लिए अपना बहुमूल्य लहू बहाया, और यदि तुम उसे अपने हृदय में ग्रहण करो तो तुम बच जाओगे यानि उद्धार पाओगे।’ यह मुझे बहुत अच्छा लगा, जैसे एक प्यासे के लिए ठंडा पानी। मैं जानता था कि मैं एक पापी हूँ, अब मुझे किसी और की सहमति की ज़रूरत नहीं थी। मैंने उसके आमंत्रण को स्वीकार किया और घुटने टेककर प्रार्थना की ‘हे प्रभु मैं अपने पापों को मानता हूँ। मैं विश्वास करता हूँ कि प्रभु यीशु मेरे लिए मरे और तीसरे दिन जी उठे।’ उस शाम मैंने प्रभु यीशु को अपने दिल में अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता करके ग्रहण किया और तब से वह मेरे हृदय और जीवन में है। वह मेरे साथ है और उसने मेरे सारे पापों को क्षमा कर दिया है। मैं उस आग की झील से जो नरक कहलाती है अनन्तकाल के लिए बच गया हूँ, उद्धार पा गया हूँ। परमेश्वर के अनुग्रह से मेरे पास एक विश्वासी पत्नी और एक पुत्री है और मैं अपना काम करता हूँ। प्रभु से मेरी यही प्रार्थना है कि जो लोग मेरी यह गवाही पढ़ते हैं वे प्रभु यीशु में अपने जीवन का सही अर्थ खोज सकें।

परमेश्वर आपको आशीश दे।

रविवार, 12 जुलाई 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००१: सम्पर्क परमेश्वर के वचन से

सच्ची ज्योती जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है - यूहन्ना १:९
सेंज़ा नम का प्रांस का एक महान कलाकार था जो बड़ा जीवट, निर्भीक और ज्ञानवान व्यक्ति था। कुछ ऐसा कहा जाता है कि वह एक सुन्दर घाटी के एक कस्बे के होटल में शाम को पहुँचा। होटल के मालिक ने घाटी की तारीफ करते करते एक बात यह भी कह दी कि यहाँ पर और बहुत रहस्यमय बातें भी हैं। सेंज़ा ‘रहस्यमय’ शब्द से चौंका और पूछा कि वह रहस्यमय बातें क्या हैं? होटल के मालिक ने कहा कि “साहब रात बहुत हो चुकी है, अब आप आराम करें, बाकी बातें कल करेंगे।” लेकिन सेंज़ा अड़ गया कि उसे अभी बताना पड़ेगा। सेंज़ा के काफी ज़िद करने पर होटल के मालिक ने कहा, “एक रहस्यमय बात तो यह है कि इस घाटी में हर रोज़ एक आदमी की मौत होती है।” सेंज़ा ने घबराकर पूछा “आज का आदमी अभी तक मरा या नहीं, नहीं तो मैं यहां से चलूं।”

सेंज़ा जैसा निर्भीक दिखने वाला व्यक्ति भी वास्तव में अन्दर से कितना डरपोक था। हम जो कुछ दिखते हैं वास्तव में हम वह नहीं होते। सच तो यह है कि बस प्रभु ही आपको पूरी तरह से जानता है। वह आपको जितनी अच्छी तरह जानता है कि उतनी अच्छी तरह आप भी अपने को नहीं जानते। वो ही वह सच्ची ज्योति है जो हमारे असली जीवन स्हमारी मुलाकात करा देती है। पवित्र आत्मा यहां इस ज्योति को ‘सच्ची ज्योति’ कह कर क्यों संबोधित कर रहा है? सच्ची ज्योति में वह सामर्थ होती है जो अन्धकार के कामों को सबके सामने रख देती है; “... जो सब कुछ प्रकट करता है वह ज्योति है (इफिसीयों ५:१३)।” वास्तव में ज्योति के निकट आकर ही हमें मालूम होता है कि अंधकार कितना भयानक है।

क्या आपने कभी उजाले के उल्लू के बारे में सुना है? ये वो उल्लू होते हैं जो रहते तो उजाले में हैं पर काम वही अंधेरे वाले करते हैं। ये वे हैं जो बाईबल के शब्दों और पदों को तो जानते हैं पर बाईबल के परमेश्वर को नहीं जानते, उसके प्यार और उसकी सहनशीलता को नहीं जानते।

