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रविवार, 15 नवंबर 2009

सम्पर्क दिसम्बर २०००: उस प्रभु ने मेरा धर्म नहीं, जीवन बदला है

मैं श्याम नारायण हूँ जो अपको अपनी आप बीती बताने जा रहा हूँ। मेरा जन्म एक सामन्य से परिवार में हुआ। मेरा गाँव ऊँचडिह जिला इलाहबाद, उत्तर प्रदेश में है। मेरे माता -mता ईश्वर के पक्के भक्त थे। प्रातः जब तक नहा धोकर पूजा पाठ नहीं कर लेते थे, तब किसी से बात तक नहीं करते थे। यह देखकर मुझमें भी ईश्वर को देखने की प्रबल इच्छा जन्मी। एक दिन मैंने पिताजी से पूछा ‘ईश्वर कहाँ है?” उन्होंने एक आकृति की तरफ इशारा करके कहा, ये है ईश्वर। मैंने पूछा वे कहाँ रहते हैं? पिताजी ने मुझ से कहा अभी तू जानने योग्य नहीं है। पिताजी के एक धार्मिक गुरूजी से भी मैंने यही सवाल किया, उनका उत्तर था कि ईश्वर की प्राप्ति बड़ी तपस्या से हो पाती है। उनकी बताई विशेष पूजा और २१ दिन के उपवास को पूरा करने के बाद, २१वें दिन मैं ईश्वर की जय बोलकर बाढ़ से भरी हुई नदी में कूद गया, और डूबने लगा। बड़ी मुशकिल से लोगों ने मुझे बचाया, पर ऐसा दुर्भाग्य मेरा कि फिर भी मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई। तत्पश्चात मैंने घनघोर जँगल के एकाँत में जाकर, एक पेड़ के नीचे बैठकर तप्स्या की और गुरूजी का दिया हुआ मंत्र जपने लगा, पर फिर भी कुछ नहीं हुआ। फिर मैं एक बड़े महातीर्थ स्थान में गया, जहाँ बड़े पहुँचे हुए धार्मिक गुरू आते हैं। वहाँ पर मैंने उन धार्मिक गुरुओं से भी ईश्वर प्राप्ति का उपाय पूछा। उन्होंने जो उत्तर दिया उससे मुझे निराशा ही हाथ लगी।

जब मैं घर वापस लौटा तो सब लोग मेरा मज़ाक बनाते और मुझ पर हंसते थे। माता-पिता बड़े चिंतित रहने लगे। मेरा विवाह बचपन में ही हो गया था। किसी ने मेरे माता पिता को सलाह दी कि इसका गौना कराकर इसकी पत्नी को घर ले आओ, तब यह ईश्वर को भूल जाएगा और घर पर ही रहने लगेगा। मैंने इस बात का बड़ा विरोध किया, क्योंकि मेरा विचार था कि मैं गृहस्थी में फंसकर ईश्वर की खोज नहीं कर पाऊंगा। मुझे यह भी एहसास था कि मैं एक पापी हूँ और छुटकारा पाने के लिए मुझे कुछ करना है। पत्नी के आने के दो दिन पूर्व ही मैंने घर छोड़ दिया। तीसरे दिन एक और तीर्थ स्थान पर पहुँचा, जहाँ एक बड़े धार्मिक गुरूजी रहते थे। मैंने उन्हें भी अपनी आप बीती सुनाई और उनसे कहा कि जितना भी कठिन मार्ग क्यों न हो मैं उसपर चलूँगा, लेकिन मुझे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताइये। उन्होंने मेरा निश्चय देखकर कहा, मैं तुम्हें अन्धेरे में नहीं रखना चाहता, मेरे बाल सफेद हो चुके हैं पर अभी तक मुझे ही ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई है, तो तुम्हें कैसे उस से मिलवा दूँ? हाँ यदि ईश्वर स्वयं चाहे तो तुम्हें मिल सकता है। इसलिए घर जाकर अपनी पi के साथ अपनी गृहस्थी बसाओ, और प्रार्थना में लगे रहो। मैं फिर निराश होकर घर लौट आया और फिर लोगों के उपहास, व्यंगय और कटाक्षों का पात्र बना। मेरे ससुर ने मुझे बुलवाकर खूब खरी खोटी सुनाई और सम्बंध तोड़ने तक की धमकी दी। मेरी पत्नी और मेरे बीच में कलह, लड़ाई-झगड़े दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगे। किसी ने कहा मुझ पर दुष्ट आत्मा का साया है। यह सुनकर मैं और भी क्रोधित होता था, कि मुझमें भूत कैसे हो सकता है, मैं तो ईश्वर का भक्त हूं? एक रिश्तेदार ने हम दोनों हाथ देखकर कहा कि यदि ये एक साथ रहेंगे तो इन्में से एक की मृत्यु तय है। अतः मेरी पत्नी की इच्छानुसार उसको उसके घर छोड़ दिया गया।

