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रविवार, 19 अप्रैल 2009

संपर्क दिसम्बर २००८: ये दुआ, अब दवा बन जाए



बीरबल के अनुसार चौपाए जानवरों में बिल्ली को कभी सिखाया नहीं जा सकता। अकबर के कुशल साथियों ने कुछ महीनों में ही १० बिल्लियों को प्रशिक्षित कर डाला। अब अकबर ने बीरबल को एक शाम के खाने पर बुला कर दिखाया कि दसों बिल्लियाँ कैसे एक पंक्ति में खड़ी रहती हैं, उनके सिरों पर प्लेटों में मोमबत्ती जलाकर रख दी जाती है और राजा उन मोमबत्तीयों की रौशनी में शाम का खाना खाता है। बीरबल ने आश्चर्यचकित होकर राजा से पूछा, “महाराज, क्या ये रोज़ ऐसा ही करती हैं?” राजा ने कहा, “कल फिर आकर देख लेना।” अगले दिन बीरबल आया और राजा के साथ खाने पर बैठा। बिल्लियाँ बड़े अनुशासन से अपने सिरों पर प्लेटों में मोमबत्तियों को लिये खड़ी थीं। तभी बीरबल ने चुपके से अपनी शेरवानी में रुमाल में लिपटा हुआ एक छोटा चूहा नीचे गिरा दिया। चूहा गिरकर जैसे ही भागा, सारी बिल्लियों ने अपना अनुशासन एक तरफ रखा और उस चूहे के पीछे भागीं। बीरबल ने एक व्यंग भरी मुसकान से राजा की तरफ देखा; राजा का मुँह खुला का खुला रह गया, उसके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे।

इन्सान के पास भी एक ऐसा ही मन है जो सालों सीखता रहता है। परन्तु जैसे ही परिक्षा सामने आती है, सालों से सीखी सारी शिक्षा को एक तरफ रखकर वही कर डालता है जो नहीं करना चाहिए, और वही बोल जाता है जो नहीं बोलना चाहिए।

प्रभु का वचन कहता है वे सीखते तो रहते हैं पर सच्चाई की पहिचान तक कभी नहीं पहुँचते (२ तिमुथियुस ३:७)। वे सीखकर बाहरी बदलाव तो ले आते हैं पर स्वभाव का बदलाव नहीं। ऐसे लोग धीरे धीरे परमेश्वर की बात सुनना बंद कर देते हैं और तब परमेश्वर भी उनसे बात करना बंद कर देता है। जो अपने पाप देखना बंद कर देता है, वह दूसरों के पाप देखना शुरू कर देता है।

फरीसी हमेशा इस सोच के सहारे जीते थे कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं। पर उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि प्रभु हमारे बारे में क्या सोचता है? वे हमेशा ही अपनी कमज़ोरियाँ छिपाते थे। उनका अहंकार उन्हें उनके पापों को मानने नहीं देता था।

ईसप की कहानीयों को, जिनमें आदमी के स्वभाव की सच्चाई छिपी है, आपने कितनी ही बार सुना होगा। लोमड़ी ने अँगूरों पर छलांग लगाई, लेकिन छ्लांग छोटी पड़ गई; गुच्छा कुछ ज़्यादा ही ऊंचा था। कई बार कोशिश करने ने पसीने पसीने कर डाला। आखिर उसने ध्यान से इधर-उधर देखा कि कहीं किसी ने देखा तो नहीं, फिर उसने अपने उपर की धूल झाड़ी और लंगड़ाती हुई जैसे ही आगे बढ़ी, झाड़ियों में छिपे खरगोश ने चुटकी ली, “चाची क्या हुआ?” लोमड़ी बोली, “मैं तो छलांग लगा लगाकर सिर्फ देख ही रही थी। अँगूर तो अभी कच्चे हैं, जब पक जाएंगे तोड़ने तो तब आउँगी।” आदमी का स्वभाव इस कहानी में दिखाई देता है - वह अपनी कमज़ोरी मानता नहीं वरन ढाँपता है। लोमड़ी आदमी के अन्दर की चालाकी और पाखंढ को दिखाती है, और खरगोश हमारे विवेक को जो बार बार हमारी कमज़ोरियों और मक्कारियों पर ऊंगली रखता है। अहंकार मरता नहीं है, सिर्फ छिप जाता है। हम उसे अपने शब्दों से छिपाए रखते हैं और यह दिखाते हैं कि हम में अहंकार नहीं है।

यहुदियों का मन्दिर पैसे के लिए, पैसे के द्वारा, पैसे के लालची लोगों के द्वारा चलाया जा रहा था। ऐसे मन्दिर को वे परमेश्वर का मन्दिर कहते थे। परन्तु जब प्रभु वहाँ गया तो उसने देख कि वहाँ परमेश्वर का मन्दिर नहीं, डाकुओं की खोह है। मनुष्य के देखने और परमेश्वर के देखने में कितना अन्तर है। आज जब परमेश्वर यानि परमेश्वर का वचन आपके मन में झाँकता है तो क्या पाता है? क्या आप भी वचन के प्रकाश में अपने मन में कुछ देख पा रहे हैं?

क्या आपने अपने बारे में कभी कुछ सोचा? या फिर आप सोचना ही नहीं चाहते? जो आदमी सोचने के दरवाज़े बन्द कर देता है वह वास्तव में बड़ी बेवकूफी करता है। पर हम आपको मजबूर कर रहे हैं कि आप अपने बारे में कुछ सोचें। क्योंकि हम अपनी पहिचान भूल चुके हैं, कि वास्तव में मैं क्या हूँ। जो सिर्फ दूसरों में दोष देखता है, वह अपने दोष कभी नहीं देख पाता।

काश! दाउद की दुआ आज मेरे और आपके दिल की दुआ बन जाए - ‘... देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर! (भजन १३९:२४)।

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