एक अन्धा भिखारी, शाम के झुटपुटे में लालटैन लेकर बैठा था। किसी ने उस से पूछा “सूरदास जी इस लालटैन का आप से क्या लेना देना?” अन्धा बोला “यह मेरे लिए नहीं आपके लिए है, जिससे आप मुझे देखकर कुछ दे सकें।” कई तो इस अन्धे की तरह सिर्फ अपने मतलब के लिए ज्योति से जुड़े खड़े हैं।

स्वार्थ के टुकड़ों पर दुम हिलाते हुए ये लोग जहाँ जैसा मौका देखते हैं वैसा ही रंग बदल डालते हैं, यह ‘मल्टीकलर’ विशवासी फिलौसफी है। ये मानते हैं कि संसार के सागर में रह कर मगरमच्छ से बैर रख कर जीना सहज नहीं है। इसलिए मगरमच्छ से कुछ समझौते करने में ही ये अपनी भलाई समझते हैं और समझौतों के साथ ही जीते हैं; जैसे बिजली वाले से, लाईसेन्स वाले से, पासपोर्ट वाले से, रेलगाड़ी वाले टीटी से, इत्यादि। कहते हैं “सिर्फ चाए पानी के पैसे दे देता हूँ।” आज रिश्वत के गंदे काम को यह एक खूबसूरत अंदाज़ दे दिया गया है। ज्योति कितना ही प्रकाश क्यों न फैलाए लेकिन इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि ये तो अपनी आँखें बन्द रखने की ज़िद्द छोड़ने को राज़ी ही नहीं हैं।

ऐसे विश्वासी क्रूस की गाथा को शब्दों से तो जानते हैं पर क्रूस का काम उनके मन में नहीं हुआ होता। कितने ऐसे हैं जो कितनों के लिए मन में बैर, विरोध और भारीपन पालते हैं। विश्वासी तो वह है जो अपने शत्रु के लिए भी बुरा नहीं सोच सकता। क्रूस पर प्रभु यीशु का पहला वाक्य क्या था, क्या आपको याद है? वह वाक्य उसने अपने शत्रुओं के लिए कहा था जिन्होंने उसे ज़लील करके इतनी भयानक और दर्दनाक मौत दी थी। उनके लिए प्रभु ने प्रार्थना की “ऐ बाप इन्हें माफ कर...।” अपने इन शत्रुओं के लिए उसके दिल में ज़रा भी कड़वाहट नहीं थी। यह क्रूस का काम है। आप खुद जानते हैं कि आपके कितने रिशतेदारों के लिए आपके मन में कितना विरोध है; उनका बुरा देखने का विचार आप अपने मन में पाल रहे हैं। मण्डली में कितनों के प्रति कितनी कड़वाहट भरी है। सच्ची ज्योति सब कुछ साफ साफ जता देती है, और इस समय वह आपको आपकी दशा जता रही है। प्रभु का ज्ञान हमारी अज्ञानता को हम पर प्रकट करता है और हमारे मन पर चोट करता है ताकि हम जाग सकें और कुछ सोच सकें।

“बुराई को भलाई से जीत लो (रोमियों१२:२१)।” जिन्होंने आपके लिए बुराई की है, उनके लिए प्रभु से कहें “हे प्रभु मेरे दिल से उनके लिए भारीपन निकलें। मुझे मौका दें और ऐसा दिल भी दें कि मैं उनकी भलाई कर सकूँ।” मित्र मेरे यह बात मैं नहीं, बाईबल कहती है कि बुराई को बुराई से कभी नहीं जीत सकते। आग पर मिट्टी का तेल डालने से आग बुझेगी नहीं और भड़केगी। आग बुझानी है तो उस पर पानी डालो; जलन की आग जीवन के जल से ही बुझेगी। हमें माफी मांगनी ही नहीं माफी देनी भी आनी चाहिए। कई बार माफी देकर भी हम उस बात को अपने मन में याद रखते हैं ताकि जब कभी मौका आए तो उसका उपयोग किया जा सके। यह सच्ची माफी नहीं है, इस तरह ही हमारे समंबन्धों में मक्कारी पनपने लगती है। जो वास्तव में मसीह के साथ चलता है वह हमेशा हर विरोध को एक तरफ रखकर जीता है। मन में बुराई रखकर विश्वासी किसी भले काम का नहीं रह पाता।