इस घटना के बाद तो मैं और भी मज़ाक का पात्र बन गया। लोग कहते थे कि यह मूर्खों से भी महामूर्ख है, इसे न तो ईश्वर ही मिला न पत्नी। इसका मूँह देखना भी पाप है। माँ दुखी थी और पिताजी ने भी बोलना बंद कर दिया ता । बड़ा भाई मुझे देखकर मूँह फेर लेता और कहता कि यदि मुझसे बोला तो तुझे जूते से मारूंगा। मैं बड़ा निराश हो गया था, सारी आशाएं मिट सी गईं और काम धंधा भी बंद हो गया था। जीवन में कुछ भी शेष बाकी न बचा। मैंने सोचा अब जीने से मरना बेहतर है। जब मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब इस जीवन को समाप्त करना ही भला होगा, तो सवाल उठा कि कैसे? ज़हर खरीदने के लिये भी मेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने सोचा कि अपना रेडियो बेचकर ज़हर खरीदूंगा। उसे बेचेने से पहिले मैंने उसे आखिरी बार सुनने की लालसा से उसका बटन घुमाया तो अचानक से किसी जगह चल रहे कार्यक्रम में किसी के बोलने की आवाज़ आई “प्रिय मित्र यदि आपसे संसार, मात-पिता, पत्नि, दोस्त प्यार नहीं करते तो आप निराश न हों। यीशु आपको बुला रहा है। जितनों ने यीशु मसीह पर विश्वास किया उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया। यदि आप पश्चाताप करें और यीशु मसीह से अपने पापों की क्षमा माँगें, तो वह आज ही आपको नया जीवन देगा। आपका नाम स्वर्ग में लिखा जाएगा।”

यह सुनकर मैं फूट फूट कर रोया। और मैंने सच्चे हृदय से पश्चाताप करके, एक एक पाप की क्षमा प्रभु यीशु से माँगी। परिणाम स्वरूप एक अद्भुत शान्ति व आनन्द मेरे जीवन में भर गया। मैं जान गया कि परमेश्वर ने मेरे मन में आकर मेरे सब पाप क्षमा कर दिये और मेरा नाम स्वर्ग में लिख दिया है। मैं एक अनोखे उत्साह और प्रसन्न्ता से भर गया। यह १ अगस्त १९९६ का दिन था। गाँव के लोग यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि यह सब कुछ गवाँ कर भी कितना खुश है, ज़रूर यह पागल हो गया है। कुछ लोग पूछते थे कि तुम्हें यह ज्ञान कहाँ से मिला? मैं बड़े आनन्द से कहता कि प्रभु यीशु ने मुझे पापों की क्षमा दी और मुझे नया जीवन देकर मृत्यु से बचाया है।

जबकि मैंने कोई धर्म नहीं बदला, पर मेरे पिताजी ने यही मान कर मुझे घर से निकाल दिया और कहा कि कहीं भी जा पर मुझे अपना मुँह दोबारा न दिखाना। उसके बाद मैं दिल्ली आया और रोहिणी इलके में एक प्रॉपर्टी डीलर की दुकन पर काम करने लगा। मैं प्रतिदिन प्रार्थना करता कि प्रभु किसी विश्वासी से मिलवा दे ताकि मैं प्रभु यीशु के बारे और जान सकूँ और संगति करके आत्मिक जीवन में बढ़ सकूँ। प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुनकर एक विश्वासी भाई से भेंट करवाई। इस भाई के साथ मैंने प्रभु यीशु के विषय में शिक्षा पाना, प्रार्थना करना, संगति करना आरंभ किया। इस भाई ने मुझे बाईबल से एक पद दिखाया - प्रेरितों १६:३१, और मुझे अपने परिवार के लिये प्रार्थना करने को कहा। प्रार्थना के उत्तर में मुझे मेरे माता-पिता, भाई और पत्नि के पत्र आने लगे। मैंने उन्हें पत्र के द्वारा विस्तारपूर्वक लिख कर भेजा कि प्रभु यीशु ने मेरा जीवन कैसे बदल दिया है। जून १९९७ में मेरी पत्नि सहित सब परिवार जन दिल्ली आये तो वह मेरा बदला हुआ जीवन देखकर बहुत प्रभावित हुए। यह सब देखकर और प्रभु के बारे में सुनकर उन्हें भी लगा कि वास्तव में प्रभु जीवनों को बदलकर सच्ची शाँति प्रदान कर सकता है।

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