मौत का डर सबसे डरावना डर होता है, जैसे शमशान की शान भी अपनी एक अलग शान होती है; हर शानदार आदमी भी वहाँ सहम सा जाता है। शमशान हो या कब्रिस्तान, वहाँ न साँस है न सिसकी, न आह है न आहट, बस एक दिल में एक सर्द एहसास देती खामोशी है जो कहती है “तू कब तक बचेगा, एक दिन तुझे भी यहीं रह जाने के लिए आना है।” कभी कभी मन एक सवाल से परेशान होता है कि इतने आदमी बेमकसद क्यों मर रहे हैं? पर हमारा मन यह सवाल क्यों नहीं करता कि इतने सारे आदमी बिना मकसद क्यों जी रहे हैं? मेरे दोस्त, हमारा हर पाप हमारे जीवन के मकसद को ही मिटा डालता है। अब इंसान ही नहीं संसार भी अपनी समाप्ति की ओर आ गया है। संसार का अंधकार तो समाप्त नहीं होगा पर आपके मन का अंधकार ज़रूर दूर हो सकता है। अब फैसला आप पर है कि आप सत्य पर लात मारो या उसे दिल में सजाओ। जैसा आपने पहले कितने संदेशों के साथ किया है, क्या आप इसके साथ भी वही करने जा रहे हैं? अब समय को पहचान कर सही निर्णय का समय है। “यीशु ने कहा ज्योति थोड़ी देर तक तुम्हारे बीच में है, जब तक ज्योति तुम्हारे साथ है तब तक चले चलो, ऐसा न हो कि अंधकार तुम्हें आ घेरे (यूहन्ना १२:३५)।”

प्रभु करे कि अब आप के दिल की प्रार्थना हो “हे प्रभु यीशु तू जो जीवन की सच्ची ज्योति है, मुझ पर अपनी दया बनाए रख, कहीं अंधकार मुझे न आ घेरे और मैं कहीं जीवन का उद्देश्य ही न खो डालूँ - आमीन।”

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

सम्पर्क अक्टूबर २००१: सम्पादकीय

सच तो यह है कि आपके प्रेम ने, प्रार्थनाओं ने और प्यार भरे पत्रों ने सम्पर्क परिवार को पहले साल की पहली यात्रा पूरी करने में पूरा सहयोग दिया है। जब मैं अपनी ओर देखता हूँ तो बहुत ही निराश होता हूँ। पर जब जब मैं अपने प्रभु की ओर देखता हूँ तो मेरा मन प्रभु की महिमा गाने लगता है।

प्रभु के प्यार और हमारे प्यार में बड़ा फर्क है। हम उस से ही प्यार करते हैं कम से कम जो प्यार करने लायक तो हो। प्रभु ऐसों को प्यार करता है जो ज़रा भी प्यार करने के लायक हैं ही नहीं। प्रभु किसी भले आदमी पर अपनी भलाई दिखाए तो यह एक भली बात है; पर उसने मुझ जैसे बुरे आदमी पर इतनी भलाई दिखाई, यह तो बस एक गज़ब का प्यार है। प्रभु की दया रही तो उसकी इस दया को जो उसने मुझ पर की छोटे छोटे टुकड़ों में आने वाले सम्पर्क सम्पादकीयों में आपके साथ बाँटता रहूँगा।

मैं काले बोर्ड पर सफेद चौक घिसकर अपना पेट पालता हूँ। उम्र ५६ साल है बालों पर खिज़ाब नहीं लगाता। खिज़ाब लगाऊं भी तो कहाँ, बाल तो नाम मात्र को खोपड़ी के किनारों पर झालर की तरह ही शेष बचे हैं और वो भी एक के बाद एक तेज़ी से त्याग-पत्र देते जा रहे हैं। मैंने अपना पुशतैनी मज़हब और माँ-बाप, दोनों ही अपनी मर्ज़ी से नहीं चुने थे और न ही यह कर पाना मुम्किन था। न कोई बहन न भाई, घर पर मौत का साया इतना भयानक था कि कोई बचता ही नहीं था। फिर भी हमारा परिवार पूरी तरह शैतान को समर्पित था। अक्सर हमारे परिवार में छोटी छोटी बातों पर बड़ी बड़ी मार पीट बजती रहती थी। यही पुशतैनी स्वभाव मेरी ज़िन्दगी में भी तेज़ी से जमने लगा। मेरे माँ-बाप दोनो ही नौकरी करते थे, मेरे लिए उनके पास वक्त ही कहाँ बच पाता था। जैसे ही नेकर में पाँव डालने की उम्र तक पहुँचा, ज़िन्दगी की गन्दगी से खेलना भी शुरू कर दिया।

मेरे पिताजी को हुक्केबाज़ी का बड़ा शौक था। कभी कभी वो मूँह से धुएं के छल्ले निकालते थे, एक छल्ला फिर दूसरा छल्ला फिर तीसरा छल्ला और फिर एक फूँक से तीनों एक दूसरे में से निकालकर बिखेरते जाते। यह सब कुछ देखकर मुझे बड़ा मज़ा आता था, फिर मुझे भी तो यह सब कुछ करके दिखाना था। अधकचरी उम्र में ही मुझे बुरी लतों ने घेर लिया। मेरे घर पर जमे मौत के साए के कारण मेरे पिताजी को टी०बी० की लम्बी बिमारी मौत के मूँह में ले गई। अब मैं और मेरी माँ ही बचे थे। माँ भी बचते बचते ही बची थी। बाप की मौत के बाद मेरे लिए एक आज़ादी थी - जो करो, जैसे भी करो। अब मैं तहज़ीब को तहमद की तरह खूंटे पर टांग कर पूरी बदतमीज़ी पहन कर खड़ा हो गया। मुझे समझ पाना अपने में एक टेढ़ी खीर थी। स्कूल में मिले नम्बरों से पता नहीं चलता था कि वास्तव में मैं क्या हूँ। मैं देखने में बड़ा भोला और भला दिखता था पर अन्दर की कहानी तो कुछ और ही थी। (प्रभु की दया रही तो बीच की बची कहानी फिर अगले अंकों में कहूँगा।)

उस समय ज़िन्दगी की पूरी मस्ती छन रही थी, पर जब जब मैं अकेला होता था तो एक खालीपन की बेचैनी मुझे हमेशा बेचैन करती थी, और यह बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। अनेक धर्मों के द्वार पर इस खालीपन को भरने के लिए गया, पर प्यासा ही लौटा। मुझे जल की तस्वीर नहीं पर वह वास्तविक जल चाहिए था जो अन्दर तृप्ती दे। धर्मों में बड़ा उल्झाव था। इतना सिर मारकर भी धर्मों में वह सिरा नहीं मिला जहाँ से मैं शुरू करता। आखिर सब ही मक्कारी से लगने लगे। बाईबल भी मुझे रूखी, बेमज़ा और उबाऊ किताब लगी और उसकी बातें मुझे बेवकूफी से भरी लगीं। अब मैंने एक बगावत शुरू कर दी, साम्यवादी विचारों को स्वीकार कर मैं नास्तिक बन गया। परमेश्वर के विरोध में बोलने लगा, बाईबल को झूठा कहने लग जब कि मैंने पूरी बाईबल पढ़ी भी नहीं थी, मात्र कुछ अंश ही कहीं कहीं से पढ़े थे। अब मेरे लिए परमेश्वर शून्य और सन्नाटा ही था। लोगों को तो मैं एक जुनून के साथ ज़िन्दगी जीता और ज़बरदस्त मस्ती छानता दिखता था। लोगों के सामने बहुत हंसता और चहकता हुआ दिखता था पर अकेले में मेरा मन बहुत उचाट रहता था। मैं मन मसोस कर जी रहा था और अपने-आप से पूरी तरह हताश हो चुका था।

एक दिन एक व्यक्ति मेरे घर आकर मेरी बीमार चाची को बाईबल पढ़कर सुना रहे थे। मेरी तरफ उनकी पीठ थी। जो कुछ उन्होंने पढ़ा उसे सुनकर मुझे एक बिजली का झटका सा लगा और मैं एकदम भौंचक्का सा रह गया। ऐसा लगा कि यहाँ सब कुछ मेरे बारे में ही लिखा है और उन्होंने मुझे उघाड़कर मेरी छिपी हुई ज़िन्दगी को खोलकर सबके सामने पढ़ डाला है। पहले मैं सकपकाया लेकिन फिर अपने आप को संभाला। मैंने ज़िन्दगी में पहली बार ऐसी दस्तक अपने दिल के द्वार पर सुनी। वह बुज़ुर्ग व्यक्ति जाते जाते एक सभा में आने का प्यार भरा निमंत्रण दे गए। मैंने उन्हें वायदा दिया कि चलूँगा, इसलिए मुझे लेने वह कई बार मेरे घर आए पर मैं किसी तरह बहाने देकर उन्हें रफा दफा करता रहा। मेरे लिए यह निहायत ही बेवकूफी की बात थी कि शाम को ‘बरबाद’ किया जाए और वह भी किसी धर्म के नाम पर। पर वह बुज़ुर्ग व्यक्ति अक्सर घर आते रहे और मुझे बुलाते रहे।

एक दिन मैं मजबूरी में चला ही गया। कोई अदृष्य शक्ति ही मुझे खीच कर ले गई। मैं वहाँ मन मारकर बैठा रहा, वहाँ से निकल भागना चाहता था पर कोई था जो मुझे रोके रहा। वहाँ जो व्यक्ति प्रवचन दे रहे थे वह कुछ इस तरह कह रहे थे कि पापों से माफी मांगनी चाहिए; प्रभु यीशु पापों को क्षमा करता है और जीवन बदल जाता है। मेरा मन कहता कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक प्रार्थना करने से जीवन ही बदल जाए। मुझे इस बात पर कतई विश्वास नहीं हुआ। लेकिन एक बात ज़रूर हुई कि मैंने अच्छा आदमी बनने की पूरी कोशिश शुरू कर दी, कि सिग्रेट, शराब नहीं पीऊँगा और फिल्म आदि नहीं देखूंगा। यह सिलसिला ज़्यादा दिन नहीं चल सका और पुरानी आदतें वैसी ही बनी रहीं, फर्क सिर्फ इतना हुआ कि मैं अब और ज़्यादा बेचैन रहने लगा। बीच बीच में आत्म हत्या के प्रयास भी किए। ऐसा लग रहा था कि ज़िन्दगी रुक सी गई है और दम घुट रहा है। मौत मिल नहीं रही थी और ज़िन्दगी जी नहीं पा रहा था। मैं बहुत थक चुका था। मैंने अच्छा बनने के लिए बहुत मेहनत की थी पर हर बार हार ही हाथ लगी। मरता क्या न करता; मैं अपनी ज़िन्दगी की सबसे यादगार उस अंधेरी रात पर आ गया था जिसने मुझे हमेशा के उजाले में लाकर खड़ा कर दिया। मैंने एक आखिरी उम्मीद से प्रभु का द्वार खटखटा ही दिया। एक शक मेरे सीने में तब भी था कि क्या यीशु मेरा जीवन बदल सकता है? मैंने प्रभु यीशु से जो प्रार्थना उस समय की उसके सही शब्द तो मुझे अब याद नहीं, पर उस प्रार्थना का भाव याद है। सच्चाई यह थी कि मैं प्रार्थना से प्रभु यीशु को परखना चाहता था। मुझमें न तो नरक का डर था न ही स्वर्ग का प्रलोभन। मैं अपनी इस बड़ी अजीब बेचैनी से बाहर आना चहता था। मैं बहुत अकेला था और मुझे कोई चाहिए था जिससे मैं कुछ कह सकूँ - शायद यीशु ही मेरी सुन ले। प्रभु से प्रार्थना करने के बाद मैं एक बड़े ही गज़ब के अनुभव से गुज़रा। बाहर से तो मेरा कुछ नहीं बदला पर अन्दर एक अजीब सी खुशी मुझे मिल गई। इस खुशी को शब्दों में बयान करने लायक शब्द आज तक मुझे नहीं मिले। अब मुझे मालूम हुआ कि मेरे प्रभु के पास मेरे जीवन के लिए एक योजना है और यह योजना आत्म हत्या तो कतई नहीं है। खैर अभी यहीं तक, शेष फिर अगले अंक में, प्रभु की उस दया को जो मुझ पर हुई, प्रभु की दया से कहता रहूँगा।

आपके बहुत सारे पत्र हमें मिलते हैं और लगभग हर पत्र का जवाब हम डाक द्वारा देने का प्रयास करते हैं। अभी आए एक पत्र का जवाब मैं आप को सब के साथ देना चाहूँगा। पत्र लिखने वाले ने, अपने ढंग से सवाल पूछा है कि हम किस मिशन के हैं? सालों से इस सवाल के साथ लोग अक्सर मुझे घेरे रहते हैं।

कुछ खतरनाक विचार हमारे दिमाग से गुज़रते हैं जो बड़ा बिगाड़ पैदा करते हैं और हमारे दिलों में बे सिर पैर की दहशत पैदा कर डालते हैं। एक पुरानी आप-बीती आपके साथ बाँटना चाहुँगा। मैं नया-नया प्रभु में आया था, एक दिन कई लोगों के साथ एक घर में बैठा था। वहाँ एक बड़े सड़ियल स्वभाव के एक इसाई साहब भी बैठे थे और खामख्वाह काज़ी बन रहे थे, अपनी ही हाँके जा रहे थे। शायद उनके इतने बड़े शरीर में परमेश्वर के प्यार का एहसास करने वाला दिल फिट ही नहीं था। इतने में पीने के लिए सबको पानी दिया गया। मैंने पानी का गिलास हाथ में लिया और आँखें बन्द करके परमेश्वर को मन में ही धन्यवाद करके पीना शुरू किया ही था कि वह साहब बोले “ क्यों भई तुम क्या फलां मिशन के हो?” यह सुनते ही मेरा कलेजा कबाब हो गया, पानी तो मैं जैसे तैसे पी गया पर अपना गुस्सा न पी सका। इस तरह गुस्से से बड़ों को जवाब देना परी तरह गलत था, मुझे अपनी बात प्यार से कहनी चाहिए थी। पर उस समय इतनी परिपक्वता नहीं थी, झुंझलाकर जवाब दिया “साहब जो हमें एक गिलास पानी देता है उसे हम मुस्कुराकर प्यार से ‘थैंक यू’ (यानि धन्यवाद) बोलते हैं, पर जिसने पानी बनाया है उसे ‘थैंक यू’ बोलते ही क्या हम ‘फलां’ मिशन के बन जाते हैं? हमारे दिमाग का पूरा अकीदा यह है कि मसीह को मानने वाला किसी न किसी मिशन का ज़रूर होगा। वैसे ही जैसे परमेश्वर को मानने वाला किसी न किसी धर्म का ज़रूर होगा। मैं आपसे सवाल पूछता हूँ, कृपया मुझे बाईबल से बताएं कि प्रभु यीशु किस मिशन का था, मैं उस मिशन को स्वीकार कर लूँगा। जब प्रभु ही किसी मिशन का नहीं था तो आप हमें किसी विशेष मिशन में क्यों धकेलना चाहते हैं?”

मेरे प्यारे पाठकों आप परमेश्वर और हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो। परमेश्वर की दया और आपकी प्रार्थनों के सहारे ही हम सम्भले रहते हैं। आप से विनम्र निवेदन है कि कम से कम एक जन को ‘सम्पर्क’ पत्रिका का अपनी तरफ से सदस्य ज़रूर बनाएं - हम ‘सम्पर्क’ के साथ दुगने लोगों तक पहुँच पाएंगे। बस हमें स्वर्गीय सामर्थ की आवश्यक्ता है जो हमें आपकी प्रार्थनाओं से प्राप्त होती है। प्रभु ने चाहा तो फिर और आगे अगले अंक में आपसे सम्पर्क करेंगे।

प्रभु में आपका,

“सम्पर्क परिवार”